हत्यारोपी पुलिस मुठभेढ़ में ढेर
Lucknow
लखनऊ 23 सितंबर 2026) उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के शंभुपुर गांव में अंधविश्वास और तांत्रिक अनुष्ठान की सनक ने एक बार फिर ऐसा खूनी तांडव मचाया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। घर में पूजा-पाठ और अनुष्ठान के लिए आए दो पुरोहितों समेत चार लोगों की निर्मम हत्या से सनसनी फैल गई है। इस भीषण घटना ने एक बार फिर समाज में गहरे तक पैठ बना चुके अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के साए पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खूनी संघर्ष: शुरुआती पुलिस पड़ताल और गवाहों के मुताबिक, घर के भीतर तंत्र-मंत्र और पूजा-पाठ के लिए पुरोहितों की मौजूदगी को देखकर आरोपी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया और वह अचानक हिंसक हो उठा, इस वीभत्स घटना में अपनी जान गंवाने वालों में दो पुरोहितों के अलावा खुद हत्यारे की पत्नी और उसका बेटा भी शामिल हैं, जो इस घरेलू हिंसा और सनक का शिकार बन गए।
पुलिस कार्रवाई: घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची। आत्मरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई जवाबी कार्रवाई में हत्यारा आरोपी भी पुलिस की गोली का शिकार होकर ढेर हो गया।
इस घटना से एक बात साफ हो गई कि यह केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है, बल्कि उस सामाजिक विमर्श का आइना है जहाँ अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और मानसिक अस्थिरता मासूमों की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। आधुनिकता के इस दौर में भी समाज का एक वर्ग किस प्रकार अमानवीय और हिंसक अंधकार में धंसता जा रहा है, यह एक गंभीर चिंता का विषय है।
वहीं उत्तरप्रदेश के ही शाहजहांपुर के गांव नत्थेपुर की श्मशान घाट की घटना ।जिसमें एक परिवार के बुज़ुर्ग की मौत, परिजनों की सिसकियां, आंखों में आंसुओं का सैलाब घर में छोड़कर शमशान में शवदाह करने के बाद चिता धू धू जलता छोड़कर परिजन कुछ देर के लिए वहां से हटे क्योंकि आसपास राख की गंध थी। कुछ ही देर में वापसी पर जहां शरीर को अग्नि को समर्पित किया गया था, कुछ तथाकथित ‘जीव’ अपनी क्षुद्र वासनाओं को शांत करने में व्यस्त थे।
चिता की पवित्र और जलाई जाने वाली लकड़ियों को निकालकर, उसी आग पर मुर्गा पकाया जा रहा था। जी हां, आपने सही पढ़ा। कोई और नहीं, बल्कि जिन लकड़ियों पर एक इंसान का शरीर पंचतत्व में विलीन हो रहा था, उसी चिता की अग्नि का दुरुपयोग मांस पकाने के लिए किया जा रहा था। जब मृतक के बेटों ने, जो अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर आए थे और जिनकी आंखें अभी सूखी भी नहीं थीं, इस अमानवीय कृत्य को अपनी आंखों से देखा, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने तुरंत उन दरिंदों को रंगे हाथों पकड़ लिया। यह दृश्य केवल एक घृणित अपराध नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है
क्या आपको लगता है कि समाज से इस तरह के अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के भ्रम को दूर करने के लिए केवल पुलिसिया कार्रवाई पर्याप्त है, या इसके खिलाफ किसी बड़े सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है?