आधुनिक साम्राज्यवाद का घिनौना चेहरा
बीसवीं सदी का उदय विश्व युद्ध से हुआ था लेकिन उत्तरार्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक का वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य शक्ति, पाखंड और सभ्यतागत संघर्षों की एक त्रासद गाथा के रुप में याद किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वयं को न्याय, मानवाधिकार और तथाकथित ‘नियम-आधारित विश्व व्यवस्था’ का देवदूत या संरक्षक घोषित करने वाली पश्चिमी ताकतों ने वास्तव में दुनिया को केवल युद्ध, अस्थिरता और मानवीय संकट दिए हैं। इस वैश्विक राजनीति के केंद्र में आज जो सबसे ज्वलंत यथार्थ उभरकर सामने आया है, वह यह है कि पश्चिमी प्रतिबंधों और कूटनीतिक आक्रामकता के विशाल तंत्र के सामने ईरान न केवल डटा रहा, बल्कि उसने खुद को एक पीड़ित राष्ट्र के रूप में स्थापित करते हुए पश्चिमी दोहरे चरित्र को अंतरराष्ट्रीय जनमानस के सामने पूरी तरह बेपर्दा कर दिया है।
जिस समय संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक अधिवेशनों के इस भव्य और वातानुकूलित सभागार जब दुनिया भर के नेताओं के औपचारिक भाषणों से गूंजते हैं, उनकी कृत्रिम कूटनीति के पीछे की सच्चाई किसी से छिपी नहीं रहती। सही तौर पर यह मंच आज पीड़ित मानवता के उद्धार का साधन नहीं, बल्कि केवल शक्तिशाली राष्ट्रों का अखाड़ा और औपचारिकता की आड़ में सहानुभूति का खोखला प्रदर्शन बनकर रह गया है।
सभ्यतागत स्वाभिमान बनाम आधुनिक साम्राज्यवाद
विश्व की पुरानी सभ्यताओं की कतार में शामिल ईरान केवल आधुनिक सीमाओं में बंधा एक राष्ट्र-राज्य नहीं है, बल्कि वह सहस्राब्दियों पुरानी फ़ारसी सभ्यता का वारिस है। उस सभ्यता का, जिसने दर्शन, विज्ञान, साहित्य, स्थापत्य और राज्य-प्रशासन के क्षेत्र में मानव जाति के लिए अमूल्य योगदान दिया। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से पिछले करीब पचास वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस प्रकार एक प्राचीन सभ्यता को घुटनों पर लाने के लिए आधुनिक विश्व के सबसे क्रूर आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया।
पिछले पचास वर्षों से लगातार जारी आर्थिक पाबंदियों, तिरस्कारों, वित्तीय बहिष्कारों, व्यापारिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक घेराबंदी को झेलते हुए ईरान ने अपने सभ्यतागत अभिमान आत्मसम्मान पर किसी प्रकार का आघात नही लगने दिया। जिस प्रकार के प्रतिबंधों का सामना ईरान ने दशकों तक किया है, कोई साधारण राष्ट्र उस दबाव में होता, तो उसकी प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक ताना-बाना कुछ ही दिनों में बिखर जाता। लेकिन इसके विपरीत, ईरान ने न केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा की, बल्कि अपनी वैज्ञानिक क्षमता, रक्षा उद्योग और क्षेत्रीय कूटनीतिक प्रभाव का ऐसा विस्तार किया जिसने पश्चिमी रणनीतिकारों के सारे गणित बर्बाद कर दिए । पुराने समय की रोमन और ईरानी सभ्यता की जो कहानियां हमने सुनी थी, वह ईरान चरित्तार्थ करके दिखाई, कि जब किसी स्वाभिमानी कौम की अस्मिता पर हमला होता है, तो उसका प्रतिरोध किसी भी तकनीकी या आर्थिक दबदबे से कहीं अधिक दृढ़ साबित होता है।
पश्चिमी सभ्यता का नैतिक पतन: आधुनिकता का खोखला आवरण
अमेरिका और उसके कई यूरोपीय सहयोगियों ने सदियों से दुनिया को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि पश्चिमी मूल्य ही वैश्विक प्रगति का एकमात्र पैमाना हैं। लोकतंत्र, स्वतंत्रता, मानवाधिकार और कानून के शासन जैसे शब्दों को वैश्विक स्तर पर एक नैतिक अस्त्र की तरह प्रचारित किया गया। लेकिन इसको व्यावहारिक धरातल पर वास्तविकता इसके ठीक उलट ही पाया गया । आधुनिकता के चमकदार आवरण के पीछे केवल दुर्बल और विकासशील देशों पर अपने मनमाने आर्थिक व सामरिक रौब जमाने की औपनिवेशिक लालसा ही काम करती रही है।
पश्चिमी प्रभुत्व का यह पाखंड आज पूरी दुनिया के सामने सूखे पत्तों की तरह बिखर चुका है। एक तरफ जहां पश्चिम अपने रणनीतिक हितों की बात करता है, तो उसके लिए किसी भी देश की संप्रभुता कोई मायने नहीं रखतीकरोड़ों लोगों के जीवन से उन्हे कुछ लेना देना नही होता। लैटिन अमेरिका से लेकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक, चुनी हुई सरकारों को उखाड़कर, कठपुतली शासनों की स्थापना करना और अपने हथियारों के कारखानों को चालू रखने के लिए संप्रभु राष्ट्रों को युद्ध की आग में झोंकना ही कुछ पश्चिमी देशों की विदेश नीति का स्थायी चरित्र रहा है। सभ्यता और श्रेष्ठता के वे सारे दावे, जिन्हें पश्चिमी विचारक ज्ञानोदय की उपज बताते हैं, गैर-पश्चिमी समाजों के दमन के औजार के रुप में सामने आए हैं।
आर्थिक नाकाबंदी: अदृश्य नरसंहार का आधुनिक हथियार
इन आधुनिक राष्ट्रों में युद्ध केवल तोपों, मिसाइलों और बमवर्षक जहाजों से ही नहीं लड़े जाते; आधुनिक युग का सबसे अमानवीय युद्ध ‘आर्थिक नाकाबंदी’ से लड़ा जा रहा है। पश्चिम, विशेष रूप से वाशिंगटन से संचालित प्रतिबंध तंत्र सामूहिक दंड का वह क्रूर रूप है जो किसी सीधे सैन्य आक्रमण से कहीं ज्यादा घातक है।
इन आधुनिक समाज के लोगों के अनुसार जब किसी देश पर व्यापक वित्तीय और व्यापारिक प्रतिबंध थोपे जाते हैं, तो उसका सीधा प्रभाव सत्ता प्रतिष्ठान पर पड़ने से पहले वहां के आम नागरिकों, बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है:
- दवाइयों व चिकित्सा उपकरणों का अभाव: स्विफ्ट प्रणाली से बाहर किए जाने और विदेशी मुद्रा लेन-देन पर रोक के चलते जीवनरक्षक दवाइयों, कैंसर के उपचार की सामग्रियों और बाल-स्वास्थ्य से जुड़ी अनिवार्य वस्तुओं का आयात शून्य बना दिया जाता है।
- भुखमरी और मुद्रास्फीति: कृषि उपकरणों, उर्वरकों और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़कर समाज के निचले और मध्यम वर्ग को भुखमरी के लिए धकेला जाता है।
- मानवीय संवेदनहीनता: जहां एक तरफ पश्चिम यह दावा करता है कि उसके प्रतिबंध ‘मानवीय सहायता’ पर लागू नहीं होते, वहीं दूसरी ओर बैंकिंग और बीमा क्षेत्र पर लगाए गए कड़े द्वितीयक प्रतिबंध यह तय कर देते हैं कि कोई भी वैश्विक संस्था मानवीय सहायता पहुंचाने का जोखिम न ले सके।
इस प्रकार के आर्थिक साधनों के जरिए पूरे समाज को घुटनों पर लाने की यह सुनियोजित रणनीति आधुनिक युद्ध अपराध नहीं है? मासूम नागरिकों की बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं को छीनकर अपनी राजनीतिक शर्तें मनवाने की यह पॉलिसी किसी भी तरह से सभ्य समाज का आचरण नहीं हो सकती।
युद्ध का माहौल और भू-राजनीतिक कालाबाजारी
इस साम्राज्यवादी व्यवस्था का सबसे भयानक पहलू उसका ‘सैन्य-औद्योगिक गठजोड़’ है। कुछ पश्चिमी शक्तियों की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा दुनिया भर में अस्थिरता बनाए रखने पर टिका है जिन्हे हम इंसानी रुप में परजीवी कहेंगे ।इनके मुताबिक पश्चिम एशिया में शांति स्थापित हो जाए, अगर पड़ोसी देश आपसी संवाद से अपने मतभेद सुलझा लें, तो वाशिंगटन, लंदन और पेरिस की हथियार निर्माता कंपनियों के अरबों डॉलर के ठेकों क्या होगा ?
इसके चलते ही हर दशक में एक नए संकट, एक नए ‘खलनायक’ और एक काल्पनिक खतरे की पटकथा तैयार की जाती है। युद्ध का माहौल बनाकर:
- क्षेत्र के अमीर खाड़ी देशों के शासकों में असुरक्षा का भय पैदा किया जाता है और उन्हें खरबों डॉलर के रक्षा सौदे खरीदने के लिए विवश किया जाता है।
- इस डर के माहौल में ऊर्जा बाजारों में बनावटी उतार-चढ़ाव पैदा कर तेल और गैस की कीमतों को नियंत्रित किया जाता है।
- डॉलर की वैश्विक मुद्रा साख के रूप में स्वीकार्यता को बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अनैतिक एकाधिकार स्थापित रखा जाता है।
यह सारी पटकथा भू-राजनीतिक कालाबाजारी के अलावा और कुछ नहीं है, जहां निर्दोष लोगों का खून पश्चिमी कॉरपोरेट मुनाफे की स्याही बन जाता है।
2015 का परमाणु समझौताः संधियों के साथ विश्वासघात
कूटनीति में विश्वसनीयता को ही सबसे बड़ा गुण माना जाता है, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिकी कूटनीति का इतिहास समझौतों को तोड़ने और वादों से मुकरने का रहा है। इसका स्पष्ट और ज्वलंत उदाहरण 2015 का ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ यानी ईरान परमाणु समझौता था। वर्षों की जटिल बहुपक्षीय वार्ताओं के बाद, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्य और जर्मनी शामिल थे, यह समझौता अस्तित्व में आया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने दर्जनों बार आधिकारिक तौर पर प्रमाणित किया कि ईरान समझौते की प्रत्येक शर्त का पूरी निष्ठा से पालन कर रहा था।
इसके बावजूद, 2018 में अमेरिकी प्रशासन ने बिना किसी वैध आधार के एकतरफा तरीके से इस बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय समझौते को फाड़ फेंका और ईरान पर पहले से कहीं अधिक कठोर ‘अधिकतम दबाव’ की नीति लागू कर दी। यह केवल एक संधि से हटने का मामला नहीं था; यह अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों की शुचिता पर एक सीधा प्रहार था। इसने यह सिद्ध कर दिया कि वाशिंगटन के साथ किया गया कोई भी लिखित समझौता तब तक ही मूल्यवान है, जब तक वह उसके क्षणिक राजनीतिक हितों के अनुकूल है। समझौते करने के नाम पर धोखा देना और फिर पीड़ित पक्ष पर ही शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाना पश्चिमी कूटनीति की पहचानी हुई कार्यशैली है।
वर्तमान ईरान अमेरिका विवाद में अमेरिका की धरती पर जिसप्रकार ईरान ने अपना पक्ष रखा और विश्वस्तर पर अमेरिका के 250 वर्षों के गौरवपूर्ण इतिहास पर स्याही फेर डाली यह एक बड़ा शर्मनाक पल था जब यूएन में ईरान के राष्ट्रपति ने ईरान के सुप्रीम लीडर और स्कूली बच्चियों के स्कूल बैग दिखाकर इस आधुनिक सभ्यता का चरित्र उजागर किया।
अमेरिकी लोकतंत्र का संकट: ढाई सौ वर्षों का सबसे विकृत दौर
2026 के इस ऐतिहासिक मोड़ पर, जब संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक और नैतिक ढांचा अपने इतिहास के शायद सबसे पतनशील और कमजोर दौर से गुजर रहा है। जिस राष्ट्र ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर अपनी नींव रखने का दावा किया था, उसका मौजूदा नेतृत्व और प्रशासनिक वर्ग पूरी तरह वैचारिक दिवालियापन और आंतरिक विभाजन का शिकार हो चुका है।
वर्तमान अमेरिकी प्रशासन न केवल घरेलू स्तर पर संस्थागत अविश्वास, सामाजिक ध्रुवीकरण और अनियंत्रित नस्लीय व वर्गीय विषमताओं को संभालने में विफल रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी नीतियां हताशा और दिशाहीनता का परिचय देती हैं। दुनिया भर में अपनी गिरती साख को बचाने के लिए यह प्रशासन और अधिक आक्रामक, गैर-जिम्मेदाराना और मनमाने फैसलों पर उतर आया है। अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभु समानता और कूटनीतिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर लिए जा रहे ये फैसले यह दर्शाते हैं कि साम्राज्य का पतन जब निकट होता है, तो उसका आचरण सबसे अधिक विध्वंसक हो जाता है।
संयुक्त राष्ट्र: शक्ति का अखाड़ा और सहानुभूति का भ्रम
द्वितीय विश्व युद्ध की राख से जिस संयुक्त राष्ट्र की स्थापना इस संकल्प के साथ की गई थी कि आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाएगा, वह सदा ही दंतविहीन संस्था बनकर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के वर्तमान अधिवेशन का दृश्य किसी भी विचारशील व्यक्ति के मन में क्षोभ ही उत्पन्न कर सकता है।
| संयुक्त राष्ट्र का मूल उद्देश्य | वर्तमान यथार्थ |
| सभी सदस्य देशों की संप्रभु समानता | चुनिंदा सदस्यों की ‘वीटो शक्ति’ का दुरुपयोग |
| अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय की रक्षा | पश्चिमी हितों के अनुसार नियमों में बदलाव |
| मानवीय संकटों और युद्धों की रोकथाम | केवल प्रस्ताव पारित करना और शक्तिहीन आयोग गठित करना |
| विवादों का निष्पक्ष मध्यस्थता से समाधान | शक्तिशाली देशों के राजनीतिक एजेंडे को वैध ठहराने का मंच |
जब भी कोई कमजोर स्वाभिमानी, स्वतंत्र चेतना वाला देश पश्चिमी हितों के आड़े आता है, तो संयुक्त राष्ट्र के मंच से उस पर प्रतिबंध थोपने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे अलग-थलग करने के लिए किया जाता है। वहीं जब अमेरिका या उसके सहयोगी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, संप्रभु देशों पर आक्रमण करते हैं, या अंतरराष्ट्रीय संधियों को रौंदते हैं, तो यही मंच पूरी तरह मूकदर्शक बन जाता है। इस अधिवेशन का परिणाम भी पिछले कई अधिवेशनों की तरह ही पहले से तय है कुछ तीखे भाषण, कागजी प्रस्ताव, पीड़ितों के प्रति झूठी और औपचारिकता मात्र सहानुभूति, और अंततः यथास्थिति की बहाली। शक्ति के इस असंतुलित ढांचे में न्याय की अपेक्षा करना एक सबसे बड़ी भूल है।
यह आचरण मानवता कहलाने के योग्य है?
एक शक्ति संपन्न समूह अपने आर्थिक स्वार्थों के लिए लाखों मासूमों के मुंह से निवाला छीन ले, अस्पतालों को जीवनरक्षक दवाओं से वंचित कर दे, समाज में कृत्रिम भुखमरी फैलाए, इसके साथ ही टेलीविजन कैमरों के सामने आकर खुद को मानव गरिमा का सबसे बड़ा रक्षक बताए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है: क्या ये लोग स्वयं को इंसान कहलाने के लायक हैं?
मानवता जो कि जीवों में सबसे उच्च स्थान पर मानी जाती है केवल जैविक शरीर या विकसित तकनीकों से इसे नही बताया जा सक्ता । मानवता की कसौटी के लिए करुणा, न्याय, वादों की विश्वसनीयता और दूसरों के अस्तित्व व आत्मसम्मान के प्रति आदर भाव है। जब एक सभ्यता दूसरी सभ्यता को सिर्फ इसलिए मिटा देने या गुलाम बना लेने पर उतारू हो जाए कि वह उसके आर्थिक और वैचारिक आधिपत्य को स्वीकार नहीं कर रही किसी के स्वाभिमान पर आघात करने वाली, ऐसी सभ्यता अपनी मानवीय चेतना खो चुकी होती है। आधुनिकता और तथाकथित श्रेष्ठता के दावों के पीछे छिपा यह वहशीपन उस पाषाण युग से भी बदतर है, जहां कम से कम नियमों और नैतिकता का झूठा पाखंड तो नहीं रचा जाता था।
एक बहुध्रुवीय विश्व की अपरिहार्यता
ईरान का पिछले पचास वर्षों का संघर्ष केवल एक देश की भौगोलिक लड़ाई नहीं है; यह उसके स्वाभिमान आत्मस्म्मान के लिए एकध्रुवीय वैश्विक तानाशाही के विरुद्ध बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की मांग का एक जीवंत प्रतीक के रुप में सामने आई है। पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव ने ईरान को भीतर से आत्मनिर्भर बनाया और उसने वैश्विक शक्तियों को यह संदेश दिया कि प्रतिबंध किसी संप्रभु राष्ट्र की आवाज को हमेशा के लिए दबाने का अचूक हथियार नहीं होते।
आज जब एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की बहुसंख्यक आबादी वैश्विक मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान और हिस्सेदारी की मांग कर रही है, तब पश्चिम की यह औपनिवेशिक मानसिकता खुद उसके अपने अलग-थलग पड़ने का कारण बन रही है। शक्ति का नशा कितना भी प्रबल क्यों न हो, इतिहास इस बात का साक्षी है कि अन्याय, आर्थिक ब्लैकमेलिंग और संधियों के साथ विश्वासघात की बुनियाद पर खड़े साम्राज्य कभी अमर नहीं रहे।
संयुक्त राष्ट्र के औपचारिक सभागारों में पीड़ितों के प्रति दिखाई जाने वाली खोखली सहानुभूति की अब दुनिया को आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है एक ऐसे वैकल्पिक वैश्विक तंत्र की, जहां राष्ट्रों की संप्रभुता का मूल्यांकन उनके सैन्य बजट या डॉलर भंडार से नहीं, बल्कि उनके सभ्यतागत आत्मसम्मान और मानवीय न्याय के प्रति उनकी निष्ठा से हो। जब तक यह चेतना पूरी दुनिया में नहीं जागती, तब तक आधुनिक साम्राज्यवाद का यह नग्न नृत्य और स्वाभिमानी राष्ट्रों का यह ऐतिहासिक प्रतिरोध जारी रहेगा।