हिन्दी सिनेमा एक मनोरंजन का साधन मात्र नहीं इसमें भारतीय कला वह अनमोल रत्न भी इसका ऐसा हिस्सा हैं जिनके बिना इसे हम पूरा नही कर सकते इन्ही कुछ ऐसे रत्नों को याद करने की कोशिश मात्र हेै जिनसे आज की युवा पीढ़ी लगभग अनजान हैं मेरी यह कोशिश रहेगी कि मैं आप तक उन लोगों के जीवन से जुड़े कुछ किस्से और उनके यादगार गीतऔर संगीत को एक बार फिर आपके सामने लेकर आऊं।
प्रेम धवन भारतीय सिनेमा के उन दुर्लभ फनकारों में से हैं जिन्हें केवल “गीतकार” कहना उनकी प्रतिभा के साथ अधूरा न्याय होगा। 1950 और 60 के दशक के उस स्वर्णिम दौर में, जहाँ साहिर लुधियानवी की शायरी में तल्खी थी, शैलेंद्र के पास मिट्टी की सोंधी खुशबू थी और मजरूह सुल्तानपुरी के लफ्जों में रूमानियत थी वहीं प्रेम धवन ने अपनी एक सर्वथा अलग और बहुआयामी पहचान बनाई।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रेम धवन. सोर्स: BollywooDirect – Medium साभार (गूगल)
एक संपूर्ण कलाकार का कैनवास
प्रेम धवन को सबसे अलग बनाती थी उनकी बहुमुखी प्रतिभा। वे केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि संगीत और नृत्य की बारीकियों में भी पारंगत थे:
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शास्त्रीय नृत्य और कोरियोग्राफी: उन्होंने पंडित रविशंकर और उस्ताद अलाउद्दीन खान के सानिध्य में संगीत समझा और प्रसिद्ध नर्तक उदय शंकर से नृत्य की तालीम ली। सिनेमा में वे गीत लिखने के साथ-साथ कई फिल्मों में कोरियोग्राफर (नृत्य निर्देशक) भी रहे।
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संगीत निर्देशन: फिल्म शहीद (1965) में उन्होंने न केवल अमर गीत लिखे, बल्कि उनका कर्णप्रिय और ओजस्वी संगीत भी स्वयं तैयार किया।
देशभक्ति गीतों की अमर विरासत
जब भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम या राष्ट्रप्रेम की बात होती है, प्रेम धवन के तराशे शब्द सबसे पहले जुबां पर आते हैं। मनोज कुमार की फिल्म शहीद के लिए उनके लिखे गीत आज भी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक हैं:
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“ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम”
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“मेरा रंग दे बसंती चोला”
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“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” (बिस्मिल की पंक्तियों को सिनेमाई सांचे में ढालना)
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“छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी” (फिल्म हम हिंदुस्तानी)
बहुआयामी रंगों के गीत
प्रेम धवन की लेखनी केवल देशभक्ति तक सीमित नहीं थी। भावुकता, रूमानियत और चुलबुलेपन में भी उनका कोई सानी नहीं था:
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गीत |
फिल्म |
भाव / मिजाज |
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ऐ मेरे प्यारे वतन |
काबुलीवाला (1961) |
मातृभूमि के प्रति विरह और समर्पण |
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तेरी दुनिया से होके मजबूर चला |
पवित्र पापी (1970) |
दर्द और विवशता |
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अगर बेवफा तुझको पहचान जाते |
रात के अंधेरे में (1969) |
शिकवा और टूटे दिल की दास्तां |
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बन के पंछी गाए प्यार का तराना |
अनाड़ी (1959) |
सहज उल्लास और सादगी |
इप्टा (IPTA) के जन-आंदोलनों से निकलकर मुख्यधारा के रूपहले पर्दे तक का उनका सफर सीधे जनता के सरोकारों से जुड़ा रहा। कलम, धुन और थिरकन तीनों विधाओं पर एक जैसा अधिकार रखने वाले प्रेम धवन सचमुच हिंदी सिनेमा की अनोखी पहचान रहे।
फिल्म ‘शहीद’ (1965) भारतीय सिनेमा के इतिहास में देशभक्ति फिल्मों का मील का पत्थर मानी जाती है। सरदार भगत सिंह के जीवन पर आधारित इस फिल्म के गीतों और संगीत ने आज़ादी के दीवानों के जज़्बे को अमर कर दिया।
इस फिल्म के संगीतकार और गीतकार दोनों की ज़िम्मेदारी प्रेम धवन ने संभाली थी। ‘शहीद’ के गानों की रचना और निर्माण से जुड़े कुछ बेहद दिलचस्प और भावुक कर देने वाले किस्से इस प्रकार हैं:
1. गीतकार से संगीतकार बनने का अप्रत्याशित मौका
फिल्म के निर्माता केवल कश्यप और मुख्य अभिनेता मनोज कुमार पहले इस फिल्म का संगीत किसी बड़े संगीतकार से करवाना चाहते थे। प्रेम धवन को केवल गीत लिखने के लिए बुलाया गया था।
मनोज कुमार ने प्रेम धवन से भगत सिंह और उनके साथियों के मिजाज पर आधारित कुछ धुनें गुनगुनाने को कहा। जब प्रेम धवन ने अपनी बनाई धुनों में “ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम” और “मेरा रंग दे बसंती चोला” गाकर सुनाया, तो मनोज कुमार इतने अभिभूत हो गए कि उन्होंने तुरंत फैसला लिया “इस फिल्म का संगीत प्रेम धवन के अलावा कोई और नहीं देगा।” इस तरह एक गीतकार को पूरी फिल्म का स्वतंत्र संगीतकार बनने का अवसर मिला।
2. भगत सिंह की माता जी की आंखों में आंसू
फिल्म की तैयारी के दौरान मनोज कुमार और प्रेम धवन पंजाब में शहीद भगत सिंह की माता, विद्यावती जी से मिलने गए थे।
कहा जाता है कि जब प्रेम धवन ने उनके सामने हारमोनियम पर “ऐ वतन ऐ वतन” और “मेरा रंग दे बसंती चोला” गाकर सुनाया, तो माता विद्यावती जी की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने प्रेम धवन की पीठ थपथपाई और कहा कि इन शब्दों में उन्हें अपने बेटे और उसके साथियों की रूह महसूस हो रही है। यह आशीर्वाद इस फिल्म के संगीत की सबसे बड़ी पूंजी बन गया।
3. ‘ऐ वतन ऐ वतन’ और मोहम्मद रफ़ी की भावुकता
“ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम” जब रिकॉर्ड हो रहा था, तो स्टूडियो का माहौल बेहद भावुक था।
मोहम्मद रफ़ी ने जब इस गीत को अपनी आवाज़ दी, तो अंतिम अंतरे तक पहुंचते-पहुंचते उनकी आवाज़ में स्वाभाविक कंपन और गहरा दर्द आ गया था। रिकॉर्डिंग खत्म होने के बाद रफ़ी साहब ने प्रेम धवन को गले लगाया और कहा कि बहुत समय बाद किसी गीत ने उनके रोंगटे खड़े किए हैं। यह गीत आगे चलकर हर राष्ट्रीय पर्व पर बजाया जाने वाला अनिवार्य तराना बन गया।
4. ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’: सामूहिक जोश की मिसाल
यह गीत जेल में फांसी के तख्ते की ओर बढ़ते हुए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के अटूट साहस को दर्शाता है।
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प्रेम धवन ने इस पारंपरिक लोक-गीत की आत्मा को बरकरार रखते हुए इसमें नए शब्द और नई ऊर्जा भरी।
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गीत को महेन्द्र कपूर, मुकेश, और राजेंद्र मेहता ने मिलकर गाया था।
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गायकों की आवाज़ों का तालमेल और प्रेम धवन का वाद्य-संयोजन इतना सटीक था कि सुनते ही ऐसा आभास होता है जैसे वाकई नौजवान क्रांतिकारी हंसते-हंसते शहादत को गले लगाने जा रहे हों।
5. ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ को सिनेमाई रूप देना
रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की अमर पंक्तियों “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” को हर भारतीय जानता था, लेकिन उसे एक लयबद्ध, ओजस्वी और सिनेमाई गीत का रूप देना बहुत बड़ी चुनौती थी।
प्रेम धवन ने बिस्मिल के मूल भाव से कोई छेड़छाड़ किए बिना अतिरिक्त पंक्तियां जोड़ीं और इसे शास्त्रीय पुट देते हुए मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी और राजेंद्र मेहता के स्वरों में रिकॉर्ड कराया। यह गीत आज भी आज़ादी के संघर्ष का सबसे सशक्त प्रतीक माना जाता है।
6. बिना किसी पश्चिमी वाद्य के विशुद्ध भारतीय संगीत
उस दौर में हिंदी फिल्मों में पाश्चात्य वाद्यों (ऑर्केस्ट्रा, गिटार, वायलिन सेक्शंस) का खूब प्रयोग होने लगा था। लेकिन प्रेम धवन ने तय किया था कि वे ‘शहीद’ में केवल भारतीय वाद्यों ढोलक, तबला, हारमोनियम, शहनाई और बांसुरी का प्रमुखता से उपयोग करेंगे, ताकि मिट्टी की खुशबू और मिट्टी का दर्द सीधे श्रोताओं के दिल तक पहुंचे।
प्रेम धवन द्वारा ‘शहीद’ (1965) के लिए रचा गया संगीत केवल मनोरंजन नहीं था; यह स्वाधीनता संग्राम के वीरों के प्रति एक निष्ठावान कलाकार की संगीतमय श्रद्धांजलि थी, जो छह दशक बाद भी उतनी ही ताज़ा और प्रेरणादायक लगती है।