राजस्थान के झुनझुने में रहने वाली दीपिका पिछले दो सालों से NEET-UG की तैयारी कर रही है। दिन में 12 से 15 घंटों तक पढ़ती है। पहली बार उसे मनचाहे अंक नहीं मिले, इसलिए उसने एक और साल मेहनत की। इस बार उसे अपनी पसंद की रैंक मिलने की उम्मीद थी। बचपन से उसका सपना डॉक्टर बनकर एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में सेवा देने का है। लेकिन परीक्षा के बाद जब NEET को लेकर विवाद और परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे, तो उसकी खुशी चिंता में बदल गई। इस बार दीपिका सिर्फ अपनी सीट को लेकर परेशान नहीं थी। उसे लग रहा था कि अगर लाखों छात्र-छात्राएं वर्षों की मेहनत करते हैं, तो उन्हें एक निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा मिलनी चाहिए। यही सोच धीरे-धीरे हजारों छात्रों की सामूहिक आवाज बन गई। लाखों छात्र दिल्ले के जंतर मंतर पर एकजुट हो गए और अपने हक़ की लड़ाई खुद लड़ने का फैसला किया। यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है क्या यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा के खिलाफ था, या उसने Gen Z के मन में चल रहे डर, दबाव, न्याय की उम्मीद और बदलाव की चाह को भी सामने ला दिया? क्या आज का युवा केवल गुस्से में है, या वह अपने भविष्य पर भरोसा बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है? इन सभी सवालों के जवाब हम साइकोलॉजिकल पहलू से समझे हैं।
Gen Z के मन में चल रहे 3 बड़े मनोवैज्ञानिक द्वंद्व
आत्म-संदेह और अपनी मेहनत पर सवाल
फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में छात्र महीनों या वर्षों तक लगातार मेहनत करते हैं। अगर ऐसे में परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो कई छात्रों के मन में यह भावना पैदा हो सकती है कि उनकी मेहनत का सही मूल्यांकन होगा भी या नहीं। इसका असर केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आत्मविश्वास और प्रेरणा पर भी पड़ सकता है। कुछ छात्र अपनी तैयारी और क्षमता पर भी सवाल उठाने लगते हैं, जबकि वास्तविक समस्या व्यवस्था से जुड़ी हो सकती है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में आत्म-संदेह बढ़ना एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया हो सकती है।
सामूहिक चिंता और भविष्य को लेकर अनिश्चितता (Collective Anxiety)
डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया NEET जैसी परीक्षा लाखों युवाओं के करियर से जुड़ी होती है। जब परीक्षा को लेकर विवाद, कानूनी प्रक्रियाएं या लगातार बदलती खबरें सामने आती हैं, तो छात्रों में भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है। सोशल मीडिया पर लगातार अपडेट, चर्चाएं और अफवाहें भी इस चिंता को और बढ़ा सकती हैं। कई छात्रों के मन में यह सवाल उठने लगता है अब मेरे भविष्य का क्या होगा?” मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि लंबे समय तक बनी रहने वाली ऐसी अनिश्चितता तनाव, बेचैनी, नींद की समस्या और पढ़ाई में एकाग्रता की कमी जैसी परेशानियों को जन्म दे सकती है।
अन्याय की भावना से बदलाव की मांग
डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि आज का युवा केवल निराश होकर चुप नहीं बैठता। जब उसे लगता है कि उसके साथ या उसके साथियों के साथ अन्याय हुआ है, तो वह अपनी बात संगठित तरीके से रखने की कोशिश करता है। मनोविज्ञान में इसे प्रोएक्टिव कोपिंग (Proactive Coping) या मनोवैज्ञानिक सशक्तिकरण (Psychological Empowerment) से जोड़ा जाता है। यानी व्यक्ति समस्या को स्वीकार कर चुप रहने के बजाय समाधान और जवाबदेही की मांग करता है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर छात्र की प्रतिक्रिया एक जैसी हो; कुछ छात्र आवाज उठाते हैं, जबकि कुछ तनाव और निराशा के कारण खुद में सिमट भी सकते हैं।
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना क्या Gen-Z की आदत है?
विशेषज्ञ के अनुसार अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना केवल Gen-Z की विशेषता नहीं है बल्कि हर दौर में युवाओं ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज की पीढ़ी के पास सोशल मीडिया, मीम्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे नए माध्यम हैं, जिनसे उनकी आवाज़ अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचती है। डॉक्टर नेहा ने बताया कि युवाओं में जोखिम लेने (Risk Taking) का स्वभाव अधिक होता है। यही कारण है कि वे बदलाव लाने के लिए आगे आते हैं। हालांकि कई बार दूरगामी परिणामों की बजाय तत्काल परिस्थितियों पर अधिक ध्यान देने के कारण उन्हें प्रभावित (Manipulate) करना भी अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
क्या NEET री-एग्जाम ने छात्रों के मनोबल को तोड़ा?
विशेषज्ञ ने बताया कि NEET पेपर लीक और री-एग्जाम की घोषणा का छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा। कई छात्र सालों से तैयारी के बाद परीक्षा देकर मानसिक रूप से राहत महसूस करने लगे थे, लेकिन दोबारा परीक्षा की खबर ने उनका आत्मविश्वास और मनोबल कमजोर कर दिया। दोबारा परीक्षा देना हमेशा बेहतर प्रदर्शन की गारंटी नहीं होता। डॉक्टर नेहा के मुताबिक ऐसा जरूरी नहीं कि दोबारा परीक्षा का मौका मिलने से छात्र बेहतर प्रदर्शन करें। परीक्षा से पहले बनने वाला मानसिक फोकस और तैयारी का चरम स्तर दोबारा उसी तरह हासिल करना आसान नहीं होता। इसलिए री-एग्जाम कई छात्रों के लिए अतिरिक्त मानसिक दबाव बन जाता है। दोबारा परीक्षा का मतलब केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि यात्रा, रहने, कोचिंग, मॉक टेस्ट और अन्य खर्चों का दोबारा बोझ भी है। कई छात्र आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं, जहां माता-पिता पहले ही भारी आर्थिक दबाव में पढ़ाई का खर्च उठा रहे होते हैं।
जैन जी की आत्महत्या करना दबाव या तनाव
डॉक्टर नेहा ने बताया लगातार तनाव, भविष्य की चिंता और दोबारा परीक्षा के दबाव के कारण कुछ छात्रों ने आत्महत्या जैसे गंभीर कदम भी उठाए। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति थी। विशेषज्ञ का मानना है कि NEET आंदोलन केवल Gen-Z का आंदोलन नहीं था। इसमें माता-पिता भी उतने ही भावनात्मक रूप से जुड़े थे, क्योंकि उनके बच्चों का भविष्य और वर्षों की मेहनत दांव पर लगी हुई थी।
छात्रों का आंदोलन न्याय की मांग या फिर डर था
डॉक्टर नेहा के मुताबिक छात्रों के मन में केवल डर नहीं था, बल्कि न्याय की मांग भी थी। छात्रों को लगा कि यदि उनके साथ अन्याय हुआ है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी आवाज़ उठाना उनका अधिकार है। मेहनती छात्रों को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। साइकोलोजिस्ट ने बताया जिन छात्रों ने ईमानदारी से तैयारी कर परीक्षा दी, उन्हें लगा कि पेपर लीक की घटना ने उनकी मेहनत पर सवाल खड़ा कर दिया। इससे उनमें व्यवस्था के प्रति अविश्वास और निराशा की भावना पैदा हुई।