Nana Patekar नाना पाटेकर

भारतीय सिनेमा की रूह में बसता एक फनकार

नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के एक युग का अन्त !

भारतीय सिनेमा के सौ से अधिक वर्षों के इतिहास में अनगिनत चेहरे आए, चमके और काल के प्रवाह में ओझल हो गए। कुछ ने अपने रूप-रंग से पर्दे को सजाया, तो कुछ ने अपनी गढ़ी हुई संवाद अदायगी से तालियां बटोरीं। परंतु जब सिनेमाई कैनवास पर ‘नाना पाटेकर’ का नाम उभरता है, तो वहां कोई बनावटी आवरण, कृत्रिम चमक-दमक या बाजारू औपचारिकताएं नहीं दिखतीं। नाना पाटेकर केवल एक अभिनेता नहीं हैं; वे अभिनय का एक ऐसा मुकम्मल नाम था, जिसने भारतीय जनमानस के भीतर दबे आक्रोश, करुणा, सादगी और विद्रोह को एक जीवंत जुबान दी। वे हर किरदार में ढल जाने वाले, नस-नस में कला को समेटे और आम भारतीय के यथार्थ का सबसे सच्चा प्रतिबिंब बनकर उभरे।

आग, अंगार और कोमलता का अनूठा संगम 

नाना पाटेकर की अभिनय शैली किसी स्थापित नाट्य विद्यालय के किताबी नियमों तक सीमित नहीं रही। उनकी अदायगी उनकी रगों में दौड़ते खून की तरह सहज और वेगवान रही है। जब वे कैमरे के सामने आते हैं, तो नायक और खलनायक की पारंपरिक दूरियां मिट जाती हैं। वे जब बोलते हैं, तो शब्द केवल कानों तक नहीं पहुंचते, सीधे अंतरात्मा पर चोट करते हैं। उनकी संवाद अदायगी का वह अनूठा ठहराव, हाथों का तीखा संचालन, आंखों की दहक और चेहरे की नसों का खिंचाव यह सब मिलकर एक ऐसी अभिनय शैली का निर्माण करता है, जिसे न तो सिखाया जा सकता है और न ही जिसकी नकल की जा सकती है।

पारंपरिक हिंदी सिनेमा में जहां नायक को संपूर्ण, सुंदर और त्रुटिहीन दिखाने की होड़ लगी रहती थी, वहीं नाना पाटेकर ने एक साधारण, झुर्रियों भरे, सांवले और पसीने से लथपथ चेहरे के साथ पर्दे पर कदम रखा और स्थापित नायकों के वर्चस्व को चुनौती दी। उन्होंने यह साबित किया कि अभिनय चेहरे के रंग-रूप से नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई और आंखों की सच्चाई से होता है।

किरदारों की विविधता: आग से फूल तक का सफर

नाना के अभिनय जीवन का विस्तार इतना व्यापक है कि उसे किसी एक विधा या श्रेणी में बांधना असंभव है:

  • ‘परिंदा‘ का अन्ना: विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा का वह खौफनाक डॉन ‘अन्ना सेठ’, जो आग से डरता है और उसी आग के उन्माद में मानसिक संतुलन खो बैठता है। जब अन्ना अपने चेहरे पर तमाचा मारते हुए कहता है, “धंधे में कोई किसी का भाई नहीं होता…”, तो दर्शक सिहर उठते हैं। यह खलनायकी का ऐसा रूप था, जिसमें केवल क्रूरता नहीं, बल्कि एक विकृत और असहाय मानसिक द्वंद्व भी था।
  • ‘अंगार‘ का माजिद खान: शशिलाल नायर की अंगार में नाना पाटेकर के अभिनीत ‘माजिद’ का किरदार आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। एक अपराधी पिता के साए में पलकर अपनी ही दुनिया का सुल्तान बनने की महत्वाकांक्षा और अंतर्मन का खौफनाक आक्रोश नाना ने इस किरदार को इतनी शिद्दत से जिया कि मुख्य नायक की उपस्थिति तक गौण हो गई।
  • ‘प्रहार‘ का मेजर प्रताप चौहान: प्रहार: द फाइनल अटैक केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक नागरिक और सैनिक के आंतरिक अनुशासन का घोषणापत्र थी। इस फिल्म का निर्देशन और अभिनय दोनों नाना ने किए। एक सख्त, कर्तव्यनिष्ठ कमांडो, जो सैनिकों को देश की रक्षा के लिए तैयार करता है, लेकिन समाज के भीतर सड़ चुके तंत्र, संवेदनहीनता और गुंडागर्दी को देखकर भीतर तक आहत होता है। अंतिम दृश्य में जब मेजर प्रताप समाज के इस पतन पर चीखते हैं, तो वह चीख हर जागरूक नागरिक की आत्मा का रुदन बन जाती है।
  • ‘प्रतिघात‘ और समाज की नब्ज: एन. चंद्रा की फिल्मों में नाना पाटेकर की मौजूदगी ने 80 के दशक के उस दौर को स्वर दिया, जब आम इंसान भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और व्यवस्था के पाखंड से जूझ रहा था। विक्षिप्तता और बेबसी के मिले-जुले भावों को जिस सहजता से उन्होंने जिया, उसने दर्शकों को भीतर तक झकझोर दिया।
  • ‘थोड़ा सा रोमानी हो जाएं‘ की अनूठी नर्मी: जो लोग नाना को सिर्फ एक आक्रामक और उग्र अभिनेता मानते हैं, उन्हें अमोल पालेकर की इस काव्यात्मक फिल्म में उनके ‘बारिश लाने वाले’ जादुई किरदार को देखना चाहिए। जीवन की नीरसता में आशा की बूंदें बिखेरता वह किरदार यह सिद्ध करता है कि नाना जितनी सहजता से अंगारे बरसा सकते हैं, उतनी ही नजाकत से ओस की बूंदें भी बन सकते हैं।
  • ‘खामोशी‘ और मूक पीड़ा: संजय लीला भंसाली की खामोशी: द म्यूजिकल में एक मूक-बधिर पिता (जोसेफ) की भूमिका में नाना ने बिना एक भी शब्द बोले, केवल अपनी आंखों, चेहरे के सूक्ष्म भावों और उंगलियों के इशारों से वात्सल्य और बेबसी का ऐसा सागर बहाया, जिसे देखकर कोई भी संवेदनशील आंख भीगे बिना नहीं रह सकती।

अभिनय का एक मुकम्मल नाम 

हिंदी सिनेमा का यह इतिहास रहा है कि जब भी किसी फिल्म में नाना पाटेकर की मौजूदगी रही, दर्शकों का ध्यान अनायास ही उनकी ओर खिंच गया। वे उन चंद अभिनेताओं में से हैं, जिनकी उपस्थिति किसी भी दृश्य के संतुलन को अपनी ओर मोड़ लेती थी। क्रांतिवीर का वह अमर संवाद “ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून… बता इसमें मुसलमान का कौन-सा, हिंदू का कौन-सा?” जब उन्होंने अपनी हथेली काटकर खून मिलाते हुए बोला, तो पूरे देश के सिनेमाघरों में सन्नाटा छा गया था। उस एक दृश्य ने देश के सामाजिक और राजनीतिक पाखंड को नंगा कर दिया था। यह किसी अभिनेता का केवल संवाद बोलना नहीं था, बल्कि एक सच्चे भारतीय का अपने वतन के लिए तड़प उठना था।

सादगी की मिसाल: चकाचौंध के बीच एक आम भारतीय

फिल्म उद्योग अक्सर अपनी कृत्रिम चमक, विशाल बंगलों, विदेशी गाड़ियों और आत्ममुग्धता के लिए जाना जाता है। परंतु नाना पाटेकर ने इस मायावी संसार के बीच रहकर भी एक संन्यासी-सी सादगी बनाए रखी। मुंबई के ग्लैमर से दूर, एक सादा कुर्ता-पायजामा पहने, हाथों में खेती के औजार लिए या किसी सामान्य ढाबे पर चाय पीते नाना पाटेकर को देखना यह विश्वास दिलाता है कि इंसान चाहे कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाए, अगर उसकी जड़ें मिट्टी से जुड़ी हैं, तो वह कभी भटक नहीं सकता।

उनका मानवीय पहलू उनके कलात्मक कद से भी ऊंचा है। ‘नाम फाउंडेशन’ (Naam Foundation) के माध्यम से उन्होंने महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त और कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के परिवारों के आंसुओं को पोंछने का जो बीड़ा उठाया, वह एक मिसाल है। जब किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब यह अभिनेता किसी सरकारी मदद की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं गांवों की धूल भरी गलियों में उतरा, पीड़ित परिवारों के सिर पर हाथ रखा, उनके बच्चों की शिक्षा और आजीविका की जिम्मेदारी उठाई। यह एक सच्चे आम भारतीय की अंतरात्मा थी, जो अपने ही लोगों के दुख से विदीर्ण होकर सेवा में जुट गई।

भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा 

नाना पाटेकर ने कभी भी समझौतावादी जीवन नहीं जिया। उनके विचारों में स्पष्टता, शब्दों में सत्य का साहस और आचरण में ईमानदारी रही। आज की युवा पीढ़ी, जो दिशाहीनता और खोखले दिखावे के दौर से गुजर रही है, उसके लिए नाना पाटेकर स्वाभिमान और जुझारूपन के सबसे बड़े प्रतीक हैं। उन्होंने सिखाया कि अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए, चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों।

उनका जीवन यह पाठ पढ़ाता है कि सफलता किसी की कृपा की मोहताज नहीं होती; यदि आपके भीतर लगन, सत्य और निष्ठा है, तो दुनिया को आपके हुनर के आगे सिर झुकाना ही पड़ता है।

एक शाश्वत विरासत 

नाना पाटेकर जैसे फनकार रोज-रोज पैदा नहीं होते। वे सदियों में एक बार आते हैं सिनेमा को नया अर्थ देने, समाज को उसका असली चेहरा दिखाने और कला को बाजार की मंडी से निकालकर आम आदमी के आंसुओं और पसीने से जोड़ने के लिए।

अन्ना का वह उन्माद, माजिद की वह कड़वाहट, मेजर प्रताप का वह अनुशासित आक्रोश, जोसेफ की वह मूक ममता और क्रांतिवीर के प्रताप नारायण तिलक का वह ज्वलंत भाषण ये केवल फिल्मी दृश्य नहीं हैं; ये भारतीय सिनेमा के इतिहास के स्वर्णिम पन्ने हैं, जो समय की हर आंधी को झेलकर भी अमर रहेंगे।

यह अनोखा, बेबाक, संवेदनशील और सहृदय इंसान सदैव हमारे दिलों में रहेगा और अपनी जादुई अदाकारी व समाजसेवी कार्यों से आने वाली पीढ़ियों को निरंतर आलोकित करता रहेगा। नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा का वह ध्रुवतारा हैं, जिसकी चमक समय के किसी भी छोर पर कभी फीकी नहीं पड़ सकती।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *