जम्मू-कश्मीर को क्यों चाहिए पर्यटन का एक नया दृष्टिकोण?

गुलमर्ग की छाया से आगे

दशकों से जम्मू-कश्मीर का पर्यटन मुख्य रूप से एक ही त्रिकोण के इर्द-गिर्द घूमता रहा है: डल झील और हाउसबोट के लिए श्रीनगर, देवदार के जंगलों और नदियों के लिए पहलगाम, और मखमली घास के मैदानों व स्कीइंग के लिए विश्व प्रसिद्ध गुलमर्ग। जब भी किसी नए जिले या इलाके में आर्थिक विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने की बात उठती है, तो स्थानीय स्तर पर सबसे पहली मांग यही उभरती है: “हमारे यहाँ भी गोंडोला (केबल कार) लगाइए, इसे गुलमर्ग जैसा बनाइए।”

लेकिन विधानसभा में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का यह स्पष्ट बयान कि “हर पर्यटन स्थल को गुलमर्ग नहीं बनाया जा सकता”, आधुनिक पर्यटन योजना की एक बेहद कड़वी और जरूरी सच्चाई को सामने रखता है। केवल एक केबल कार लगा देने से पर्यटकों की भीड़ की गारंटी नहीं मिलती, और न ही किसी एक सफल मॉडल की अंधी नकल से हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण को बचाया जा सकता है।

1. “गोंडोला गारंटी” का भ्रम

गुलमर्ग गोंडोला समुद्र तल से 13,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर अफरवात चोटी तक जाता है और दुनिया के सबसे ऊंचे चालू केबल कार नेटवर्क में गिना जाता है। यह राजस्व का बड़ा जरिया है और कश्मीर के शीतकालीन पर्यटन का प्रमुख प्रतीक भी।

लेकिन यह मान लेना कि केवल रोपवे बना देने से कोई भी जगह रातों-रात गुलमर्ग बन जाएगी, जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना है:

  • प्राकृतिक भूगोल और बर्फ की गुणवत्ता: गुलमर्ग को जो चीज खास बनाती है, वह है इसका ढलान और भारी ‘पाउडर स्नो’, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्कीइंग के लिए मुफीद है। हर पहाड़ी ढलान में स्कीइंग या विंटर स्पोर्ट्स के लिए जरूरी ऊंचाई, कोण और बर्फबारी की अनुकूलता नहीं होती।
  • पटनीटॉप का उदाहरण: जैसा कि सरकार ने उल्लेख किया, जम्मू संभाग के पटनीटॉप में आधुनिक स्काईव्यू गोंडोला मौजूद है। इसके बावजूद वहाँ आने वाले पर्यटकों और राइडर्स की संख्या गुलमर्ग के मुकाबले काफी कम रहती है। बिना व्यापक मांग के केवल ढांचा खड़ा करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।
  • भारी लागत और रख-रखाव: ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में केबल कार लगाना और उसे चालू रखना करोड़ों रुपये का दीर्घकालिक खर्च मांगता है। यदि स्थानीय स्तर पर नियमित मांग न हो, तो यह निवेश घाटे का सौदा बन जाता है।

कृत्रिम ढांचे से प्राकृतिक आकर्षण पैदा नहीं किया जा सकता। बुनियादी ढांचे का काम किसी स्थान की मौजूदा ताकत को निखारना होना चाहिए, न कि उसकी पहचान को जबरन बदलना।

2. पहचान का संरक्षण: दूधपथरी का उदाहरण

इस नीतिगत बदलाव को समझने के लिए मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में स्थित दूधपथरी सबसे सटीक उदाहरण है। ‘दूध की घाटी’ के नाम से मशहूर यह इलाका अपनी हरी-भरी मखमली ढलानों, देवदार के घने जंगलों और शालिगंगा नदी की कलकल करती धाराओं के लिए जाना जाता है।

दूधपथरी की असली पूंजी उसकी शांति और अछूता प्राकृतिक सौंदर्य है। यदि वहाँ विशाल होटल परिसर, लगातार चलने वाले केबल कार टावर और भारी व्यावसायिक बाजार खड़े कर दिए जाएं, तो वह अपनी वही पहचान खो देगा जिसके लिए लोग शहर के शोर से दूर वहाँ आते हैं।

दूधपथरी के लिए एक संतुलित विकास मॉडल इस प्रकार काम कर सकता है:

  1. शुरुआती विंटर स्पोर्ट्स और ड्रैग लिफ्ट: गुलमर्ग की तरह विशाल पर्वत-व्यापी गोंडोला बनाने के बजाय, दूधपथरी में स्थानीय युवाओं और शुरुआती पर्यटकों को स्कीइंग सिखाने के लिए ड्रैग लिफ्ट स्थापित की गई है। इससे यह क्षेत्र शुरुआती विंटर स्पोर्ट्स के लिए एक सीखने का केंद्र बन रहा है।
  2. मुख्य मैदान से बाहर पार्किंग (क्रालपथरी): स्वदेश दर्शन 0 के तहत क्रालपथरी के पास 400 गाड़ियों की क्षमता वाला ट्रांजिट हब और पार्किंग क्षेत्र तैयार किया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि निजी गाड़ियां मुख्य घास के मैदानों तक न पहुंचें, जिससे प्रदूषण और ट्रैफिक जाम से बचा जा सके।
  3. नियोजित वे-साइड सुविधाएं: अरीगाम-रेयरइच मार्ग पर स्थानीय विक्रेताओं और पर्यटकों के लिए व्यवस्थित स्टॉल और सुविधाएं चिन्हित की गई हैं, ताकि रास्तों पर अनियंत्रित अतिक्रमण न हो।

3. पारिस्थितिक चुनौती: ‘ओवर-टूरिज्म’ से बचाव

हिमालयी क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अत्यंत संवेदनशील है। पर्यटकों का पूरा दबाव यदि केवल दो या तीन प्रसिद्ध हिल स्टेशनों पर ही केंद्रित रहेगा, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आते हैं:

समस्या अत्यधिक दबाव वाले स्थलों पर असर नए स्थलों के लिए टिकाऊ विकल्प
कचरा प्रबंधन टनों प्लास्टिक कचरा और गंदगी, जो स्थानीय नगरपालिकाओं की क्षमता से बाहर हो जाती है। पहले दिन से ‘ज़ीरो सिंगल-यूज़ प्लास्टिक’ और ‘लीव नो ट्रेस’ (कचरा वापस लाने) के कड़े नियम।
ट्रैफिक जाम गर्मियों और भारी बर्फबारी के दिनों में संकरी पहाड़ी सड़कों पर घंटों लंबा जाम। बफर पार्किंग जोन, नियमित इलेक्ट्रिक शटल बसें और वाहनों की संख्या पर नियंत्रण।
पानी और सीवरेज बड़े कंक्रीट होटलों द्वारा प्राकृतिक जलस्रोतों का दोहन और दूषित पानी का झरनों में रिसाव। बड़े होटलों के बजाय स्थानीय लकड़ी आधारित ‘होमस्टे’ (Homestays) को बढ़ावा देना।
आर्थिक असमानता पर्यटन से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा बाहरी बड़ी कंपनियों तक सीमित रहना। स्थानीय गाइड, खच्चर/टट्टू संचालक और स्थानीय भोजनालयों के जरिए गांवों तक सीधी आय।

4. नए नक्शे की तलाश: जम्मू और कश्मीर का विविधीकरण

पर्यटन का वास्तविक लाभ तभी है जब उसकी आर्थिक भागीदारी दूरदराज के हर जिले तक पहुंचे। इसके लिए दोनों संभागों में अलग-अलग अनुभवों को विकसित करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है:

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│    जम्मू-कश्मीर पर्यटन विविधीकरण योजना  │

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[तीर्थ और सांस्कृतिक सर्किट]      [प्रकृति और एडवेंचर]         [विरासत और बॉर्डर टूरिज्म]

  • मानसर और सुरिंसर झीलें       • भद्रवाह (मिनी कश्मीर)       • बसोहली कला व वाटर स्पोर्ट्स
  • शिव खोड़ी गुफा               • गुरेज और बंगस घाटी         • खान साहब और द्रुंग ट्रेल्स
  • उत्तरबहनी और पुरमंडल         • वारवन अल्पाइन ट्रेक         • सुचेतगढ़ सीमा पर्यटन

 

जम्मू संभाग की सालभर की क्षमता

जम्मू को केवल माता वैष्णो देवी यात्रा के ट्रांजिट पॉइंट के रूप में देखने की सोच बदल रही है:

  • चिनाब घाटी में रोमांच: भद्रवाह और किश्तवाड़ जैसे इलाके भीड़भाड़ से मुक्त अल्पाइन ट्रेकिंग और साहसिक खेलों के लिए बेहतरीन विकल्प हैं।
  • जलक्रीड़ा और कला: बसोहली का रणजीत सागर बांध वॉटर स्पोर्ट्स के उभरते केंद्र के रूप में और अपनी विश्व प्रसिद्ध लघु चित्रकला (Miniature Paintings) के लिए सांस्कृतिक पहचान रखता है।
  • तीर्थ सर्किट: मानसर, शिव खोड़ी, सुधमहादेव और सुकराला माता को आपस में जोड़कर श्रद्धालुओं के प्रवास को कई दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।

कश्मीर के छोटे सूक्ष्म-गंतव्य (Micro-Destinations)

खान साहब, द्रुंग, पुष्कर, हब्बर, शोपलियां और नोवगाम जैसी जगहों पर किसी 5-स्टार रिसॉर्ट की जरूरत नहीं है। इन जगहों को डे-हाइकिंग (दिन की ट्रेकिंग), बर्ड वाचिंग, देहाती संस्कृति और प्रकृति प्रेमियों के शांत ठहराव के रूप में संवारा जा सकता है।

5. एक उत्कृष्ट गंतव्य के पाँच बुनियादी स्तंभ

हर जगह की नकल करने के बजाय भविष्य का पर्यटन मॉडल इन पाँच बातों पर केंद्रित होना चाहिए:

[प्रामाणिकता]  ──►  स्थानीय वास्तुकला, पारंपरिक खान-पान और लोक कला का संरक्षण।

[बुनियादी ढांचा]──►  साफ-सुथरे सार्वजनिक शौचालय, सुरक्षित सड़कें और प्राथमिक चिकित्सा।

[समुदाय]       ──►  बाहरी बड़े ढांचों के बजाय ग्रामीणों के होमस्टे को वित्तीय प्रोत्साहन।

[सहनशीलता सीमा] ──►  घास के मैदानों की क्षमता (Carrying Capacity) के अनुसार प्रवेश सीमा।

[विशिष्ट पहचान] ──►  हर जगह को उसकी अपनी खूबी के आधार पर प्रचारित करना, नकल के आधार पर नहीं।

 

  1. स्थान की मौलिकता: गुरेज जाने वाला पर्यटक पारंपरिक लकड़ी के घर और स्थानीय संस्कृति देखना चाहता है, न कि कांच और कंक्रीट से बना कोई व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स।
  2. मूलभूत आवश्यकताएं पहले: करोड़ों के रोपवे से पहले यात्रियों के लिए साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, साइनबोर्ड और मोबाइल नेटवर्क सुनिश्चित करना अधिक जरूरी है।
  3. होमस्टे संस्कृति: स्थानीय लोगों को अपने घरों में पर्यटकों को ठहराने के लिए प्रेरित करने से आम परिवारों को सीधा रोजगार मिलता है और पर्यटकों को प्रामाणिक कश्मीरी और डोगरा आतिथ्य का अनुभव होता है।
  4. कैरीइंग कैपेसिटी (सहनशीलता सीमा): हर प्राकृतिक स्थल की एक तय सीमा होती है कि वह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कितने लोगों का भार उठा सकता है। इस सीमा का वैज्ञानिक आकलन कर पर्यटकों की संख्या नियमित की जानी चाहिए।

निष्कर्ष

जम्मू-कश्मीर को बीस अलग-अलग गुलमर्ग की आवश्यकता नहीं है। उसे एक ऐसा गुलमर्ग चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के शीतकालीन खेलों के उच्चतम मानकों पर कायम रहे, और साथ ही दर्जनों ऐसे छोटे, शांत व विशिष्ट स्थल चाहिए जो अपनी प्राकृतिक व सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखें।

हर पहाड़ पर केबल कार टांगने की दौड़ से हटकर स्थानीय विशिष्टता को पहचानना ही सतत और समझदारी भरे विकास की सही दिशा है।

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