Islamic Nato इस्लामिक नाटो

 बहुध्रुवीय विश्व में मुस्लिम शक्तियों की नई गोलबंदी  

 सत्ता के केंद्र का स्थानांतरण और नई वैश्विक बिसात

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक भू-राजनीति एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित पश्चिमी प्रभुत्व की नींव दरकती दिखाई दे रही है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस ‘एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था’ (Unipolar World Order) का डंका वाशिंगटन से बजाया गया था, वह आज पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व), यूरेशिया और दक्षिण एशिया के संगम पर आकर गंभीर चुनौतियों से घिर चुकी है।

इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय विमर्श ‘इस्लामिक नाटो’ (Islamic NATO) अथवा मुस्लिम बहुल राष्ट्रों के बीच एक साझा सामरिक व कूटनीतिक समन्वय की परिकल्पना का पुनरुत्थान है। यह केवल एक सैन्य गठबंधन का विचार नहीं है, बल्कि यह उस सदी पुराने ऐतिहासिक आघात, औपनिवेशिक विभाजन और पश्चिमी हस्तक्षेप के विरुद्ध उपजी उस अंतर्निहित चेतना का प्रकटीकरण है, जिसकी शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानिया साम्राज्य (ऑटोमन साम्राज्य) के पतन के साथ हुई थी।

जहां तुर्की एक ओर नाटो का एक महत्वपूर्ण सदस्य है वहीं पाकिस्तान और चीन का आपसी तालमेल जगजाहिर है और सबसे महत्वपूर्ण ये कि ये चीन का अपना क्षेत्र है उसने इस क्षेत्र तक ज़मीनी मार्ग लगभग तैयार कर लिया है।और सऊदी अरब साधन संपन्न राष्ट्र होने के चलते आर्थिक सहायता के हमेशा तैयार है।

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की पराजय और उसके बाद ख़िलाफ़त के उन्मूलन से लेकर आज ईरान, सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान और मध्य एशियाई समीकरणों के नए स्वरूप तक यह यात्रा केवल सत्ता के हस्तांतरण की नहीं, बल्कि पराधीनता से संप्रभुता और बिखराव से रणनीतिक एकीकरण की ओर बढ़ते कदमों की गाथा है।

  1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: खिलाफत का अंत और ‘साइक्स-पिकॉ’ का औपनिवेशिक जाल

इतिहास साक्षी है कि 1914 से 1918 के बीच लड़ा गया प्रथम विश्व युद्ध केवल यूरोपीय साम्राज्यों का संघर्ष नहीं था, बल्कि इसने सदियों से स्थापित इस्लामी दुनिया की धुरी को हमेशा के लिए बदल दिया। सदियों तक इस्तांबुल स्थित उस्मानिया साम्राज्य मुस्लिम जगत के एक बड़े भूभाग के लिए राजनीतिक और प्रतीकात्मक एकता का केंद्र रहा था। किंतु युद्ध में उस्मानिया साम्राज्य की पराजय के पश्चात 1924 में जब मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में औपचारिक रूप से खिलाफत का अंत हुआ, तब मुस्लिम दुनिया ने अपना साझा राजनीतिक गुरुत्व खो दिया।

बाँटो और राज करो की पश्चिमी नीति

खिलाफत के विघटन के तुरंत बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने गुप्त ‘साइक्स-पिकॉ समझौते’ (Sykes-Picot Agreement) के तहत पूरे पश्चिम एशिया को अपने औपनिवेशिक हितों के अनुरूप कृत्रिम सीमाओं में बाँट दिया। नक्शे पर खींची गई सीधी रेखाओं ने सदियों पुराने कबीलाई, सांस्कृतिक और भाषाई ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया।

कठपुतली सत्ताओं की स्थापना पश्चिमी शक्तियों ने अपने ऊर्जा हितों (तेल और गैस के भंडार) और स्वेज नहर जैसे व्यापारिक जलमार्गों की सुरक्षा के लिए ऐसे शासकों और राजवंशों को सत्ता सौंपी, जो जनता के प्रति नहीं, बल्कि लंदन, पेरिस और बाद में वाशिंगटन के प्रति जवाबदेह थे।

निर्भरता का सिंड्रोम: नवगठित राष्ट्रों को जानबूझकर आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा के स्तर पर पश्चिम का मोहताज बनाए रखा गया। यदि किसी शासक या विचारक ने अरब राष्ट्रवाद (Arab Nationalism) या संप्रभु इस्लामी स्वायत्तता की बात की, तो उसे तख्तापलट या प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से कुचल दिया गया।

  1. शीत युद्ध और 90 के दशक की तबाही: संप्रभुताओं का विखंडन

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका वैश्विक पूंजीवाद का नेता बनकर उभरा और पश्चिम एशिया उसकी विदेश नीति की सबसे संवेदनशील प्रयोगशाला बन गया। ‘पेट्रो-डॉलर’ व्यवस्था की नींव रखी गई, जिसके तहत तेल का व्यापार अनिवार्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होना तय हुआ। इसके बदले पश्चिमी शक्तियों ने क्षेत्रीय राजतंत्रों को सुरक्षा का आश्वासन दिया।

किंतु 1990 के दशक के आते-आते, सोवियत संघ के पतन के बाद, अमेरिकी नेतृत्व ने अपनी ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ की नीति के तहत उन सभी क्षेत्रीय शक्तियों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाना शुरू किया, जो उसके वर्चस्व को चुनौती दे सकती थीं।

इराक, लीबिया और सीरिया का हश्र

  1. इराक का विनाश 1991 के खाड़ी युद्ध और विशेष रूप से 2003 के आक्रमण में इराक को रासायनिक हथियारों (WMDs) के झूठे बहाने पर खंडहर बना दिया गया। इराक की सुदृढ़ सेना, प्रशासनिक ढाँचा और वैज्ञानिक क्षमता पूरी तरह समाप्त कर दी गई।
  2. लीबिया का पतन 2011 में नाटो के सीधे हवाई हमलों ने मुअम्मर गद्दाफी की सत्ता का अंत कर दिया। गद्दाफी, जो अफ्रीकी और अरब देशों के लिए एक स्वतंत्र ‘गोल्ड दिनार’ मुद्रा और साझा सुरक्षा तंत्र की वकालत कर रहे थे, उनके जाते ही लीबिया आज तक गृहयुद्ध और अराजकता की आग में झुलस रहा है।
  3. जॉर्डन और सीरिया की विवशता जॉर्डन अपनी सीमित आर्थिक क्षमता और भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा पश्चिमी अनुदानों पर निर्भर रहने को विवश रहा, जबकि सीरिया को एक दशक से अधिक लंबे छद्म युद्ध (Proxy War) में झोंककर शक्तिहीन बना दिया गया।

इस विनाशलीला ने पूरे क्षेत्र को यह संदेश दिया कि पश्चिमी सुरक्षा छत्र वास्तव में सुरक्षा का नहीं, बल्कि नियंत्रण और संसाधनों के दोहन का साधन है।

 

  1. ईरान की रणनीतिक दृढ़ता: अमेरिकी-यूरोपीय वर्चस्व को सीधी चुनौती

जहाँ इराक, लीबिया और सीरिया दबाव और हमलों के सामने बिखर गए, वहीं ईरान ने पिछले चार दशकों से जारी कड़े आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और सैन्य धमकियों के बावजूद अपने अस्तित्व और संप्रभुता की रक्षा की। विशेषकर पिछले कुछ वर्षों में ईरान ने जिस प्रकार अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों की सामरिक श्रेष्ठता के भ्रम को तोड़ा है, उसने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को स्तब्ध कर दिया है।

ईरान के प्रतिरोध के प्रमुख आयाम

असममित युद्धक क्षमता (Asymmetric Warfare): पारंपरिक हथियारों की दौड़ में पश्चिम से मुकाबला करने के बजाय ईरान ने अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक, हाइपरसोनिक बैलिस्टिक मिसाइलों और साइबर युद्धक क्षमताओं का विकास किया।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण: विश्व के कच्चे तेल के लगभग 20% पारगमन मार्ग यानी होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की पकड़ ने पश्चिमी नौसेनाओं के लिए सीधे टकराव की लागत को अत्यधिक बढ़ा दिया है।

सामरिक संदेश:जब पश्चिमी प्रतिबंधों और सैन्य दबावों के जवाब में ईरान ने सीधे अमेरिकी ठिकानों और पश्चिमी हितों को लक्षित करने का साहस दिखाया, तो इसने खाड़ी देशों—विशेषकर सऊदी अरब—की आँखें खोल दीं। यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका की तथाकथित ‘सुरक्षा छतरी’ संकट के समय अपने सहयोगियों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम या इच्छुक नहीं है।

 

  1. सऊदी अरब का मोहभंग और अप्रत्याशित कूटनीतिक पुनर्संयोजन

दशकों तक सऊदी अरब और अमेरिका का संबंध ‘तेल के बदले सुरक्षा’ के सिद्धांत पर आधारित रहा। किंतु हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ घटीं जिन्होंने रियाद को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया:

1.अरामको पर हमला (2019): जब सऊदी अरब के प्रमुख तेल प्रतिष्ठानों पर सटीक ड्रोन और मिसाइल हमले हुए, तब तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने कोई ठोस सैन्य सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाया। इस घटना ने खाड़ी देशों में भारी असुरक्षा की भावना पैदा की।

  1. शर्तों पर आधारित संबंध: पश्चिमी देशों द्वारा मानवाधिकारों और आंतरिक शासन प्रणाली को लेकर लगातार बनाए जाने वाले दबाव से सऊदी नेतृत्व असहज महसूस करने लगा।

3.बीजिंग समझौता (2023): चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली पश्चिम एशिया के इतिहास का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक मोड़ साबित हुई। अमेरिका की सहमति के बिना रियाद और तेहरान का एक मेज पर आना यह दर्शाता है कि वाशिंगटन अब इस क्षेत्र का एकमात्र निर्णायक नहीं रहा।

रियाद का यह रणनीतिक विचलन स्पष्ट करता है कि मध्य पूर्व अब पश्चिमी प्रभुत्व वाले शून्य-योग खेल (Zero-Sum Game) से बाहर निकलकर क्षेत्रीय स्वायत्तता और बहुध्रुवीय सहयोग की ओर कदम बढ़ा रहा है।

  1. अफ़ग़ानिस्तान का ऐतिहासिक दलदल और हथियारों का रणनीतिक हस्तांतरण

मुस्लिम दुनिया के आधुनिक शक्ति संतुलन को समझने के लिए अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास और वहाँ लड़े गए दो बड़े संघर्षों का विश्लेषण अनिवार्य है।

1980 का दशक: सोवियत संघ का विघटन

1979 में जब सोवियत सेना अफ़ग़ानिस्तान में दाखिल हुई, तब पाकिस्तान ने पश्चिमी और इस्लामी दुनिया के सहयोग से अफ़गान मुजाहिदीन को संगठित और प्रशिक्षित करने में केंद्रीय भूमिका निभाई। लगभग एक दशक तक चले इस गुरिल्ला युद्ध ने सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था और सैन्य मनोबल को इस कदर तोड़ दिया कि अंततः उसे अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। यह घटना सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध की समाप्ति का एक प्रमुख कारण बनी।

अफगानिस्तान पर अपना वर्चस्व तो एक तरफ सोवियत यूनियन के ही कई बड़े राज्यों ने  बगावत कर खुद को उससे अलग कर लिया इस तरह  कई नए राष्ट्रों का जन्म हुआ।

2021: अमेरिकी सेना की वापसी और पीछे छूटे आधुनिक हथियार

अगस्त 2021 में काबुल से अमेरिकी सेना की हड़बड़ाहट भरी वापसी ने विश्व को वियतनाम की पराजय की याद दिला दी। इस वापसी के दौरान अमेरिकी सेना लगभग 7 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान जिनमें बख्तरबंद गाड़ियाँ, नाइट-विज़न उपकरण, अत्याधुनिक संचार प्रणालियाँ और हल्के विमान शामिल थे पीछे छोड़ भागी एक तर्क संगत शब्द है क्योंकि अमेरिकी सैनिक बुरी तरह दबाव में थे ।

हथियारों का अप्रत्याशित उपयोग

पश्चिमी योजनाकारों का यह आकलन था कि अफ़ग़ानिस्तान के विभिन्न कबीले और जातीय समूह अमेरिकी हथियारों का उपयोग आपस में लड़कर देश को एक अंतहीन गृहयुद्ध में झोंकने के लिए करेंगे। किंतु हुआ इसके विपरीत:

 कबीलाई सामंजस्य: पूर्व पाकिस्तानी नेतृत्व (विशेषकर इमरान खान के कार्यकाल के दौरान उठाए गए कदमों) और क्षेत्रीय मध्यस्थों के प्रयासों से अफ़गान समाज के विभिन्न घटकों और पश्तून कबीलों को बातचीत की मेज पर लाकर बड़े गृहयुद्ध को काफी हद तक टाला गया।

चीन के साथ सामरिक साझेदारी: अफ़ग़ानिस्तान के नए प्रशासन ने टकराव के बजाय आर्थिक पुनरुद्धार को प्राथमिकता दी। उन्होंने चीन को अफ़ग़ानिस्तान के विशाल लिथियम, ताँबा और दुर्लभ खनिज भंडारों के दोहन का अवसर दिया। बदले में, पीछे छूटे अमेरिकी सैन्य उपकरणों की तकनीक और इंजीनियरिंग के अध्ययन में चीनी विशेषज्ञों की तकनीकी सहायता प्राप्त कर उन्हें क्रियाशील रखा और क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को मजबूत किया।

  1. उभरता हुआ चतुर्भुज: पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और ईरान

आज जिस ‘इस्लामिक नाटो’ या बहुपक्षीय इस्लामी सुरक्षा समन्वय की चर्चा हो रही है, वह चार प्रमुख देशों के अभिसरण (Convergence) पर आधारित है। इनमें से प्रत्येक देश एक विशिष्ट शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है:

  1. पाकिस्तान: परमाणु और जनसांख्यिकीय सैन्य क्षमता

* मुस्लिम दुनिया का एकमात्र घोषित परमाणु संपन्न राष्ट्र।

* पारंपरिक रूप से प्रशिक्षित विशाल थल सेना और वायुसेना, जिसका खाड़ी देशों की सुरक्षा में लंबा ऐतिहासिक अनुभव रहा है।

* चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) के माध्यम से यूरेशियाई व्यापारिक मार्गों से सीधा जुड़ाव।

  1. तुर्की: औद्योगिक और तकनीकी श्रेष्ठता

* नाटो का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य बल, जिसके पास पश्चिमी मानकों का तकनीकी ज्ञान है।

* बेराक्तार (Bayraktar) जैसे विश्व प्रसिद्ध मानव रहित विमानों (ड्रोन) का निर्माता, जिसने अजरबैजान, लीबिया और अन्य संघर्षों में आधुनिक युद्ध का स्वरूप बदल दिया।

* ऐतिहासिक रूप से खिलाफत की पुरानी प्रतिष्ठा और यूरोप व एशिया के बीच एक प्राकृतिक भौगोलिक सेतु।

  1. सऊदी अरब: वित्तीय और कूटनीतिक गुरुत्वाकर्षण

* विशाल वित्तीय संसाधन, संप्रभु संपत्ति कोष (Sovereign Wealth Funds) और वैश्विक तेल बाजार पर निर्णायक नियंत्रण।

* मक्का और मदीना के दो पवित्र मस्जिदों के संरक्षक के रूप में संपूर्ण मुस्लिम जगत में अद्वितीय नैतिक और धार्मिक प्रभाव।

* ‘विजन 2030’ के तहत रक्षा उद्योग का स्थानीयकरण करने और पश्चिमी हथियारों पर निर्भरता घटाने का दृढ़ संकल्प।

  1. ईरान: प्रतिरोध का अनुभव और भू-रणनीतिक अवस्थिति

* दशकों के प्रतिबंधों के बावजूद स्वदेशी रूप से विकसित की गई बैलिस्टिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियाँ।

* कैस्पियन सागर से लेकर फारस की खाड़ी तक का सामरिक विस्तार, जो चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और रूस के ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ (INSTC) की रीढ़ है।

जब ये चार शक्तियाँ अपने ऐतिहासिक, धार्मिक और वैचारिक मतभेदों को किनारे रखकर एक साझा न्यूनतम सुरक्षा एजेंडे पर सहमत होती हैं, तो यह गठबंधन पश्चिमी दुनिया के लिए सबसे गंभीर रणनीतिक चुनौती बन जाता है।

  1. लाल सागर का मोर्चा: हूती संकट और नए कूटनीतिक समीकरण

हाल के महीनों में लाल सागर (Red Sea) और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में यमन के हूती आंदोलन द्वारा की गई कार्रवाइयों ने वैश्विक समुद्री व्यापार की नब्ज पर हाथ रख दिया है। यह संकट इस बात का जीवंत प्रमाण बन गया कि पश्चिमी नौसैनिक शक्ति अब वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर निर्विवाद नियंत्रण नहीं रखती।

सऊदी अरब का संतुलित रुख

अतीत में सऊदी अरब ने पश्चिमी गठबंधन के समर्थन से यमन में लंबा सैन्य अभियान चलाया था। किंतु वर्तमान संकट में रियाद ने अत्यधिक परिपक्व और कूटनीतिक रुख अपनाया:

पश्चिमी सैन्य गठबंधन से दूरी:जब अमेरिका और ब्रिटेन ने लाल सागर में ‘ऑपरेशन प्रॉस्परिटी गार्डियन’ नामक नौसैनिक गठबंधन बनाया, तो सऊदी अरब ने इसमें सीधे शामिल होने से इनकार कर दिया।

शांति प्रक्रिया को प्राथमिकता: सऊदी नेतृत्व ने हूतियों के साथ प्रत्यक्ष बातचीत और स्थायी संघर्ष विराम को प्राथमिकता दी। रियाद ने यह भली-भाँति समझ लिया कि पश्चिमी सैन्य अभियानों का हिस्सा बनने से केवल उसका अपना बुनियादी ढाँचा खतरे में पड़ेगा, जबकि वास्तविक समाधान क्षेत्रीय संवाद से ही संभव है।

इस्लामिक नाटो की अप्रत्यक्ष विजय: पश्चिमी शक्तियों के दबाव के बावजूद क्षेत्रीय ताकतों द्वारा अपने हितों को प्राथमिकता देना और आपसी टकराव से बचना इस बात का संकेत है कि ‘विभाजित करो और शासन करो’ की पुरानी नीति अब निष्प्रभावी हो रही है।

 

  1. अमेरिका के पश्चिम एशिया से संभावित प्रस्थान के निहितार्थ

यदि यह उभरता हुआ इस्लामी सुरक्षा ढाँचा अपने व्यावहारिक स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, तो इसके वैश्विक भू-राजनीति पर दूरगामी परिणाम होंगे:

  1. पेट्रो-डॉलर का अवसान: सऊदी अरब, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा गैर-डॉलर मुद्राओं (जैसे चीनी युआन, स्थानीय मुद्राएँ) में तेल व्यापार की स्वीकार्यता से अमेरिकी डॉलर की वैश्विक आरक्षित मुद्रा (Global Reserve Currency) के रूप में स्थिति कमजोर होगी।
  2. सैन्य अड्डों की प्रासंगिकता पर संकट: कतर, बहरीन और जिबूती में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों की उपयोगिता सीमित हो जाएगी यदि मेजबान देश अपने पड़ोसियों के विरुद्ध इन अड्डों के उपयोग की अनुमति देने से इनकार कर दें।
  3. यूरेशियाई एकीकरण:  मध्य पूर्व का आर्थिक और सामरिक झुकाव ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की ओर तेजी से बढ़ेगा, जिससे एक ऐसा यूरेशियाई महा-गठबंधन उभरेगा जिसकी धुरी बीजिंग, मॉस्को, रियाद और तेहरान होगी।

 

विचारणीय निष्कर्ष: साझा भविष्य और संप्रभुता का संकल्प

प्रथम विश्व युद्ध की राख से लेकर आधुनिक बहुध्रुवीय व्यवस्था के उदय तक, मुस्लिम दुनिया ने एक लंबा और रक्तरंजित चक्र पूरा किया है। ख़िलाफ़त के पतन के बाद जिस तरह पश्चिमी शक्तियों ने इस क्षेत्र को अपनी जागीर समझा और दशकों तक अपने वफादारों के जरिए संसाधनों की लूट की, उसका दौर अब अपने अंतिम पड़ाव पर है।

इराक, लीबिया और अफगानिस्तान की त्रासदियों ने मुस्लिम बहुल राष्ट्रों को यह कड़वा सच सिखा दिया है कि बाहरी सुरक्षा आश्वासनों की कीमत आंतरिक संप्रभुता खोकर चुकानी पड़ती है।

 

ईरान का तकनीकी प्रतिरोध, तुर्की का सामरिक आत्मविश्वास, सऊदी अरब की आर्थिक दूरदर्शिता और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता यदि ये चारों स्तंभ अपने आपसी मतभेदों को भुलाकर एक वास्तविक ‘इस्लामिक नाटो’ या साझा क्षेत्रीय सुरक्षा मंच का निर्माण करते हैं, तो यह न केवल मुस्लिम राष्ट्रों के सम्मान की पुनर्स्थापना होगी, बल्कि सदियों पुराने औपनिवेशिक नियंत्रण को समाप्त कर एक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त करेगी। इतिहास का पहिया घूम चुका है, और आने वाला समय क्षेत्रीय आत्मनिर्भरता तथा संप्रभु आत्मनिर्णय का साक्षी बनने जा रहा है।

 

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