सूने आँगन में गुमसुम दरख़्त
सुबह की पहली किरण के साथ जब आँखें खुलती थीं, तो किसी कृत्रिम अलार्म की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। रोशनदान के कोने से आने वाली ‘चीं-चीं’ की लयबद्ध आवाज़ नींद को बड़ी नफ़ासत से तोड़ती थी। यह आवाज़ थी गौरैया की वह नन्ही, फुदकती हुई जान, जो सदियों से हमारे परिवारों का एक अदृश्य लेकिन सबसे अभिन्न सदस्य रही है। घर के बड़े-बुजुर्ग जब दालान में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेते थे, तब यह नन्हा परिंदा पैरों के आस-पास बेख़ौफ़ घूमता, बिखरे हुए चावल या बाजरे के दाने चुगता और आईने में अपनी ही परछाईं को चोंच मार-मारकर खेलता दिखता था।
वह सिर्फ़ एक पक्षी नहीं थी, घर की रौनक थी, खुशहाली की निशानी थी और हमारे बचपन का सबसे पहला जीवंत खिलौना थी। लेकिन आज आधुनिकता के इस शोरगुल में वह नन्हीं चहचहाहट कहीं गुम हो गई है। कंक्रीट के जंगलों ने हमारे आँगनों को निगल लिया और उनके साथ ही विदा हो गए वे मासूम परिंदे, जो कभी हमारे साये में पनाह तलाशते थे।
आँगन का वो परिवारिक सदस्य और अमरूद के पेड़ों का शोर
गौरैया का इंसानों के साथ रिश्ता कोई औपचारिकता का नहीं, बल्कि गहरे अपनेपन का था। हमारे घरों की बनावट ऐसी हुआ करती थी कि दीवार घड़ी के पीछे, तस्वीर के फ्रेम के ऊपर, बिजली के मीटर के पास या छत की कड़ियों (शहतीरों) के बीच गौरैया का एक छोटा, तिनकों से बुना घोंसला ज़रूर होता था। दादी-नानी डाँटती थीं कि घोंसले को मत छूना, उसमें नन्हे अंडे हैं। जब उन अंडों से गुलाबी रंग के बेबस बच्चे बाहर निकलते और अपनी पीली चोंच खोलकर भूख से चीखते, तो पूरा घर उस दृश्य का साक्षी बनता था। वह घोंसला घर के किसी कोने का हिस्सा नहीं, घर के परिवार का विस्तार था।
शाम का नज़ारा तो और भी अद्भुत होता था। घर के पिछवाड़े या आँगन में लगे अमरूद, आम और अनार के पेड़ों पर शाम ढलते ही सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में गौरैयाँ जमा होने लगती थीं। उस वक़्त जो शोर, जो चहचहाहट गूँजती थी, वह प्रकृति का सबसे मधुर संगीत हुआ करती थी। दिनभर की थकान उस चहक के बीच कहीं बिला जाती थी। वे पेड़ सिर्फ़ लकड़ी और पत्तों के ढाँचे नहीं थे, बल्कि परिंदों के भरे-पूरे शहर थे।
आज जब शाम ढलती है, तो सन्नाटा चीखता है। वे अमरूद और अनार के दरख़्त तो कट ही गए, और जो एकाध बचे हैं, उन पर परिंदों का वह मेला अब नहीं लगता। एक भोला-भाला, मासूम परिंदा, जिसने कभी इंसानों को पराया नहीं समझा, अचानक हमारे जीवन से इस तरह ओझल हो गया कि हमें ख़बर तक न हुई।
बया: प्रकृति का अद्भुत वास्तुकार, जो इतिहास बन रहा है
गौरैया के साथ-साथ एक और मासूम जीव हमारी बेरुखी का शिकार होकर इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रहा है वह है ‘बया’ यानी वीवर बर्ड (Weaver Bird)। हल्के पीले और बादामी रंगों का यह मनमोहक परिंदा अपनी बनावट से ज़्यादा अपनी अद्भुत कारीगरी के लिए जाना जाता था।
गाँव की पगडंडियों, खेतों की मेड़ों, ताड़ और खजूर के पेड़ों या कुएँ के पास झुकी टहनियों पर हवा में झूलते बया के घोंसले किसी अजूबे से कम नहीं लगते थे। हरी-पीली घास के रेशों को अपनी नन्हीं चोंच से बुन-बुनकर, नीचे की ओर लटकता हुआ वह सुराहीदार या लालटेन-नुमा घोंसला जब हवा में झूलता था, तो ऐसा लगता मानो किसी महान शिल्पी ने प्रकृति के कैनवास पर कला का उत्कृष्ट नमूना टाँग दिया हो। मादा बया को रिझाने के लिए नर बया न जाने कितनी मेहनत से वह महफ़ूज़ आशियाना तैयार करता था।
आज गाँव-देहात तक में वे लटके हुए घोंसले देखने के लिए आँखें तरस जाती हैं। खजूर और बबूल के पेड़ काट दिए गए, खेतों में जहरीले कीटनाशकों की भरमार हो गई और उस नन्हे बुनकर के पैरों तले से उसकी घास और उसका वजूद दोनों छीन लिए गए।
कंक्रीट के जाल और विकिरण की मार: क्यों ख़ामोश हो गए ये गीत?
यह अचानक हुआ विलोपन किसी एक कारण की देन नहीं है, बल्कि हमारी तथाकथित तरक्की की अंधी दौड़ का नतीजा है:
-
आधुनिक वास्तुकला: हमारे नए फ्लैट, शीशे की बंद इमारतें और मॉडर्न इंटीरियर डिज़ाइनों में रोशनदान, शहतीर या मुंडेर जैसी कोई जगह ही नहीं बची। हमने अपने घरों को एयर-टाइट डिब्बों में बदल दिया, जहाँ किसी परिंदे के लिए तिनका रखने की भी गुंजाइश नहीं रही।
-
कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल: गौरैया और बया के नवजात बच्चे केवल अनाज नहीं खाते; शुरुआती दिनों में उनके विकास के लिए छोटे कीड़े-मकोड़े (कैटरपिलर) आवश्यक होते हैं। खेतों और बगीचों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के छिड़काव ने इन कीटों को समाप्त कर दिया, जिससे नन्हे चूजे भूख से तड़पकर घोंसलों में ही दम तोड़ने लगे।
-
पेड़ों की कटाई और नेटिव झाड़ियों का अभाव: कंक्रीट की सड़कों और पेविंग टाइल्स ने मिट्टी के उन कोनों को ढक दिया जहाँ पक्षी ‘डस्ट बाथ’ (मिट्टी से नहाना) करते थे। विदेशी सजावटी पौधों (Exotic Plants) ने हमारे देसी बेर, करौंदा, नीम और अमरूद की जगह ले ली, जिन पर ये पक्षी कभी घोंसला नहीं बना सकते।
-
मोबाइल टावरों का अदृश्य जाल: हवा में तैरती इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें (विकिरण) इन सूक्ष्म पक्षियों की दिशा-ज्ञान क्षमता (Navigation) और उनके प्रजनन चक्र को गहराई से प्रभावित कर रही हैं।
क्या आने वाली नस्लें इन्हें सिर्फ़ किताबों में देखेंगी?
यह सवाल आज हमारे ज़मीर पर एक भारी बोझ की तरह है। क्या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इन चिड़ियों को सिर्फ़ डिजिटल पर्दों, कविताओं और पुरानी किताबों के चित्रों में ही देख पाएँगी? अगर ऐसा हुआ, तो यह सिर्फ़ एक प्रजाति का विलुप्त होना नहीं होगा, बल्कि हमारे मानवीय संवेदना, हमारी संस्कृति और प्रकृति से हमारे आत्मिक जुड़ाव की मौत होगी।
प्रकृति का संतुलन एक धागे से बँधा है। जिस दिन ये छोटे परिंदे पूरी तरह ख़ामोश हो जाएँगे, उस दिन हमारे पर्यावरण का तंत्र इस तरह चरमराएगा कि उसकी भरपाई कोई तकनीक नहीं कर सकेगी।
उम्मीद की एक किरण: हम क्या कर सकते हैं?
गौरैया और बया को बचाने के लिए किसी बड़े आंदोलन की ज़रूरत नहीं, बस अपने घरों और दिलों में थोड़ी सी जगह खाली करने की दरकार है:
-
अपनी बालकनी, छत या खिड़की की मुंडेर पर मिट्टी के सकोरे में साफ़ पानी और दाना (बाजरा, कँगनी, चावल) रोज़ रखें।
-
बाज़ार में मिलने वाले या गत्ते/लकड़ी के बने छोटे कृत्रिम घोंसले (Nest Boxes) दीवारों या सुरक्षित ऊँचाइयों पर लगाएँ, जहाँ बिल्लियों और चीलों का ख़तरा न हो।
-
अपने बगीचों में विदेशी पौधों की जगह देसी झाड़ियाँ और फलदार पौधे (अमरूद, नींबू, करौंदा) लगाएँ।
-
रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग बंद करें और अपनी मिट्टी को प्राकृतिक रहने दें।
गौरैया सिर्फ़ एक चिड़िया नहीं, हमारे बचपन का वो आँगन है जो अब कंक्रीट में बदल चुका है। उस आँगन की रूह को बचाना है, तो हमें इन नन्हे पंखों को फिर से अपने घरों में पनाह देनी होगी। देर न हो जाए, इससे पहले कि सुबह की वो मासूम ‘चीं-चीं’ हमेशा के लिए एक ख़ामोश याद बनकर रह जाए।