Indian stand on us oil game रूसी डीजल, अमेरिकी पाखंड और भारत का सीधा सवाल

us president trump
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अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में पाखंड सदैव होता आया है, लेकिन जब पाखंड बेशर्मी का चोगा पहनकर दुनिया के सामने खड़ा हो जाए, तो वैश्विक व्यवस्था की नींव हिलने लगती है। हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा रूसी डीजल और ऊर्जा उत्पादों पर प्रतिबंधों में दी गई छूट तथा अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों के लिए मास्को के साथ किया गया व्यावहारिक समझौता आधुनिक कूटनीति के सबसे नग्न विरोधाभासों में से एक है। वही अमेरिका, जिसने महीनों और वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खड़े होकर बाकी दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाया, जिसने भारत जैसे संप्रभु देशों को रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने पर प्रतिबंधों, सेकेंडरी सैंक्शंस और वित्तीय बहिष्कार की धमकियां दीं आज वही अमेरिका जब अपने देश में मुद्रास्फीति और ईंधन की कीमतों से घिरा, तो उसने रातों-रात अपने ही थूके हुए चाटते हुए सिद्धांतों की तिलांजलि दे दी।

यह केवल एक ऊर्जा सौदे का प्रश्न नहीं है; यह उस साम्राज्यवादी मानसिकता पर एक तीखा सवालिया निशान है जो विश्व को दो अलग-अलग तराजू में तोलने की आदी रही है। जब पश्चिमी देशों के घर ठंडे होने लगें या उनकी अर्थव्यवस्थाओं में ईंधन की कमी से असंतोष भड़कने लगे, तब उनका हर समझौता “व्यावहारिक राष्ट्रीय हित” बन जाता है; लेकिन जब विकासशील दुनिया अपने करोड़ों नागरिकों के पेट और जेब की रक्षा के लिए स्वतंत्र व्यापार करती है, तो उसे “युद्ध वित्तपोषण” और “अनैतिकता” का लेबल थमा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड वैश्विक मंच पर चीख-चीखकर पूछ रहा है: क्या वैश्विक नियम केवल कमजोरों को बांधने के लिए हैं, जबकि शक्तिशाली देश जब चाहें अपनी सुविधानुसार उनसे मुक्त हो सकते हैं?

12वीं शताब्दी का सामंती भ्रम

वाशिंगटन के सत्ता गलियारों में बैठी राजनीतिक जमात शायद यह भूल चुकी है कि कैलेंडर पर साल 2026 चल रहा है, न कि मध्यकालीन सामंतवाद का 12वां शतक। 12वीं शताब्दी में साम्राज्य राजा की जागीर होते थे, जहां अधिपति जो फरमान जारी करता था, अधीनस्थ रियासतों और रैयतों को बिना सवाल किए उसका पालन करना पड़ता था। उस दौर में सम्राट ही कानून बनाता था और खुद को कानून से ऊपर रखता था।

आज अमेरिकी नीति-नियंताओं का व्यवहार उसी मध्यकालीन सामंती दंभ का आधुनिक विस्तार की सोच को दर्शाता है । वे खुद को “नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” का स्वयंभू रक्षक घोषित करते हैं, लेकिन उनकी करनी पूरी तरह से अलग होती है, वह समझते हैं कि पूरी दुनिया उनकी प्रजा है। जब अमेरिका को लगता है कि किसी देश को आर्थिक रूप से पंगु बनाना है, तो वह टैरिफ और डॉलर-आधारित प्रतिबंधों का चाबुक चलाता है। जब कोई देश विरोधस्वरुप सामना करते है उसे यूएनओ की आड़ लेकर बल पूर्वक बर्बाद कर देते हैं इस प्रकार बर्बाद होने वाले दर्जनों देश हैं जब उसे महसूस होता है कि कोई अन्य राष्ट्र स्वतंत्र रूप से सांस ले रहा है, तो वह कूटनीतिक दबाव की दीवारें खड़ी कर देता है।

लेकिन अमेरिका को यह ऐतिहासिक सच स्वीकार करना होगा कि 21वीं सदी सामंती हुकूमतों की नहीं, संप्रभु राष्ट्र-राज्यों की सदी है। आज का विश्व एकध्रुवीय (Unipolar) प्रभुत्व के दौर से निकलकर बहुध्रुवीय (Multipolar) वास्तविकता में कदम रख चुका है। ग्लोबल साउथ के राष्ट्र अब किसी एक महाशक्ति के इशारे पर अपनी नीतियां तय करने को बाध्य नहीं हैं। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के देश अब वाशिंगटन के आदेशों के मूक दर्शक नहीं रहे। औपनिवेशिक छाया से बाहर निकले ये समाज अपने स्वाभिमान, अपनी ऊर्जा सुरक्षा और अपने नागरिकों के कल्याण को किसी भी विदेशी डिक्टेट से ऊपर रखते हैं। प्रजा मानने की इस पुरानी बीमारी का इलाज वाशिंगटन को जल्द से जल्द करना होगा, अन्यथा वह खुद को एक ऐसे निर्जन द्वीप पर खड़ा पाएगा जहां उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं बचेगा।

टैरिफ का चाबुक

हाल के वर्षों में अमेरिकी व्यापार नीति अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के साधन से बदलकर आर्थिक ब्लैकमेलिंग का हथियार बन चुकी है। कभी चीनी उत्पादों पर दंडात्मक शुल्क, कभी यूरोपीय संघ के इस्पात पर प्रतिबंध, तो कभी भारत जैसे रणनीतिक साझेदारों को सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (GSP) से बाहर करने की धमकियां। अमेरिकी नीति का सीधा सिद्धांत रहा है: “या तो हमारे आर्थिक नियमों के आगे घुटने टेको, या टैरिफ की मार झेलो।”

अब जब अमेरिका खुद रूस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष माध्यमों से डीजल आयात करने और प्रतिबंधों को अपनी सुविधानुसार बदल रहा है, तो बुनियादी प्रश्न यह उठता है: अब कौन-सी टैरिफ दुनिया को दी जाएगी?

  1. विश्व को अमेरिका के पाखंड पर टैरिफ लगानी चाहिए? यदि किसी संप्रभु राष्ट्र द्वारा अपनी जनता के लिए सस्ता तेल खरीदना अंतरराष्ट्रीय अपराध है, तो फिर अमेरिकी ट्रेजरी और रिफाइनरियों द्वारा किए गए इस समझौते पर कौन-सा दंड आरोपित किया जाना चाहिए?
  2. डॉलर के एकाधिकार को हथियार बनाना अब निष्प्रभावी हो चुका जिस गति से वाशिंगटन ने प्रतिबंधों को एक मनमाने खेल में बदला है, उसी गति से दुनिया भर में गैर-डॉलर व्यापार, द्विपक्षीय मुद्रा विनिमय और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन का विस्तार हुआ है। टैरिफ का भय दिखाकर पूरी दुनिया को हांकने की नीति अब बैकफायर कर रही है।
  3. घरेलू राजनीतिक विफलता का हर्जाना वैश्विक अर्थव्यवस्था नहीं भरेगी अमेरिका अपनी अनियंत्रित सरकारी उधारी, गलत मौद्रिक नीतियों और बेतुके व्यापार युद्धों के चलते पैदा हुई महंगाई को छिपाने के लिए बाकी दुनिया पर आयात शुल्क थोपता है। यह अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि आर्थिक गुंडागर्दी है जो मुक्त व्यापार के उन्हीं सिद्धांतों को तार-तार करती है जिनका प्रचार कभी स्वयं अमेरिका ने किया था।

भारत का सीधा सवाल: अब क्या कहोगे?

यह समय भारत और उसकी 140 करोड़ जनता के लिए अत्यंत गंभीर आत्ममंथन और दृढ़ता का है। आपको याद होगा वह दौर जब यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद भारत ने अपने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रियायती रूसी कच्चा तेल खरीदने का फैसला किया था। उस समय अमेरिकी सीनेट से लेकर व्हाइट हाउस की ब्रीफिंग तक, और पश्चिमी मीडिया घरानों से लेकर यूरोपीय कूटनीतिज्ञों तक सबने मिलकर भारत पर लांछन लगाने की होड़ लगा रखी थी।

भारतीय विदेश नीति को कठघरे में खड़ा किया गया। सवाल पूछे गए कि “क्या भारत इतिहास के सही पक्ष में खड़ा है?” अमेरिकी उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने भारत आकर सार्वजनिक मंचों से चेतावनी भरे लहजे में बयान दिए कि “जो देश प्रतिबंधों को दरकिनार करेंगे, उन्हें परिणाम भुगतने होंगे।”

उस दौर में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने पश्चिमी पाखंड पर प्रहार करते हुए दो टूक शब्दों में कहा था कि “यूरोप की समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं इस मानसिकता से पश्चिम को बाहर निकलना होगा।” भारत ने तब भी साफ किया था कि एक विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में, जहां करोड़ों लोग गरीबी रेखा से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, सस्ती ऊर्जा प्राप्त करना कोई राजनीतिक विलासिता नहीं, बल्कि एक नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व है।

आज जब अमेरिका खुद डीजल की कमी से घबराकर उसी रूस के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, तो भारत की जनता का अमेरिका से सीधा और दो-टूक सवाल है:

  • क्या आपके पास हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाने का कोई नैतिक अधिकार शेष बचा है?
  • भारत का तेल खरीदना था तो वह ‘रूस के युद्ध को फंड करना’ था, और अपने किसानों और ट्रक ड्राइवरों को शांत करने के लिए डीजल पर पाबंदियां हटाईं तो वह ‘घरेलू मूल्य नियंत्रण’ बन गया?
  • विशाल भारत के 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा अमेरिकी उपभोक्ताओं की सुरक्षा से कम नहीं हैं

भारत अब 1960 के दशक का वह देश नहीं है जो पीएल-480 के तहत मिलने वाले गेहूं के दबाव में अपनी विदेश नीति गिरवी रख दे। आज का भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक अनिवार्य स्तंभ है, और सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के सिद्धांत पर अडिग राष्ट्र है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने फैसले नई दिल्ली की जरूरतों के अनुसार लेगा, न कि वाशिंगटन के चुनावी चक्रों के अनुसार।

डोनाल्ड ट्रंप, घरेलू अराजकता और अमेरिकी नेतृत्व का मानसिक संकट

अमेरिकी राजनीति का वह विचित्र और अस्थिर चरित्र है, जिसका प्रतिनिधित्व डोनाल्ड ट्रंप और उनका राजनीतिक दर्शन करता है। “अमेरिका फर्स्ट” का नारा सुनने में राष्ट्रवादी लगता है, लेकिन व्यवहार में इसने अमेरिका को एक अविश्वसनीय, आत्मकेंद्रित और दिशाहीन महाशक्ति में का रुप दे दिया है।

राजनीतिक विश्लेषक और वैश्विक पर्यवेक्षक आज यह बुनियादी प्रश्न पूछ रहें हैं कि क्या इस प्रकार की नीतियां किसी मानसिक रूप से संतुलित, सुसंगत और दीर्घकालिक दृष्टिकोण वाले नेतृत्व की उपज हो सकती हैं?

1. आत्मघाती विरोधाभास नीतियां

एक तरफ आप अपने यूरोपीय सहयोगियों पर दबाव बनाते हैं कि वे रूसी गैस पाइपलाइनों को हमेशा के लिए बंद कर दें, अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मंदी की ओर धकेल दें और महंगी अमेरिकी एलएनजी खरीदें। दूसरी तरफ, जैसे ही आपके घरेलू मध्यावधि चुनावों में ईंधन के दाम राजनीतिक चुनौती बनते हैं, आप गुपचुप तरीके से पुतिन के साथ समझौते की मेज पर बैठ जाते हैं। यह कोई कूटनीतिक महारत नहीं है; यह एक मानसिक अस्थिरता और बौद्धिक दिवालियापन है, जो अपने ही सहयोगियों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है।

2. संस्थागत गिरावट और व्यक्ति-केंद्रित उन्माद

ट्रंपवादी राजनीति ने अमेरिकी राज्य व्यवस्था के संस्थागत संतुलन को ध्वस्त कर दिया है। विदेश नीति अब दीर्घकालिक भू-रणनीतिक हितों के आधार पर नहीं, बल्कि सुबह उठकर सोशल मीडिया पर किए जाने वाले भावनात्मक, आक्रामक और बेतुके पोस्ट्स के आधार पर तय होती है। जो नेता आज सुबह किसी देश को तबाह करने की धमकी देता है, वही शाम को उसी देश के तानाशाह के साथ “शानदार तालमेल” का दावा करने लगता है। क्या एक ऐसी महाशक्ति जिसके हाथ में परमाणु बटन है, उसका ऐसा अस्थिर मानसिक आचरण पूरी मानवता के लिए एक गंभीर सुरक्षा संकट नहीं है?

3. पतन की ओर अमेरिका

ट्रंप के नेतृत्व और उनकी विचारधारा ने अमेरिका को अंदर से विभाजित और बाहर से अलग-थलग कर दिया है। घरेलू स्तर पर संस्थाओं पर हमले, न्यायपालिका की साख पर प्रहार, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संधियों व गठबंधनों का खुला मजाक उड़ाना इस नीति ने दशकों से बने अमेरिकी प्रभाव को धूल में मिला दिया है। जब कोई महाशक्ति अपने ही वचनों, अपने ही प्रतिबंधों और अपनी ही संधियों पर 24 घंटे भी टिक नहीं पाती, तो दुनिया उस पर भरोसा करना बंद कर देती है।

निष्कर्ष: पाखंड के ढहते महल और एक नए युग का उदय

अमेरिका द्वारा रूसी ईंधन के मामले में उठाया गया यह कदम अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए एक वाटरशेड मोमेंट (निर्णायक मोड़) है। इसने पश्चिमी जगत के तथाकथित “नैतिक आधिपत्य” के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है। अब दुनिया को यह समझाने की कोई गुंजाइश नहीं बची है कि पश्चिमी प्रतिबंध किसी उच्च मानवीय मूल्य या अंतरराष्ट्रीय न्याय के लिए लगाए जाते हैं; वे केवल और केवल भू-राजनीतिक स्वार्थ और वर्चस्व बनाए रखने के औजार हैं।

21वीं सदी का यथार्थ अब तय हो चुका है। शक्ति का केंद्र अटलांटिक से खिसककर इंडो-पैसिफिक की ओर आ चुका है। भारत जैसे देश अब किसी महाशक्ति के पिछलग्गू बनने के लिए तैयार नहीं हैं। विश्व अब ऐसे किसी स्वयंभू थानेदार को स्वीकार नहीं करेगा जो दिन में प्रतिबंधों का फरमान जारी करे और रात में उन्हीं प्रतिबंधित रास्तों से अपनी जरूरतें पूरी करे।

अमेरिका को यदि वैश्विक मंच पर अपनी बची-खुची साख बचानी है, तो उसे 12वीं सदी के इस सामंती मुगालते से बाहर निकलना होगा कि वह दुनिया का मालिक है। उसे यह स्वीकार करना होगा कि वह केवल एक बड़ा राष्ट्र है, पूरी दुनिया नहीं; और 21वीं सदी के संप्रभु देश अब उसकी प्रजा नहीं, बल्कि बराबरी के साझेदार हैं जो उसके पाखंड का हिसाब उसकी आंखों में आंखें डालकर मांगना जानते हैं।

(लेखक उमर ख़ालिद स्वतंत्र पत्रकार और अपोज़िशन न्यूज के सलाहकार संपादक हैं। )

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