New Delhi
नई दिल्ली (10 अक्तूबर 2026)वैश्विक कूटनीति के रंग भी बहुरूपियो की तरह कैसे बदलते हैं, इसका एक ताज़ा और शानदार उदाहरण वाशिंगटन से सामने आया है। कभी भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने पर आँखें दिखाने और आर्थिक दंड या टैरिफ की धौंस देने वाला ट्रंप प्रशासन अब खुद मॉस्को के साथ डीजल का नया इश्क फरमाने की तैयारी में है। लगता है अमेरिकी अर्थशास्त्र की डिक्शनरी में नैतिकता की परिभाषा अब पूरी तरह बदल चुकी है जहाँ दूसरों के लिए रूस का तेल ‘पाप’ है, वहीं खुद के लिए वही तेल ‘व्यावहारिक आवश्यकता’ का पवित्र जल बन जाता है।
इस करिश्माई यू-टर्न से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। कीव से मिल रही खबरों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के इस दोहरे मापदंड को देखकर ज़ेलेंस्की इस कदर आगबूबला हुए कि उनके खेमे में सन्नाटे के साथ-साथ गहरी खीझ भी साफ देखी जा सकती है। जब भारत ने अपनी 140 करोड़ की आबादी की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पश्चिमी देशों के फंदे से बचकर रियायती रूसी तेल खरीदा था, तब अमेरिकी नीति-निर्माताओं ने इसे मॉस्को के युद्ध कोष को भरना करार दिया था। लेकिन अब जब बात खुद अमेरिका की ऊर्जा जरूरतों की आई, तो सारे नैतिक उसूल और प्रतिबंध कागजी हवाई जहाजों की तरह उड़ते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के उस पुराने और शाश्वत नियम पर मुहर लगाता है “नियम और उसूल सिर्फ दूसरों को उपदेश देने के लिए होते हैं, पालन करने के लिए नहीं।” बहरहाल, इस ताजा घटनाक्रम ने दुनिया को एक बार फिर याद दिला दिया है कि वैश्विक मंच पर हर देश की नैतिकता उसकी अपनी तिजोरी के आकार से तय होती है। अब देखना यह है कि ट्रंप प्रशासन अपने इस नए ‘डीजल प्रेम’ को कीव के सामने किस कूटनीतिक चाशनी में डुबोकर परोसता है।