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#FIFAworldcup युद्ध, मंदी और फीफा का वैश्विक बाज़ार

football worldcup एक धधकती दुनिया और उत्सव

रोम के जलने और नीरो के बंशी बजाने की ऐतिहासिक कहावत आज इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में एक कड़वी हकीकत बनकर हमारे सामने खड़ी है। जब वैश्विक अर्थव्यवस्था ढहने की कगार पर हो, मध्यवर्ग और निम्नवर्ग के सामने दो वक्त की रोटी का संकट हो, और मध्य-पूर्व से लेकर यूरोप तक युद्ध के नगाड़े बज रहे हों, तब अरबों-खरबों डॉलर के किसी खेल महाकुंभ का आयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वैश्विक जनमानस की त्रासदी पर एक क्रूर अट्टहास प्रतीत होता है। फीफा वर्ल्ड कप के लिए टीमों का ऐलान एक तरफ खेल प्रेमियों के लिए रोमांच का संदेश ला सकता है, लेकिन दूसरी तरफ यह इस बात का भी प्रतीक है कि दुनिया के हुक्मरान और कॉर्पोरेट तंत्र आम जनता की बुनियादी समस्याओं के प्रति कितने उदासीन और संवेदनशून्य हो चुके हैं।

वर्तमान परिदृश्य एक ऐसे भीषण और विनाशकारी वातावरण का निर्माण कर रहा है, जहाँ एक ओर मानव जीवन बारूद और भूख की भेंट चढ़ रहा है, और दूसरी ओर ‘दिखावे की संस्कृति’ (Culture of Spectacle) को जीवित रखने के लिए संसाधनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। यह लेख इस गंभीर विरोधाभास का एक आलोचनात्मक विश्लेषण है कि क्या इस तरह के भव्य आयोजन वास्तव में करोड़ों गरीबों के जीवन के साथ एक सोची-समझी साज़िश और खिलवाड़ नहीं हैं?

  1. वैश्विक मंदी की कगार पर खड़ी दुनिया और ढहता मध्यवर्ग

आज विश्व की आर्थिक और मानसिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वैश्विक मुद्रास्फीति (Global Inflation), आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, और नीतिगत विफलताओं ने दुनिया को एक ऐसी आर्थिक मंदी (Economic Recession) की ओर धकेल दिया है, जिससे उबरना फिलहाल कठिन लग रहा है।

मध्यवर्गी जनमानस और भुखमरी का दुष्चक्र

इतिहास गवाह है कि किसी भी आर्थिक संकट की सबसे पहली और सबसे घातक मार मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग पर पड़ती है।

  • बचत का खात्मा: ब्रेक फेल महंगाई ने मध्यवर्ग की संचित पूंजी को निगल लिया है।
  • रोजगार का संकट: सबसे भयंकर ये वैश्विक तकनीकी कंपनियों से लेकर विनिर्माण क्षेत्रों तक में बड़े पैमाने पर छंटनी (Layoffs) हो रही है।
  • भुखमरी की आहट: करोना2019 से उबरने के बाद जो वर्ग  एक सुरक्षित जीवन जी रहा था, वह आज भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। कई विकासशील और विकसित देशों में ‘फूड बैंकों’ के बाहर लगती लंबी कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि भुखमरी अब केवल सुदूर गांवों की समस्या नहीं, बल्कि शहरी मध्यवर्ग के दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है।

इस भयावह आर्थिक मंदी के बीच जब फीफा वर्ल्ड कप जैसे आयोजनों के लिए चमचमाते स्टेडियमों, विलासितापूर्ण होटलों और विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, तो यह आर्थिक असमानता की खाई को और चौड़ा करता है। यह उस पैसे का अपव्यय है जिसे भुखमरी से निपटने, रोजगार सृजन और सामाजिक सुरक्षा नेट को मजबूत करने में लगाया जा सकता था।

  1. युद्ध की विभीषिका

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से सीख ना लेते हुए एप्स्टीन फाइल्स स्कैंडल में फंसे राजनेताओं ने विश्व समुदाय ध्यान भटकाने के लिए छोटे और कमजोर देशों में हस्तक्षेप कर वहां सत्तापरिवर्तन करने का कार्य शुरु कर दिया जिसका पहला शिकार वेनेजुएला हुआ, वहां सत्ता परिवर्तन कर उस देश की संप्रभुता को नष्ट कर वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा कर लिया इसके उपरान्त अमेरिका और इज्रायल ने सोची समझी पॉलिसी के तहत ईरान पर आक्रमण कर वहां के राष्ट्रपति और उनके मंत्रियों की हत्या कर उसे भी अपने अधीन करने की चेष्टा की,

यादरहे ईरान एक स्वाभिमानी देश है वहां की सेना ने इन दोनों राष्ट्रों के मंसूबों पर पानी फेर दिया और ईरान से युद्ध में उलझकर लगता है अमेरिका ने अबतक की सबसे बड़ी भूल की है, क्योकि ईरान ने जितना भयंकर जवाब दिया उसने सारे विश्व के सामने इन दोनों राष्ट्रों की सच्चाई सामने कर दी है।

आर्थिक मोर्चे पर जारी इस तबाही ने समकालीन भू-राजनीति (Geopolitics) को  पूरे विश्व को तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

आक्रमण के बहुआयामी परिणाम

सैन्य आक्रामकता कभी भी स्थानीय नहीं रहती, विशेषकर जब मामला मध्य-पूर्व (Middle East) का हो। इस युद्ध ने वैश्विक स्तर पर विनाशकारी श्रृंखला प्रभाव (Chain Reaction) पैदा किए हैं:

क्षेत्र सीधा प्रभाव दीर्घकालिक संकट
ऊर्जा क्षेत्र कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल परिवहन और उत्पादन लागत में भारी वृद्धि
खाद्य सुरक्षा समुद्री व्यापार मार्गों का बाधित होना जीवन रक्षक दवाओं और खाद्यान्न की किल्लत
मानवीय संकट लाखों लोगों का विस्थापन और मौत शरणार्थी संकट और वैश्विक अस्थिरता

जब ईरान और मध्य-पूर्व सुलगता है, तो उसकी तपिश वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली और टोक्यो तक महसूस की जाती है। वैश्विक स्तर पर कीमतों में आया यह उछाल किसी अकाल से कम नहीं है, जहाँ पैसा होने के बावजूद चीजें आम इंसान की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं।

 

  1. उदासीन और मंदबुद्धि शासक: नेतृत्व का दिवालियापन

इस दोहरे संकट – आर्थिक मंदी और युद्ध – के समय दुनिया को दूरदर्शी, संवेदनशील और साहसी नेतृत्व की आवश्यकता थी।, या तो एप्स्टीन फाइल्स के चलते या किसी और दूसरे कारण से  इस समय ‘उदासीन और मंदबुद्धि शासकों’ का वर्चस्व दिखाई देता है। यहाँ ‘मंदबुद्धि’ का तात्पर्य बौद्धिक क्षमता की कमी से कहीं अधिक नैतिक मंदबुद्धिता‘ (Moral Myopia) से है।

शासकों की उदासीनता 

वर्तमान  शासक लोक कल्याण की नीतियों को दरकिनार कर राष्ट्रवाद, युद्धोन्माद और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के हितों को साधने में व्यस्त हैं।

जब जनता रोजगार और रोटी मांगती है, तो शासक वर्ग उन्हें खेल, राष्ट्रवाद या किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय उत्सव के तमाशे में उलझा देता है। फीफा वर्ल्ड कप जैसी खेल प्रतियोगिताएं इन उदासीन शासकों के लिए एक ‘सुरक्षा वाल्व’ (Safety Valve) का काम करती हैं, ताकि जनता का ध्यान उनकी अपनी बदहाली और सरकार की विफलताओं से भटकाया जा सके।

युद्ध में मरते बच्चे और मंदी से आत्महत्या करते किसान इन हुक्मरानों के लिए केवल आंकड़े बनकर रह गए हैं।

 

  1. फीफा वर्ल्ड कप की तैयारी और टीमों का ऐलान

ऐसे विक्षिप्त कर देने वाले माहौल के बीच जब टेलीविजन और सोशल मीडिया पर ‘फीफा वर्ल्ड कप के लिए टीमों का ऐलान’ बड़ी धूमधाम से किया जाता है, तो ऐसा लगता है मानो वैश्विक कुलीन वर्ग (Global Elite) आम जनता को चिढ़ा रहा हो।

“जब दुनिया के एक हिस्से में बच्चे बमबारी और भूख से दम तोड़ रहे हों, तब दूसरे हिस्से में हरी घास के मैदान पर एक गेंद के पीछे भागते अरबपति खिलाड़ियों को देखना मानवता के सामूहिक विवेक के पतन की पराकाष्ठा है।”

खेल का व्यावसायीकरण

फीफा (FIFA) अब केवल एक खेल संस्था नहीं रही, यह पूंजीवाद का एक विशाल दैत्य बन चुका है। इसके पीछे छिपे आर्थिक गणित को समझना जरूरी है:

  • कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी: प्रायोजक (Sponsors), प्रसारणकर्ता (Broadcasters) और सट्टेबाजी के बाजार इस आयोजन से खरबों डॉलर कमाते हैं।
  • संसाधनों का दोहन: जिस देश में यह आयोजन होता है, वहाँ की सरकारें बुनियादी ढांचे के नाम पर सार्वजनिक धन का बड़ा हिस्सा पानी की तरह बहा देती हैं, जिसका खेल के बाद कोई जन-उपयोग नहीं रह जाता।
  • मानवाधिकारों का हनन: अतीत के अनुभवों ने दिखाया है कि इन स्टेडियमों को बनाने के लिए गरीब प्रवासी मजदूरों का शोषण किया जाता है, और खेल की भव्यता के पीछे झुग्गी-झोपड़ियों को ऊंची दीवारों से छिपा दिया जाता है।
  1. अकालरूपी वातावरण

मन में यह प्रश्न बार बार उठता है कि  क्या ऐसे अकालरूपी वातावरण में इतना बड़ा आयोजन करोड़ों गरीबों के जीवन के साथ खिलवाड़ नहीं है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘हाँ’ है। यह खिलवाड़ कई स्तरों पर हो रहा है:

नैतिक स्तर पर खिलवाड़

जब पूरा वैश्विक समाज एक वित्तीय और मानवीय अकाल से गुजर रहा हो, तब विलासिता के उत्सव मनाना नैतिक रूप से पतन का सूचक है। यह गरीबों के अस्तित्व और उनके संघर्षों का अपमान है।

आर्थिक स्तर पर खिलवाड़

संसाधनों का पुनर्वितरण (Redistribution of Resources) न्यायसंगत होना चाहिए। फीफा पर खर्च होने वाले धन का यदि एक छोटा सा हिस्सा भी वैश्विक खाद्य कार्यक्रम (World Food Programmed) या मंदी से पीड़ित क्षेत्रों को दे दिया जाए, तो करोड़ों लोगों को भुखमरी के मुंह से निकाला जा सकता है। लेकिन कॉर्पोरेट तंत्र के लिए गरीब की जान से ज्यादा खेल का ‘टीआरपी’ (TRP) और मुनाफा मायने रखता है।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर खिलवाड़

यह आयोजन गरीबों के मन में एक हीन भावना पैदा करता है। एक तरफ वे अपने बच्चों के लिए दूध की एक बोतल नहीं खरीद पाते, और दूसरी तरफ वे देखते हैं कि उनके शासक और समाज के अमीर लोग एक खेल उत्सव पर अरबों रुपये लुटा रहे हैं। यह सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने और व्यवस्था के प्रति आक्रोश पैदा करने वाला है।

 जागने का समय और एक नए प्रतिमान की आवश्यकता

फीफा वर्ल्ड कप की तैयारी, युद्ध की विभीषिका, और मंदी का यह त्रिकोणीय संगम इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि हमारी वैश्विक व्यवस्था पूरी तरह से सड़ चुकी है। उदासीन और दिशाहीन शासक इस डूबते जहाज के कप्तान हैं, जिन्हें यात्रियों की जान से ज्यादा जहाज के लाउंज में होने वाले संगीत समारोह की चिंता है।

इस अकालरूपी वातावरण में इतने बड़े आयोजनों को निर्बाध रूप से चलने देना यह साबित करता है कि मानवता के मूल्य अब पूंजी के पैरों तले कुचले जा चुके हैं। यदि हम अब भी नहीं जागे, यदि हमने खेल और मनोरंजन के नाम पर होने वाले इस क्रूर तमाशे के खिलाफ अपनी आवाज नहीं उठाई, तो आने वाला इतिहास हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद रखेगा जो तब तालियाँ बजा रहा था जब उसकी अपनी ही नस्लें भूख और बारूद से समाप्त हो रही थीं।

अब समय आ गया है कि खेलों के इस अंध-व्यावसायीकरण को रोका जाए और वैश्विक प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित किया जाए,  जहाँ पहली प्राथमिकता किसी खेल की ट्रॉफी नहीं, बल्कि पृथ्वी के अंतिम व्यक्ति की थाली में रोटी और उसके सिर पर सुरक्षित छत होनी चाहिए।

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