सूने आँगन में गुमसुम दरख़्त सुबह की पहली किरण के साथ जब आँखें खुलती थीं, तो किसी कृत्रिम अलार्म की ज़रूर ...
सूने आँगन में गुमसुम दरख़्त सुबह की पहली किरण के साथ जब आँखें खुलती थीं, तो किसी कृत्रिम अलार्म की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। रोशनदान के कोने से आने वाली 'चीं-चीं' की लयबद्ध आवाज़ नींद को बड़ी नफ़ासत से त ...