इस्लामी दुनिया के नए ‘रणनीतिक नाटक’ का कच्चा-चिट्ठा
राजनीति, कूटनीति और पाखंड के संगम स्थल पर जब कभी कोई नया गठबंधन बनता है, तो दुनिया भर के विश्लेषक और पत्रकार अपनी-अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाने लगते हैं। हालिया सुगबुगाहट यह है कि तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान मिलकर एक नया सुरक्षा ढांचा एक प्रकार का “इस्लामी नाटो” खड़ा करने की फिराक में हैं। इस संभावित सैन्य संधि को लेकर भू-राजनीतिक गलियारों में एक अजीब सी हलचल मची है। कुछ लोग इसे इस्लामिक दुनिया के पुनरुत्थान के रूप में देख रहे हैं, तो कुछ इसे ताश के पत्तों से बने उस महल की तरह मान रहे हैं जो जरा सी हवा का झोंका भी नहीं झेल पाएगा।
लेकिन अगर इस पूरे परिदृश्य को गहरी नजर से देखा जाए, तो सतह के नीचे चमकती हुई इस कूटनीतिक चमक-दमक के पीछे वही पुराना, बासी और दीमक लगा ढांचा नजर आता है। इस संधि के होने या न होने से वैश्विक सत्ता के समीकरणों पर कोई बड़ा भूकम्प आने वाला नहीं है। जैसा सिस्टम अभी तक चल रहा था, वैसा ही आगे भी चलता रहेगा। हाँ, अगर कुछ बदलेगा तो वह है पाकिस्तान के सरकारी और गैर-सरकारी खजानों की मोटाई। इस पूरे सौदेबाजी के खेल में पाकिस्तान शायद एक बार फिर अपनी पुरानी फितरत के मुताबिक एक बड़ी रकम समेटने में जरूर कामयाब हो जाए।
“भिखारी की कोई पसंद नहीं होती”
पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक चरित्र को समझने के लिए किसी जटिल राजनीतिक सिद्धांत की आवश्यकता नहीं है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा खुद अपने और अपने देश के बारे में बोला गया एक डायलॉग जो कि कूटनीति के इतिहास में अमर हो चुका है, जिसमें उन्होंने बड़ी ईमानदारी (या शायद मजबूरी) में बोला था कि “भीख मांगने वालों को चुनने का अधिकार नहीं होता।“
यह वाक्य सिर्फ एक बयान नहीं है, बल्कि यह पिछले सात दशकों से पाकिस्तानी हुक्मरानों की विदेश नीति का घोषित और अघोषित घोषणापत्र रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस सिद्धांत पर टिकी है कि हाथ फैलाओ, जो मिले उसे स्वीकार करो, और जब कटोरा भर जाए तो उसे थोड़ा और बड़ा कर लो। इस कला में पाकिस्तान ने महारत हासिल कर ली है।
एक तरफ पाकिस्तान अपनी भौगोलिक और सामरिक स्थिति का दोहन करके चीन से अरबों डॉलर ऐंठता रहा है चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के नाम पर देश की संप्रभुता तक को गिरवी रख दिया गया है। दूसरी तरफ, अमेरिका के साथ उसके रिश्ते हमेशा से “भुगतान करो और सेवा लो” (Pay and Play) की तर्ज पर चलते रहे हैं। जब कभी अमेरिका को इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक रोटियां सेकनी होती हैं, वह पाकिस्तान की झोली में डॉलर डाल देता है। और अब, इस त्रिकोणीय खेल में तुर्की और सऊदी अरब को शामिल करके पाकिस्तान एक बार फिर अपने पुराने उस्तादों को यह अहसास कराना चाहता है कि “देखो, हमारे पास विकल्प मौजूद हैं।”
इस नए गठजोड़ से पाकिस्तान के वारे-न्यारे जरूर हो सकते हैं। हुक्मरानों की तिजोरियां भर सकती हैं, सेना के जनरलों के विदेशी बैंक खातों में कुछ और शून्य जुड़ सकते हैं, लेकिन आम पाकिस्तानी नागरिक की थाली की रोटी वहीं की वहीं, बल्कि और ज्यादा सूखी हुई मिलेगी।
तुर्की की महत्वाकांक्षाएं और सऊदी अरब का वित्तीय साम्राज्य
इस तथाकथित संधि के दूसरे दो प्रमुख स्तंभ तुर्की और सऊदी अरब अपनी अलग ही मजबूरियों और महत्वाकांक्षाओं से घिरे हैं।
तुर्की के राष्ट्रपति ओटोमन साम्राज्य के सुनहरे दिनों को वापस लाने की मानसिक कशमकश में लगातार ऐसे कूटनीतिक दांवपेंच खेलते रहते हैं, जिनका यथार्थ से दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता। तकनीकी और सैन्य क्षेत्र की बात की जाए, तो तुर्की इस तथाकथित तिकड़ी में सबसे आगे खड़ा है। ड्रोन निर्माण (जैसे बैरक्तार ड्रोन), रक्षा तकनीक और सैन्य साजो-सामान के मामले में तुर्की ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी एक खास पहचान बनाई है। तुर्की के पास वह तकनीक है जो पाकिस्तान के पास केवल ख्वाबों में है। लेकिन तकनीक और कूटनीतिक महत्वाकांक्षा होने के बावजूद, तुर्की की अपनी आर्थिक स्थिति भी किसी छिपे हुए खजाने जैसी नहीं है; वहां की मुद्रास्फीति और आर्थिक संकट जगजाहिर हैं। ऐसे में तुर्की का यह नया कूटनीतिक पैंतरा अपनी घरेलू जनता का ध्यान भटकाने और खुद को इस्लामी दुनिया के स्वयंभू खलीफा के रूप में पेश करने की एक और कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं है।
दूसरी ओर, सऊदी अरब है, जिसके राजाओं को अपनी सुरक्षा के लिए एक अदद सेना चाहिए क्योंकि सऊदी जनता किसी भी समस्या से लड़ना नहीं जानती वहां के लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए विदेशी सेनाएं चाहिए।उनके पास अथाह पेट्रो-डॉलर है। सऊदी अरब पिछली एक शताब्दी से अपनी सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका पर निर्भर रहा है। लेकिन बदलते वैश्विक घटनाक्रम में रियाद अब अपनी रणनीतिक स्वायत्तता दिखाना चाहता है। सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान सिर्फ एक ऐसा देश है जिसे पैसे देकर खरीदा जा सकता है या जरूरत पड़ने पर अपनी पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा के लिए किराए के सैनिक (Mercenaries) के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। सऊदी अरब के पैसे और तुर्की की तकनीक का यह मेल कागजों पर भले ही बहुत आकर्षक लगे, लेकिन जमीन पर इसका असर शून्य रहने वाला है।
“नाटो जैसी संधि” एक कागजी शेर या कूटनीतिक छलावा?
जब मीडिया में इस बात की चर्चा होती है कि ये देश “नाटो जैसी सैनिक संधि” कर रहे हैं, यह हास्यास्पद है। नाटो (NATO) का अनुच्छेद 5 (Article 5) यह कहता है कि गठबंधन के किसी भी सदस्य पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा। लेकिन क्या उसने कभी इस पर अमल किया है इसकी एक मिसाल रुस और यूक्रेन का युद्ध है लेकिन क्या कोई कल्पना कर सकता है कि तुर्की अपनी सेना को पाकिस्तान की किसी क्षेत्रीय जंग में झोंक देगा? या क्या सऊदी अरब अपनी तिजोरी का एक-एक पैसा पाकिस्तान के आंतरिक संघर्षों या भारत के साथ उसकी क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता में पानी की तरह बहा देगा?
यह एक सोच है इससे ज्यादा कुछ नहीं । यह तथाकथित संधि नाटो जैसी हो ही नहीं सकती, क्योंकि नाटो आपसी विश्वास, साझी लोकतांत्रिक मूल्यों (कम से कम वैचारिक स्तर पर) और एक मजबूत आर्थिक-सैन्य इंटीग्रेशन पर आधारित है। इसके विपरीत, तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान का यह गठजोड़ सिर्फ तात्कालिक स्वार्थों, पैसो के लेन-देन और एक-दूसरे को ब्लैकमेल करने की प्रवृत्ति पर टिका है। यह कोई स्थायी सुरक्षा छाता नहीं है, बल्कि एक ऐसा बाजार है जहाँ कूटनीतिक सौदेबाजी की जा रही है।
इस संधि से क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या असर पड़ेगा? इसका सीधा जवाब है: कुछ नहीं। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा। भारत अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा। पश्चिमी देश अपनी चालें चलते रहेंगे। चीन अपने निवेश को सुरक्षित रखने के लिए पाकिस्तान पर नकेल कसे रखेगा।
पाकिस्तान का नया खेल: चंदे के बक्से से कूटनीतिक ब्लैकमेल तक
पाकिस्तान के लिए यह नया समीकरण केवल एक और बहाना है दुनिया भर से चंदा जुटाने का। पाकिस्तान की पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था अब ‘भीख और भीख की कूटनीति’ पर आधारित हो चुकी है। जब देश चलाने के लिए आटा और बिजली खरीदने के पैसे न हों, तब इस प्रकार की भव्य सैन्य संधियों की बातें करना केवल आम जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक असफल प्रयास है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के उस कुख्यात बयान को अगर फिर से याद किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि देश के हुक्मरानों ने अपनी गरिमा को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नीलाम कर दिया है। आज वे चीन के आगे हाथ फैलाते हैं, कल अमेरिका के तलवे चाटते हैं, और परसों तुर्की और सऊदी अरब के सामने झोली फैलाकर खड़े हो जाएंगे। उनके लिए देश का सम्मान कोई मायने नहीं रखता, मायने रखता है तो सिर्फ यह कि अगला कर्ज का इंस्टॉलमेंट समय पर मिल जाए ताकि सत्ता की गाड़ी कुछ और दिन खिंच सके।
निष्कर्ष
अब अंत में, अगर इस पूरी कूटनीतिक कवायद का लेखा-जोखा निकाला जाए, तो नतीजा सिवाय निराशा और खोखले दावों के कुछ नहीं निकलता।
तुर्की अपनी तकनीकी धौंस जमाना चाहता है, सऊदी अरब अपने पैसों के दम पर इस्लामिक दुनिया का रहनुमा बने रहना चाहता है, और पाकिस्तान अपनी पुरानी आदत के मुताबिक इन दोनों से अपनी झोली भरने की जुगत में लगा है। यह तिकड़ी न तो कोई मजबूत सैन्य गठबंधन बना सकती है और न ही वैश्विक राजनीति के किसी भी समीकरण को पलटने की क़ूव्वत रखती है।
इतिहास गवाह है कि जो देश अपनी आंतरिक व्यवस्था को सुधारने के बजाय दूसरों के टुकड़ों पर पलने की आदत डाल लेते हैं, उनका हस्र अंततः कागजी शेरों जैसा ही होता है। तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान की यह तथाकथित संधि भी संभवतः एक दिन इतिहास के उस पन्ने में दफन हो जाएगी, जहाँ ऐसे अनगिनत असफल और स्वार्थी समझौतों की लाशें दबी हुई हैं।
मैदान में हवाएं बदलेंगी, गदहे अपनी चाल चलेंगे, और पाकिस्तान का कटोरा हमेशा की तरह थोड़ा सा और खनक उठेगा इसके सिवाय इस संधि से दुनिया के नक्शे पर एक इंच की भी तब्दीली नहीं आने वाली। सब कुछ वैसा ही रहेगा, जैसा हमेशा से चलता आया है।