New Delhi
हमारी पुरानी पीढ़ियों ने इतिहास सिर्फ किताबों में और अपने बड़ों के मुंह से सुना था। लेकिन वर्तमान की युवा पीढ़ी हर दिन बदलते इतिहास को एक चल चित्र की तरह देख रही है। किसतरह से वर्तमान राजनीति में असमाजिक चरित्रहीन और थोपे हुए राजनेता बड़े बड़े देशों की सत्ता को हथियाए बैठे हैं।
आज सत्ता पर आसीन होने का सबसे बड़ा साधन किसी भी देश का पूंजीपति वर्ग है ये वर्ग जिसको चाहे उसे सत्ता पर बिठा देता है। चाहे उस देश की जनता उसका घोर विरोध करती हो। इसका एक सबसे सटीक और जव्लंत उदाहरण हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है।
याद रखिए इतिहास केवल तारीखों और युद्धों का लेखा-जोखा नहीं होता; इतिहास उन अंतरात्माओं की चीखों का दस्तावेज भी होता है, जिन्हें व्यवस्था की चक्की में पीस दिया जाता है। पड़ोसी देश पाकिस्तान की धरती इन दिनों एक ऐसे ही अभूतपूर्व और गंभीर राजनीतिक चौराहे पर खड़ी है, जहां लोकतंत्र के बुनियादी स्तंभ हिल चुके हैं और जनता का सब्र अब बांध तोड़कर सड़कों पर उतरने को मजबूर है।
पख्तून बाहुल पेशावर से उठी एक हुंकार ने पूरे दक्षिण एशिया के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक और देश के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की कैद के तीन साल पूरे होने के मौके पर, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के नेतृत्व ने आगामी 27 सितंबर को इस्लामाबाद की तरफ़ विशाल मार्च करने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। यह केवल एक राजनीतिक दल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ एक जनाक्रोश है, जिसे जनता के ऊपर थोपा गया था, और जिसे जनता अपने अधिकारों का हनन मानती है। यह लेख इसी पूरी घटना के आईने में पाकिस्तान की बदलती राजनीतिक दशा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता के हनन, और एक राष्ट्र के रूप में वहां के नागरिकों के संघर्ष की एक गंभीर और मार्मिक दास्तां बयान करता है।
तीन साल की काल कोठरी और न्याय की उम्मीद
अगस्त 2023 से शुरू हुआ यह दौर पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास का सबसे काला अध्याय कहा जा सकता है। एक ऐसा इंसान जिसका पूरा जीवन केवल अपने देश का मानसम्मान बढ़ाने में लगा रहा जिस समय वह एक क्रिकेटर था उस समय उसने अपने देश की टीम को उस ऊचाई तक पहुंचाया जो किसी आम खिलाड़ी के बस की बात नही थीवह करोड़ो दिलों की धड़कन था, पाकिस्तान क्रिकेट टीम को विश्व कप जितवाया ,और उसके बाद में एक जननेता के रूप में सत्ता के शिखर तक पहुंचा, लेकिन अपने स्वाभिमान और वैचारिक राजनीतिक पूर्वाग्रहों के चलते सलाखों के पीछे है।
पेशावर में आयोजित उस विशाल जनसभा में जब पार्टी के नेताओं ने यह बताया कि इमरान खान को एकांत कारावास में रखा गया है, और उनकी कानूनी टीम, डॉक्टरों व परिवारिक सदस्यों तक से उनकी सुगम मुलाकात पर पहरे बिठा दिए गए हैं, तो यह सिर्फ एक कैदी की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं रह जाती। यह मानवाधिकारों के हनन का एक ऐसा जीवंत उदाहरण है, जहां राज्यसत्ता अपनी ही जनता के लोकप्रिय प्रतिनिधि से सहमी हुई नजर आती है।
पार्टी नेतृत्व का साफ कहना कि “हम न्याय मांग रहे हैं, खैरात नहीं”, यह इस बात का प्रतीक है कि देश काअधिकांश वर्ग अपनी वैधानिक और लोकतांत्रिक अस्मिता के लिए किस कदर बेचैन है। उनकी मांगें बेहद बुनियादी हैं पूर्व प्रधानमंत्री और उनकी पत्नी के मामलों की सुनवाई पारदर्शी तरीके से मेरिट पर हो, तथा उन्हें उनके वकीलों और चिकित्सकों से मिलने की अनुमति दी जाए। लेकिन जब इन बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए भी अदालतें आंखें मूंदे नजर आने लगें, तो सड़कों पर उतरना जनता की मजबूरी बन जाता है।
लेकिन दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार ने विदेशी मीडिया कई चैनलों पर प्रतिबंध लगाया है, उससे सरकार शक के घेरे में आ गई है।
स्वतंत्रता न्यायपालिका पर प्रश्नचिह्न और संवैधानिक संशोधन
किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की रीढ़ उसकी स्वतंत्र न्यायपालिका होती है। लेकिन गत वर्षों में पाकिस्तान में जिस प्रकार के संवैधानिक बदलाव हुए हैं विशेषकर 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से उसने न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
समीक्षकों और विपक्षी दलों का लगातार आरोप रहा है कि इन संशोधनों का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका के पर कतरना और अदालतों को कार्यपालिका के इशारों पर चलाना था। जब न्याय के मंदिर ही सत्ता के गलियारों के दबाव में बेबस नजर आने लगें, तो आम नागरिक का न्याय प्रणाली से भरोसा उठना लाजिमी है। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री का यह कहना कि अदालतें अब स्वतंत्र रूप से न्याय देने में असमर्थ हैं, इस बात की तस्दीक करता है कि देश की न्यायव्यवस्था किस गहरे संकट से गुजर रहा है।
जब सारे कानूनी और न्यायिक रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तब संविधान का अनुच्छेद नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है। 27 सितंबर को इस्लामाबाद की तरफ कूच करने का अल्टीमेटम अचानक लिया गया आवेशपूर्ण फैसला नहीं है, बल्कि यह तमाम लोकतांत्रिक दरवाजों के बंद हो जाने के बाद एक अनिवार्य विवशता है।
आर्थिक बदहाली और सुरक्षा का संकट
इस तरह राजनीतिक उठापटक का दूरगामी असर हमेशा देश की आम जनता की जेब, थाली और उसकी सुरक्षा पर पड़ता है। अप्रैल 2022 में सत्ता परिवर्तन के बाद से पाकिस्तान ने जिस आर्थिक बदहाली और महंगाई की मार को झेला है, उसने गरीबों का जीना मुहाल कर दिया है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी, आसमान छूती महंगाई और बेलगाम कर्ज ने देश की अर्थव्यवस्था को आईसीयू में ला खड़ा किया है।
इसके साथ ही, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में एक बार फिर अराजकता आतंकवाद और असुरक्षा का जो तांडव शुरू हुआ है, उसने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। एक समय जो क्षेत्र शांति की राह पर अग्रसर थे, वे आज फिर से रक्तरंजित हो रहे हैं। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेताओं का कहना है कि वर्तमान शासन व्यवस्था ने न केवल देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था को तबाह किया है, बल्कि पड़ोसी देशों (जैसे ईरान, अफगानिस्तान और चीन) के साथ ऐतिहासिक कूटनीतिक रिश्तों को भी चोट पहुंचाई है, क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से बड़ा खतरा है।
दमन चक्र बनाम जनभावनाओं का ज्वार
इतिहास गवाह है जब-जब जनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठाई है, तब-तब राज्य की दमनकारी मशीनरी ने उसे कुचलने का प्रयास किया है। कंटेनर लगाकर सड़कों को रोकना, इंटरनेट सेवाएं ठप करना, रातों-रात घरों पर छापे मारना और हजारों कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंसना किसी भी जन-आक्रोश को नहीं रोक पाया है।
लाहौर, रावलपिंडी और कराची से लेकर पेशावर तक आए दिन जिस प्रकार पुलिसिया कार्रवाई और लाठीचार्ज की खबरें सामने आती हैं, वे यह दर्शाती हैं कि सत्ताधारी दल विपक्ष के वैचारिक विरोध का सामना तर्कों से करने के बजाय बल प्रयोग से करना चाहते हैं। महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरें इस पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करती हैं।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इस बात से भी सहमति रखते हैं कि दमन का यह चक्र जितना गहरा होगा, जनता में प्रतिरोध की आग उतनी ही भड़केगी। इमरान खान की व्यक्तिगत स्वतंत्रता भले ही छिन ली गई हो, लेकिन उनके प्रति जनता का जो जनसमर्थन खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान की सड़कों पर उमड़ रहा है, वह यह साबित करता है कि विचारों को जेल की सलाखों के पीछे कैद नहीं किया जा सकता।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और मानवीय चिंताएं
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल, द्वारा बार-बार उठाई गई चिंताएं इस बात का प्रमाण हैं कि मामला केवल एक देश की घरेलू राजनीति का नहीं बचा है, बल्कि यह बुनियादी मानवाधिकारों के संरक्षण का वैश्विक मुद्दा बन चुका है।
पूर्व प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य और उनकी उम्र को लेकर परिवार और पार्टी की जताई जा रही आशंकाएं बहुत गंभीर हैं। जब कोई सरकार किसी पूर्व शासक और लोकप्रिय नेता को जेल के भीतर चिकित्सीय उपेक्षित और एकांतवास का शिकार बनाती, तो यह उस देश की लोकतांत्रिक परिपक्वता पर एक बड़ा बदनुमा दाग होता है। दुनिया भर में बसे पाकिस्तानियों और मानवाधिकार प्रेमियों की यह अपेक्षा है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इस अलोकतांत्रिक दमन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे।
27 सितंबर की दिशा और पाकिस्तान का भविष्य
आगामी 27 सितंबर की तारीख पाकिस्तान के राजनीतिक भविष्य के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हो सकती है। एक तरफ जहां सरकार और शक्तिशाली प्रतिष्ठान इस मार्च को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ PTI का यह संकल्प है कि यदि न्याय नहीं मिला तो देश के कोने-कोने से लोग इस्लामाबाद की सड़कों पर उतरेंगे।
यह समय पाकिस्तान के हुक्मरानों के लिए आत्ममंथन का है। शक्ति के बल पर जनता की आवाज़ को दबाने का इतिहास कभी सफल नहीं रहा है। दमन की दीवारों से लोकतंत्र को ज्यादा देर तक नहीं रोका जा सकता। यदि समय रहते न्यायपालिका को स्वतंत्र नहीं किया गया, राजनीतिक बंदियों को रिहा नहीं किया गया और देश को संवैधानिक मार्ग पर वापस नहीं लाया गया, तो यह असंतोष एक ऐसे विप्लव का रूप ले सकता है, जिसे संभालना किसी के वश में नहीं होगा।
आज पाकिस्तान की धरती पर लोकतंत्र सिसक रहा है, और वहां का आम नागरिक एक अदद न्याय की तलाश में आसमान की ओर ताक रहा है। 27 सितंबर का मार्च केवल इस्लामाबाद की सड़कों की ओर बढ़ता हुआ एक काफिला नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का अंतिम फैसला होगा कि क्या पाकिस्तान में तानाशाही की रात लंबी होगी, या फिर जनता के संघर्ष से लोकतंत्र का नया सवेरा उगेगा। उत्तर अब इतिहास के पन्नों पर लिखा जाना बाकी है।