Withdrawal of US इराक से अमेरिकी सेना की वापसी, एक भयानक तबाही की आहट

आग की लपटों पर टिका पश्चिम एशिया

दुनिया के नक्शे पर पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) दशकों से बारूद के एक ऐसे ढेर पर बैठा है, जहाँ एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे महाद्वीप को भस्म करने की ताकत रखती है। आज जो हालात बन रहे हैं, वे किसी कूटनीतिक चाल या सामान्य सैन्य फेरबदल भर नहीं हैं। यह सीधे-सीधे एक नए, भयावह और अनियंत्रित नरसंहार की दस्तक है। इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया और बयानों के बीच जो सन्नाटा दिखाई दे रहा है, वह शांति का पैगाम नहीं, बल्कि आने वाले एक विध्वंसक तूफान से पहले की खामोशी है।

जब कोई महाशक्ति किसी रणनीतिक इलाके से अचानक अपने सैनिकों को पीछे खींचने की योजना बनाती है, तो उसका मतलब यह कभी नहीं होता कि वह युद्ध से थक चुकी है या अमन चाहती है। पश्चिम एशिया का खूनी इतिहास गवाह है कि अमेरिकी फौज का पीछे हटना दरअसल एक बड़े हवाई और मिसाइल हमले के लिए मैदान खाली करने की रणनीति का हिस्सा रहा है। अपनी सेना को ज़मीनी हमलों के दायरे से सुरक्षित दूरी पर ले जाना और फिर दूर बैठकर पूरे इलाके पर बम बरसाना यह एक परखी हुई औपनिवेशिक युद्ध-नीति है। आज यह स्पष्ट दिख रहा है कि ईरान को चारों तरफ से घेरकर, पूरे क्षेत्र को युद्ध का अखाड़ा बनाकर एक ऐसी विभीषिका की तैयारी की जा रही है, जिसकी कीमत केवल और केवल निर्दोष आम जनता अपनी जान देकर चुकाएगी।

रणनीतिक चाल या बड़े हमले की तैयारी?

इराक से अमेरिकी उपस्थिति का कम होना कोई शांति पहल नहीं है। पिछले कई सालों से इराक की धरती अमेरिका और ईरान के बीच छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वॉर) का केंद्र बनी रही है। जब तक अमेरिकी सैनिक इराक के ठिकानों पर सीधे तैनात हैं, तब तक वे ईरान समर्थक गुटों और मिसाइलों के आसान निशाने पर रहते हैं। यदि अमेरिका सीधे तौर पर ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य प्रतिष्ठानों या नेतृत्व पर बड़ा हमला करता है, तो सबसे पहला और घातक पलटवार इराक और सीरिया में मौजूद अमेरिकी सैनिकों पर होना तय है।

इसलिए, इराक से सैनिकों को हटाना वास्तव में अपनी कमजोर कड़ियों (Sitting Ducks) को समेटना है, ताकि जब मुख्य हमला शुरू हो, तो अमेरिका को अपने ही सैनिकों के शवों के ताबूत न गिनने पड़ें। यह वापसी सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम है, शांति के लिए नहीं।

एक तरफ ईरान पहले से ही प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और सीधे सैन्य टकराव की कगार पर खड़ा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरान के पूरे पड़ोस को एक विशालकाय सैन्य छावनी में तब्दील कर दिया है। फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर और आसपास के देशों के एयरबेस पूरी तरह से आधुनिक लड़ाकू विमानों, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल विध्वंसक जहाजों से पाट दिए गए हैं। यह तैयारी बचाव की नहीं, बल्कि एक संपूर्ण और घातक आक्रामकता की है।

हथियारों का घिनौना व्यापार: लाशों पर मुनाफा कमाने वाली व्यवस्था

इस पूरे भू-राजनीतिक खेल का सबसे घिनौना और अमानवीय पहलू वह आर्थिक तंत्र है, जो युद्ध से पोषण पाता है। दुनिया के चंद शक्तिशाली देश और उनके कॉर्पोरेट आका कभी नहीं चाहते कि दुनिया में स्थायी शांति कायम हो। सवाल उठता है कि ये युद्ध आखिर लड़े किसके लिए जाते हैं? लोकतंत्र की स्थापना के लिए? मानवाधिकारों की रक्षा के लिए? या फिर उस ‘मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ (हथियार निर्माता कंपनियों के गठजोड़) की तिजोरियाँ भरने के लिए, जिनकी बैलेंस शीट इंसानों के खून से लिखी जाती है?

जब दुनिया के किसी हिस्से में शांति स्थापित होने लगती है, तो इन हथियार निर्माता कंपनियों के शेयरों के दाम गिरने लगते हैं। अरबों डॉलर के लड़ाकू विमान, मिसाइलें, बम, रडार और गोला-बारूद तभी बिकते हैं जब दुनिया में डर, अविश्वास और नफरत का माहौल बना रहे।

  1. दिखवटी भय: पहले किसी क्षेत्र में तनाव पैदा किया जाता है, फिर पड़ोसियों को एक-दूसरे का हौव्वा दिखाकर अरबों डॉलर के रक्षा सौदे किए जाते हैं।
  2.  हथियारों की खपत: गोदामों में रखे पुराने गोला-बारूद को खपाने के लिए किसी गरीब या विकासशील देश पर युद्ध थोप दिया जाता है, ताकि नए, और अधिक घातक हथियारों के ऑर्डर जारी किए जा सकें।
  3. आम नागरिकों की बलि: इन सौदों के पीछे फैसला लेने वाले कभी मोर्चे पर नहीं जाते। वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर नक्शों पर लकीरें खींचते हैं, जबकि बम आम बस्तियों, अस्पतालों, स्कूलों और रिहायशी इमारतों पर गिरते हैं।

यह पूँजीवादी लालच का वह रूप है, जहाँ किसी बच्चे की कटी हुई देह केवल एक हथियार के ‘सफल परीक्षण’ का आँकड़ा बनकर रह जाती है। अपनी कंपनियों को काम देने और अपनी अर्थव्यवस्था का पहिया घुमाने के लिए लाखों मासूमों को मौत के मुंह में धकेल देना आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा अपराध है।

संयुक्त राष्ट्र: शक्तिहीन मूकदर्शक और कागजी शांति का दूत

जब भी दुनिया में कोई संकट गहराता है, सबकी निगाहें संयुक्त राष्ट्र (UN) की तरफ उठती हैं। इसे अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और न्याय का प्रतीक कहा जाता है। लेकिन यदि इसके गठन से लेकर आज तक के इतिहास पर एक निष्पक्ष नजर डाली जाए, तो यह संस्था एक दंतहीन शेर और केवल ताकतवर देशों के हितों की दासी से अधिक कुछ साबित नहीं हुई है।

  • इराक पर 2003 का हमला: जब झूठे दावों (Weapons of Mass Destruction) के आधार पर इराक को तबाह किया गया, तब संयुक्त राष्ट्र कहाँ था? लाखों बेगुनाह इराकी मारे गए, पूरा देश खंडहर बन गया, लेकिन हमलावरों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा।
  • लीबिया और सीरिया का विध्वंस: संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों की आड़ में या उसकी अनदेखी करके संपन्न मुल्कों को मलबे के ढेर में बदल दिया गया।
  • वीटो पावर का खेल: सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास मौजूद ‘वीटो’ का अधिकार इस बात की गारंटी है कि जब तक कोई हमला किसी महाशक्ति के हित में है, तब तक संयुक्त राष्ट्र का कोई भी प्रस्ताव शांति नहीं ला सकता।

संयुक्त राष्ट्र आज केवल बैठकों, कड़े शब्दों वाले बयानों और निष्प्रभावी निंदा-प्रस्तावों तक सिमट कर रह गया है। इसका इतिहास गवाह है कि जब-जब कमजोर पर ताकतवर ने हमला किया, यह संस्था महज एक असहाय दर्शक बनी रही। आज जब ईरान के सिर पर सीधे विनाश के बादल मंडरा रहे हैं और पूरा क्षेत्र युद्ध के मुहाने पर खड़ा है, तब भी संयुक्त राष्ट्र सिर्फ औपचारिक चिंता जताने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है।

ईरान पर सीधे हमले का खतरा: एक अभूतपूर्व मानवीय संकट

अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से ईरान पर किसी भी समय सीधा और घातक आक्रमण किए जाने की आशंका वास्तविक है। लेकिन जो लोग यह सोचते हैं कि यह हमला केवल कुछ सैन्य ठिकानों तक सीमित रहेगा और कुछ दिनों में मामला शांत हो जाएगा, वे ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं। ईरान कोई इराक, लीबिया या अफगानिस्तान नहीं है। इसका भूगोल, सैन्य क्षमता और वैचारिक आधार इसे एक बेहद जटिल और खतरनाक प्रतिद्वंद्वी बनाते हैं।

यदि ईरान पर सीधा हमला होता है, तो उसके परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने होंगे:

  • संपूर्ण क्षेत्रीय युद्ध: युद्ध केवल दो देशों के बीच नहीं रहेगा। लेबनान, यमन, सीरिया, इराक और खाड़ी के तमाम देश इसकी चपेट में आ जाएंगे। हिजबुल्लाह, हूती और क्षेत्र के अनगिनत सशस्त्र समूह एक साथ सक्रिय हो जाएंगे।
  • होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी: दुनिया के तेल व्यापार की जीवनरेखा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ तुरंत बंद हो जाएगी। इससे कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिससे पूरी दुनिया में रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और भुखमरी फैलेगी।
  • शरणार्थियों का सैलाब: लाखों-करोड़ों लोग बेघर होकर पलायन करने पर मजबूर होंगे। यह मानवीय संकट सीरिया या यूक्रेन संकट से कहीं अधिक बड़ा और विनाशकारी होगा।
  • पारंपरिक से गैर-पारंपरिक युद्ध: जब किसी देश के अस्तित्व पर ही बन आती है, तो युद्ध के सारे नियम ताक पर रख दिए जाते हैं। रासायनिक, जैविक या अनियंत्रित मिसाइल हमलों का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

आम जनता की त्रासदी: युद्ध का असली चेहरा

युद्ध के उन्माद में टीवी स्क्रीन पर चलने वाले ग्राफिक्स, लड़ाकू विमानों की गर्जना और कूटनीतिक जीत-हार के दावों के बीच जो आवाज़ पूरी तरह दब जाती है, वह है उस आम नागरिक की, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होता।

एक मजदूर जो सुबह अपने परिवार के लिए रोटी कमाने निकलता है, एक माँ जो अपने नवजात को सीने से लगाकर लोरी सुनाती है, और वे बच्चे जो बेहतर भविष्य के सपने देखते हुए स्कूल जाते हैं युद्ध सबसे पहले इन्हीं की सांसें छीनता है। जब क्रूज मिसाइलें आसमान चीरती हुई गिरती हैं, तो वे यह नहीं पूछतीं कि नीचे खड़ा इंसान किस विचारधारा का समर्थक है। वे केवल मांस के लोथड़े, रोते हुए अनाथ बच्चे और मलबे में दबी हुई चीखें छोड़ जाती हैं।

मध्य-पूर्व के लोगों ने पीढ़ियों से शांति नहीं देखी है। 1980 के दशक का ईरान-इराक युद्ध, 1990 का खाड़ी युद्ध, 2003 का इराक विध्वंस, आईएसआईएस का बर्बर उभार और सीरिया-यमन की तबाही यहाँ की ज़मीन इतनी बार लहू पी चुकी है कि अब वहाँ की मिट्टी का रंग ही बदल गया है। इसके बावजूद, शक्ति के नशे में चूर नेताओं और उनके पीछे खड़े हथियार व्यापारियों की भूख शांत नहीं हुई है।

आने वाले कल की भयावह तस्वीर

इराक से अमेरिकी वापसी और उसके समानांतर ईरान की घेराबंदी कोई सामान्य कूटनीतिक चाल नहीं है। यह आने वाले एक ऐसे महाविनाश का संकेत है, जिसकी लपटें केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगी। आज की परस्पर जुड़ी हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था में, हजारों किलोमीटर दूर गिरने वाला एक बम विकासशील देशों की गरीब जनता की थाली से निवाला छीनने की ताकत रखता है।

यह समय दुनिया भर के जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों और शांतिप्रिय समाज के उठ खड़े होने का है। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है; युद्ध केवल नई, और अधिक विकराल समस्याओं को जन्म देता है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हथियारों के गंदे मुनाफे, साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के दोहरे चरित्र के खिलाफ सशक्त आवाज नहीं उठेगी, तब तक बेकसूर इंसानों की लाशों पर सत्ता और मुनाफे की मीनारें इसी तरह चुनी जाती रहेंगी।

इराक से पीछे हटते सैनिकों के कदमों की आवाज दरअसल उस सायरन की तरह है, जो किसी भीषण तबाही से ठीक पहले बजता है। यदि दुनिया ने इस खतरे को अब भी गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाला इतिहास हमें केवल तमाशबीन के रूप में याद रखेगा, जिन्होंने अपनी आँखों के सामने पूरी मानवता को जलते देखा और खामोश रहे।

 

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