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नार्वे का कार्टून, 145 करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान पर हमला!

Scandinavian frustration सभ्यता का ढोंग और स्कैंडिनेवियाई कुंठा

बधाई हो! आखिरकार दुनिया के सबसे ‘सभ्य’, ‘उदार’ और ‘स्वतंत्र’ होने का ढोंग करने वाले स्कैंडिनेवियाई मीडिया का वह बदसूरत चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो ही गया, जिसे वे लंबे समय से मानवतावादी मेकअप के पीछे छिपाए बैठे थे। वर्षों से ‘प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ (Press Freedom Index) जैसी तथाकथित निष्पक्ष और प्रायोजित रैकिंग्स में पहले पायदान पर कुंडली मारकर बैठे नार्वे को देखकर वैश्विक बौद्धिक बिरादरी अक्सर सम्मोहित रहती थी। हम भी कभी-कभी सोच में पड़ जाते थे कि आखिर बर्फ की चादरों से ढके इस छोटे से देश में ऐसा कौन सा क्रांतिकारी पत्रकारिता का अमृत बरसता है, जिसे दुनिया पत्रकारिता का सर्वोच्च मसीहा मान लेती है?

लेकिन,  आज यह तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। उनकी इस तथाकथित ‘सर्वश्रेष्ठ’ और ‘आदर्श’ पत्रकारिता का असली और घिनौना प्रमाण यह है कि उनके पास दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए जन-प्रतिनिधियों पर बेहद ओछे, अभद्र और कुंठित कार्टून बनाने का असीमित समय है। यह किसी स्वतंत्र पत्रकारिता का लक्षण नहीं, बल्कि एक खास रंगभेद और औपनिवेशिक मानसिकता (Colonial Hangover) का भद्दा प्रदर्शन है, जो आज भी खुद को दुनिया का ‘व्हाइट मास्टर’ समझने की भूल कर रहा है।

आंतरिक लोकतंत्र में बाहरी दखल बर्दाश्त नहीं

शायद स्कैंडिनेवियाई देशों की हड्डियों को गला देने वाली बर्फीली हवाओं और वहां के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ‘ग्लोबल ज्ञान’ बांटने वाले इन बुद्धिजीवियों को यह बुनियादी बात समझ ही नहीं आती कि वास्तविक लोकतंत्र काम कैसे करता है। भारत कोई थोपा हुआ या किसी की खैरात पर बना देश नहीं है। भारत एक पूर्ण संप्रभु राष्ट्र है, जिसकी जड़ें हजारों साल पुरानी सभ्यता में हैं। यहाँ के नागरिक अपने प्रधानमंत्री की नीतियों से सहमत हों, असहमत हों, उनकी आलोचना करें या उनकी जय-जयकार करें- यह पूरी तरह से हमारा, और सिर्फ हमारा आंतरिक मामला है।

यह भारत का जीवंत लोकतंत्र है:

हम सुबह चाय की टपरी पर बैठकर सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ाने का अधिकार भी रखते हैं, हम दोपहर को अदालत के दरवाजों पर जाकर सरकार के फैसलों को चुनौती देने का हौसला भी रखते हैं, और हम शाम को उसी सरकार के किसी राष्ट्रहित के फैसले पर गर्व से ताली बजाने और तिरंगा लहराने का जज्बा भी रखते हैं।

यह हमारा आपसी विमर्श है, यह हमारा घरेलू मामला है, यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इस घरेलू बहस में किसी तीसरे देश को- जो खुद को जबरन वैश्विक नैतिकता का ठेकेदार समझता है- अपनी टांग अड़ाने का रत्ती भर भी अधिकार नहीं है। हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि के खिलाफ ओछे हथकंडे अपनाना, भद्दे व्यंग्य कसना और कार्टूनों के जरिए नीचा दिखाने की कोशिश करना ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ नहीं है। यह सीधे तौर पर एक गहरी कुंठा और मानसिक दिवालियापन (Mental Bankruptcy) का सबूत है, जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

145 करोड़ की संप्रभुता पर सीधा हमला

विदेशी मीडिया और उनके पालतू बुद्धिजीवी अक्सर अपनी अज्ञानता में यह भूल जाते हैं कि भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक देश में प्रधानमंत्री सिर्फ एक व्यक्ति, एक राजनेता या एक संवैधानिक पद मात्र नहीं होता। वह इस देश के 145 करोड़ भारतीयों की सामूहिक लोकतांत्रिक इच्छा, आकांक्षा और संकल्प का जीवित प्रतीक होता है। वह उस जनमत का प्रतिनिधित्व करता है जो कड़कती धूप में, लंबी-लंबी कतारों में लगकर, अपनी उंगली पर स्याही लगवाकर देश की तकदीर तय करता है।

इसलिए, जब नार्वे का कोई मीडिया संस्थान हमारे प्रधानमंत्री पर कोई अभद्र टिप्पणी करता है या घटिया कार्टून बनाता है, तो वह किसी एक पार्टी के नेता या व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं होता। वह सीधे तौर पर इस देश के हर उस नागरिक के विवेक, उसकी बुद्धिमत्ता और उसके मतदान के अधिकार का घोर अपमान है, जिसने इस सरकार को चुना है।

नार्वे के मीडिया की यह घटिया हरकत साफ तौर पर प्रमाणित करती है कि वे कागज़ पर भले ही कितने भी ‘सभ्य’ और ‘नंबर वन’ बनते फिरें, लेकिन असलियत में दूसरों की संप्रभुता, संस्कृति और लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान करने के मामले में उनका नैतिक स्तर नाली से भी बदतर है। यह कार्टूनिस्टों की कूची से निकली कला नहीं, बल्कि भारत की उभरती वैश्विक शक्ति से जलने वाले बीमार मस्तिष्कों की जलन का जहर है।

स्वतंत्र मीडिया या सिलेक्टिवएजेंडा? पाखंड की पराकाष्ठा

अब समय आ गया है कि इस तथाकथित ‘स्वतंत्र मीडिया’ के पाखंड की परतों को उधेड़ा जाए। क्या यही है आपका स्वतंत्र मीडिया? क्या पत्रकारिता का अंतरराष्ट्रीय पैमाना अब सिर्फ इतना ही रह गया है कि आप दूसरे देशों के राष्ट्रप्रमुखों का उपहास उड़ाएं, उनके रंग, रूप, पहनावे या नीतियों का भद्दा मजाक बनाएं? यदि दूसरों के घर में अनधिकृत रूप से झांकना, उनकी व्यवस्थाओं पर कीचड़ उछालना और उनके मुखिया पर फब्तियां कसना ही नार्वेजियन मीडिया के लिए ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ (Freedom of Speech) की चरम सीमा है, तो ऐसी सड़ी-गली स्वतंत्रता नार्वे को ही मुबारक हो।

असलियत यह है कि यह स्वतंत्रता कभी भी निरपेक्ष नहीं थी; यह पूरी तरह से सिलेक्टिव‘ (चयनात्मक) और एजेंडा-ड्रिवन है।

विषय पश्चिमी मीडिया का रवैया वास्तविक चरित्र
विकासशील देशों का लोकतंत्र उपहास, कार्टून और नीचा दिखाने की कोशिश औपनिवेशिक श्रेष्ठता ग्रंथि (Supremacy Complex)
अपनी आंतरिक समस्याएं नस्लवाद, मानवाधिकार उल्लंघन पर चुप्पी पाखंड और दोहरी मानसिकता
वैश्विक संस्थाओं की रैंकिंग खुद को हमेशा नंबर-1 पर रखना स्व-घोषित और प्रायोजित रेटिंग्स

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यह मीडिया कभी भी अपने देश के भीतर पल रहे नस्लवाद, अप्रवासियों के साथ होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार और अपनी आंतरिक सामाजिक सड़न पर इस तरह के आक्रामक कार्टून नहीं बनाएगा। वहां इनकी जीभ सिल जाती है, वहां इनकी कलम की स्याही सूख जाती है। लेकिन जैसे ही बात भारत जैसे किसी उभरते हुए शक्तिशाली राष्ट्र की आती है, इनका ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ अचानक कुलांचे मारने लगता है। यह स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं है, यह एक सोची-समझी भू-राजनीतिक (Geopolitical) साजिश है, जिसका उद्देश्य भारत की वैश्विक साख को ठेस पहुंचाना है।

पश्चिमी श्रेष्ठता ग्रंथि (Western Supremacy Complex) का नया अवतार

यह पहली बार नहीं है जब किसी पश्चिमी देश ने भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और उसके नेतृत्व को इस तरह से निशाना बनाया है। यह सिलसिला सदियों पुराना है। जब अंग्रेज यहां आए थे, तब वे ‘व्हाइट मैन्स बर्डन’ (White Man’s Burden) का नारा लेकर आए थे—यानी वे हमें ‘सभ्य’ बनाने आए थे। आज जब वे भौतिक रूप से चले गए हैं, तो उनके मानसिक वंशज मीडिया संस्थानों, थिंक-टैंकों और मानवाधिकार संगठनों के रूप में वही काम कर रहे हैं।

नार्वे का यह कार्टून उसी औपनिवेशिक श्रेष्ठता ग्रंथि का एक आधुनिक, डिजिटल और घिनौना रूप है। इन्हें तकलीफ इस बात से नहीं है कि भारत में क्या नीतियां बन रही हैं। इन्हें तकलीफ इस बात से है कि कल तक जो भारत इनके इशारों पर चलता था, जो भारत इनके द्वारा तय किए गए पैमानों पर खुद को मापता था, वह आज अपनी शर्तों पर दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। इन्हें पच नहीं रहा है कि कोरोना काल में जिस भारत के तबाह होने की इन्होंने भविष्यवाणियां की थीं, उसी भारत ने दुनिया को वैक्सीन बांटी। इन्हें इस बात का दर्द है कि भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती ताकत बन चुकी है। इसी दर्द और जलन की दवा ये अपने घटिया कार्टूनों में ढूंढ रहे हैं।

हमें आपके सर्टिफिकेटकी जरूरत नहीं

भारत के नागरिक बेहद स्पष्ट शब्दों में और कड़े लहजे में वैश्विक मंच पर यह साफ कर देना चाहते हैं कि हम अपनी समस्याओं, अपनी बहसों, अपने मतभेदों और अपनी राजनीति को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं। हमें अपने घर के मामलों को सुलझाने के लिए किसी पश्चिमी देश, किसी यूरोपीय थिंक-टैंक या नार्वे के किसी कुंठित संपादक से किसी भी प्रकार के ‘सर्टिफिकेट’ की कोई आवश्यकता नहीं है।

नार्वे और उसके सहधर्मी मीडिया को यह चेतावनी याद रखनी चाहिए: “जिस भारत को आप एक कार्टून में समेटने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं, वह भारत आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन है। हम अपनी संप्रभुता और अपने प्रतिनिधियों की गरिमा की रक्षा करना अच्छी तरह जानते हैं। यदि आप सम्मान देना नहीं जानते, तो आपको सम्मान पाने की उम्मीद भी छोड़ देनी चाहिए।”

हमें अपने आत्मसम्मान पर आंच बर्दाश्त करने की आदत नहीं रही। यह 1947 से पहले का मजबूर भारत नहीं है, जिसे आप अपनी पत्रिकाओं के कवर पेज पर अपमानित करके हंस लिया करते थे। यह 21वीं सदी का नया, आत्मनिर्भर और प्रचंड भारत है, जो अपनी आंखों में आंखें डालकर बात करना जानता है।

निष्कर्ष: सभ्यताकी परिभाषा दोबारा सीखने की जरूरत

अंततः, नार्वे के इस तथाकथित प्रबुद्ध मीडिया को हमारी यही सलाह है कि वे दूसरों के लोकतंत्र और उनके प्रधानमंत्रियों पर ओछी टिप्पणियां करने से पहले अपने गिरेबां में झांक कर देखें। ‘सभ्यता’ का जो नया नोबेल पुरस्कार आपने इस भद्दे कार्टून के जरिए हासिल किया है, उसने आपकी वैश्विक साख को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है।

अब समय आ गया है कि नार्वे और उसके जैसे अन्य पश्चिमी देश ‘सभ्यता’, ‘शालीनता’ और ‘पारस्परिक सम्मान’ की परिभाषा को दोबारा, नए सिरे से और बिना किसी पूर्वाग्रह के सीखें। जब तक आप दूसरों की संप्रभुता का सम्मान करना नहीं सीखते, तब तक आपकी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की नंबर वन रैंकिंग महशूर इतिहासकारों के चुटकुलों से ज्यादा और कुछ नहीं है। भारत अपने स्वाभिमान के साथ न कभी समझौता किया है, और न कभी करेगा। आपका एजेंडा ध्वस्त हो चुका है, और आपकी बौद्धिक तानाशाही का अंत निश्चित है!

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