वैश्विक रंगमंच पर बेनकाब होती महाशक्तियां
विश्व राजनीति के रंगमंच पर खुद को ‘सुपरपॉवर’ कहने वाले मुल्कों की हकीकत अब खुलकर सामने आ चुकी है। कभी अपनी एक उंगली के इशारे पर दुनिया की हुकूमतें बदलने का दावा करने वाली महाशक्तियां आज केवल कागजी शेर साबित हो रही हैं। वैश्विक बिसात पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि ताकत का घमंड अब मिट्टी में मिल रहा है।
एक तरफ रूस है, जो पिछले कई वर्षों से यूक्रेन के साथ लंबे और थकाऊ युद्ध में उलझा हुआ है। जिस देश को अपनी सैन्य ताकत का सबसे बड़ा गुमान था, वह महीनों-सालों की लड़ाई के बाद भी खुद को एक दलदल में फंसा पा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका है, जिसकी वैश्विक साख उसके खुद के फैसलों और नीतियों की वजह से तार-तार हो चुकी है।
इतिहास गवाह है कि अफगानिस्तान की जमीन से अमेरिका को जिस अपमानजनक स्थिति में बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा, उसने दुनिया को बता दिया कि आधुनिक हथियारों की चमक हर जगह काम नहीं आती। इसके बाद भी सबक सीखने के बजाय उसने वेनेजुएला जैसे मुल्कों की राजनीति में जबरन दखल देकर सत्ता परिवर्तन का खेल खेला। जब यही रणनीति उसने ईरान पर आजमाने की कोशिश की, तो उसे मुंह की खानी पड़ी।
अमेरिका ने ईरान को एक कमजोर और सामान्य मुल्क समझने की भारी भूल की। ईरान पर पिछले पचास वर्षों से कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोपे गए हैं, उसे वैश्विक मंच पर अकेला करने की हर मुमकिन कोशिश की गई, लेकिन इस स्वाभिमानी राष्ट्र ने दुनिया को दिखा दिया कि अकेले पड़ने से इरादे कमजोर नहीं होते। ईरान ने अमेरिकी धौंस को दरकिनार करते हुए उसके वर्चस्व को गहरी चोट पहुंचाई है। जहां बाकी दुनिया तमाशबीन बनकर चुप बैठी रही, वहीं ईरान ने यह साबित कर दिया कि आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान किसी भी प्रतिबंध से बड़े होते हैं।
इस गिरते वर्चस्व के बीच शीर्ष अमेरिकी नेतृत्व की मानसिक स्थिति और फैसले भी गंभीर सवालों के घेरे में हैं। वैश्विक मामलों में लिए जा रहे अनर्गल और मनमाने फैसले यह दर्शाते हैं कि सत्ता ऐसे हाथों में है जो जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुके हैं। एप्स्टीन फाइलों जैसी घिनौनी और शर्मनाक सच्चाइयों के सार्वजनिक पटल पर आने के बाद नैतिक धरातल पूरी तरह ढह चुका है। जब अंदरूनी तौर पर चेहरा दागदार हो, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंसानियत और शांति की बात करना केवल एक ढकोसला बनकर रह जाता है।
अमेरिका ने दुनिया भर में खुद को आधुनिक सभ्यता और लोकतंत्र के प्रतीक के तौर पर पेश किया, लेकिन उसके कुछ बूढ़े, सत्तालोलुप और संकीर्ण सोच वाले नेताओं ने उस साख को खाक में मिला दिया है। आज अमेरिकी जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे अपने देश की बागडोर किसी युवा, ऊर्जावान और दूरदर्शी नेतृत्व के हाथों में सौंपेंगे, जो साम्राज्यवादी मानसिकता को छोड़कर सिर्फ आंतरिक विकास और वास्तविक प्रगति पर ध्यान दे?
यूरोपीय मुल्कों में कानून और जवाबदेही को सर्वोपरि माना जाता है, लेकिन उसी व्यवस्था के भीतर अमेरिकी नेतृत्व को जिस तरह वैश्विक नियमों की धज्जियां उड़ाने की खुली छूट मिली हुई है, वह बेहद चिंताजनक है। पूरे विश्व बाजार पर मनमाने टैरिफ थोपना, व्यापारिक संधियों को तोड़ना और आर्थिक दादागिरी दिखाना ऐसे फैसले हैं जिनका भयानक और दूरगामी असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। आने वाले समय में यह आर्थिक तानाशाही वैश्विक मंदी और टकराव को जन्म देगी।
सुपरपॉवर का दौर अब खत्म हो चुका है। दुनिया अब किसी एक मुल्क की जागीर नहीं रही। जब तक ताकतवर देश इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक वे युद्ध, आर्थिक संकट और वैश्विक बेइज्जती के भंवर में इसी तरह फंसते रहेंगे।