‘इस्लामिक नाटो’ के सिपहसालार 

अपने घर की आग से बेखबर सऊदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान ने अपनी सेना रवाना कर दी हैं। जहां खुद पाकिस्तान अफगानिस्तान बलूचिस्तान और पीटीआई से उलझ हुआ है वहीे एक मोटी रकम के लालच में उसने ये कदम उठाया है सोने पे सुहागा ये हो गया कि उसका सामना हूतियों से है जो कि उस क्षेत्र की नस नस पहचानते हैं वहीं पाकिस्तान की सेना बिना किसी पूर्व अभ्यास के इस गोरिल्ला वार में कूद पड़ी हैं । सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर तथाकथित ‘इस्लामी नाटो’ का गठन किया है और हमारे अज़ीम पड़ोसी मुल्क को इसका सुप्रीम कमांडर, यानी सिपहसालार बना दिया है।

अब ज़रा सोचिए जिस मुल्क के अपने घरों में आटे के थैलों के लिए खूनी दंगे हो रहे हों, जहाँ का हर नागरिक सोशल मीडिया पर फौज को कोस रहा हो, जहाँ बलूचिस्तान से लेकर खैबर तक हर रोज़ कोई नया पटाखा फूटता हो, वह मुल्क अब दुनिया की हिफाज़त करने निकला है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई मुजरिम अपनी जमानत के पैसे चुकाने के लिए बैंक लूटने निकल पड़े और रास्ते में खुद ही पुलिस की गाड़ी से टकरा जाए। आइए, इस महा-तमाशे की एक अत्यंत गंभीर, तीखी और व्यंग्य के चाबुक से गढ़ी गई चीरफाड़ करते हैं।

रियासत की तिजोरी और शाही दहशत

सऊदी अरब के महलों में इस समय एयर कंडीशनर की ठंडी हवा के बीच एक अजीब सी गर्माहट महसूस की जा रही है, और वह गर्माहट रियासतों के सिंहासन के नीचे सुलगती आग की है। सऊदी हुक्मरानों को अच्छे से पता है कि उनकी चमक-दमक और सोने की टाइल्स वाली गाड़ियों की उम्र उतनी ही है, जितनी देर तक उनकी सीमाएं सुरक्षित हैं।

सऊदी सेना? अरे भाई, सऊदी सेना के बारे में क्या कहें? वह सेना युद्ध के मैदान में उतरने से पहले ‘युद्ध-क्षेत्र में वाई-फाई की स्पीड क्या होगी?’ यह पूछने वाली फौज है। उनके आधुनिक फाइटर जेट्स और टैंक सिर्फ रेगिस्तान की रेत पर परेड करने या फिर रक्षा प्रदर्शनियों में चमकने के लिए बने हैं। जब बात असली खून-खराबे और यमन के हूती विद्रोहियों से टकराने की आती है, तो सऊदी किंगडम के सिंहासन डोलने लगते हैं।

ऐसे में, दुनिया के बाज़ार में एक ऐसा किराए का और भरोसेमंद ‘मजदूरी मॉडल’ उपलब्ध था, जो थोड़े बहुत डॉलर, गेहूं की बोरियों और तेल के एक अदद कूपन पर दुनिया के किसी भी कोने में जाकर लड़ने को तैयार हो जाता है जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पाकिस्तानी फौज की। सऊदी शाहों ने फौरन हिसाब लगाया: “अरे भाई, अपनी जान बचाने से ज्यादा कीमती थोड़े ही डॉलर हैं! पाकिस्तानियों को कुछ मिलियन डॉलर फेंको, ये अपनी पूरी पलटन को सीधे यमन की पहाड़ियों में झोंक देंगे।”

घर में आग

अब ज़रा पाकिस्तान के अंदरूनी नज़ारे पर गौर फरमाइए। मुल्क इस वक्त पूरी तरह से गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा है। स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री हाउस से लेकर रावलपिंडी के मुख्यालय तक, हर कोई एक अदद सुकून की नींद के लिए तरस रहा है।

एक तरफ अफगानिस्तान की तरफ से मिलने वाली चुनौतियां हैं, दूसरी तरफ बलूचिस्तान के बलूच लड़ाके हैं जो आए दिन राज्य के दावों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, और तीसरी तरफ इमरान खान के वे भूखे-प्यासे, पागल समर्थकों वाले दीवाने हैं जो हर चौराहे पर सिस्टम की ईंट से ईंट बजाने पर तुले हैं। आम जनता का हाल यह है कि उसे समझ नहीं आ रहा कि वह पहले बिजली का भारी-भरकम बिल भरे, पेट्रोल के दाम पर मातम मनाए या फिर देश के हुक्मरानों की इस महान कूटनीति पर ताली बजाए।

लेकिन फौज का दिल बहुत बड़ा है! अपने देश के नागरिकों को भूखा मरने के लिए छोड़कर, युवाओं को बेरोजगार रख कर, और अस्पतालों में दवाइयां न होने के बावजूद, पाकिस्तान ने अपनी सेना का एक बड़ा जत्था यमन के हूतियों से लड़ने के लिए रवाना कर दिया है। इसे कहते हैं  ‘जल, थल, वायु और आत्मसम्मान सबको दांव पर लगाओ, बस विदेशी आकाओं के चेहरों पर मुस्कान लाओ!’

अमेरिकी बेइज्जती का नया और अनोखा अध्याय

याद कीजिए वह दौर जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका का सबसे वफादार ‘नॉन-नेटो एलायड’ कहता था। वाशिंगटन के गलियारों में रेड कार्पेट बिछते थे, और पाकिस्तानी जनरलों को अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ फोटो खिंचवाने का नशा रहता था। लेकिन वक्त का पहिया घूमा और अमेरिका ने पाकिस्तान को एक पुरानी इस्तेमाल की हुई टिशू पेपर की तरह डस्टबिन में डाल दिया।

अब चूंकि अमेरिका की तरफ से भाव मिलना बंद हो गया है, तो पाकिस्तान ने अपनी इस ‘बेइज्जती’ को ही अपनी नई ताकत बना लिया है। अमेरिका की चौखट से दुत्कारे जाने के बाद, अब यह ‘इस्लामी नाटो’ के बैनर तले मध्य पूर्व की चौखट पर कटोरा लेकर हाजिर हो गया है। अमेरिका को दिखाने के लिए कि देखो! हम आज भी किसी काम के हैं, हम आज भी किसी और के युद्ध में अपनी फौज का कत्लेआम करवाने के लिए सबसे आगे खड़े हैं।

यमन के हूती और पाकिस्तानी रणबांकुरे

अब जरा कल्पना कीजिए इस महासंग्राम की। यमन की पहाड़ियों में बैठे हूती विद्रोही, जो बरसों से दुनिया की सबसे आधुनिक और महंगी अमेरिकी-सऊदी तकनीक से लैस सेनाओं को धूल चटा रहे हैं, वे जब यह सुनेंगे कि सामने मुकाबला करने के लिए ‘इस्लामी नाटो’ के नए कमांडर यानी पाकिस्तान की फौज आ रही है, तो उनकी हंसी रोके नहीं रुकेगी।

हूती विद्रोही तो ड्रोन और मिसाइलें बनाने में व्यस्त हैं, जबकि पाकिस्तानी फौज के रणनीतिकार इस बात पर माथापच्ची कर रहे होंगे कि युद्ध के मैदान में लॉजिस्टिक्स के साथ-साथ मुल्क की अगली लोन किश्त (IMF Loan) कब पास होगी। यह युद्ध कम और एक तरफ़ा ड्रामा ज़्यादा है, जहाँ सऊदी रियासतें तिजोरी के ताले खोलकर किराए के सैनिकों से अपनी सुरक्षा का बीमा करवा रही हैं, और पाकिस्तान अपनी आर्थिक बदहाली और घरेलू अशांति को छिपाने के लिए अपने जवानों की बली देने को तैयार बैठा है।

यह तथाकथित ‘इस्लामी नाटो’ कोई रक्षा संगठन नहीं है, बल्कि यह असफल शासकों का एक ऐसा म्यूचुअल फंड है, जहाँ दिवालियापन और तानाशाही का बीमा कराया जाता है। सऊदी अरब को अपनी राजशाही बचानी है, तुर्की को अपना ओटोमन साम्राज्य का भूखा भूत शांत करना है, और पाकिस्तान को सिर्फ चंद डॉलर चाहिए ताकि वह कुछ हफ्तों के लिए और अपनी अर्थव्यवस्था की सांसें चला सके।

लेकिन इस सब के बीच सवाल यह उठता है कि जिस मुल्क की अपनी अवाम सड़क पर है, जिसकी अपनी सरहदें सुरक्षित नहीं हैं, जो खुद गृहयुद्ध की भयंकर आग में घी डाल रहा है, वह भला दूसरों की सुरक्षा का ठेका कैसे ले सकता है?

आने वाले दिनों में जब यह ‘इस्लामी नाटो’ यमन के मैदान में उतरेगा, तो नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला होगा सऊदी पैसे देंगे, पाकिस्तानी जवान लड़ेंगे, और हूती जश्न मनाएंगे। अंततः, इतिहास इस घटना को दुनिया के सबसे बड़े भू-राजनीतिक मजाक के रूप में दर्ज करेगा, जहाँ एक मुल्क अपने घर की राख पर बैठकर, दूसरों के महलों की रखवाली करने का ढिंढोरा पीट रहा है।

एक सवाल: क्या आपको लगता है कि घरेलू गृहयुद्ध और आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान, सऊदी अरब की राजशाही को बचाने के इस नए अभियान में कामयाब हो पाएगा, या यह ‘इस्लामी नाटो’ कागज़ का वह शेर साबित होगा जो पहली ही आंधी में उड़ जाएगा?

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *