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धर्म गाथा: जब महामृत्युंजय मंत्र के 10 करोड़ जाप से चंद्रदेव पर प्रसन्न हुए शिव जी, जानिए सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी

Sawan Katha: श्रावण माह आरंभ हो चुक है। पूरे मास चलने वाले सावन में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा करने का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से शिव जी अति प्रसन्न होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। ऐसे ही सावन माह के दौरान ‘धर्मगाथा’ श्रृंखला में जानिए शिव जी और चंंद्र देव की ऐसी कथा के बारे में जिसमें भोलेनाथ सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए। क्या आप जानते हैं कि प्रजापति राजा दक्ष ने अपनी पुत्रियों के मोह पर चंद्रमा को मलीन होने का श्राप दे दिया था। इस श्राप के कारण चंद्रमा को अपनी 16 कलाओं से हाथ धोना पड़ा था। लेकिन ब्रह्मा जी सहित अन्य देवी-देवता के कहने पर उन्होंने भोलेनाथ की पूजा की, जिससे कारण उनकी कलाएं तो वापस आई। इसके साथ ही भगवान शिव चंद्र देव की तपस्या से प्रसन्न होकर सोमेश्वर कहलाएं और सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए। आइए ‘धर्म गाथा’ श्रृंखला में जानते हैं भगवान शिव की कृपा, चंद्रमा की तपस्या और विश्व प्रसिद्ध सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की अद्भुत पौराणिक कथा….

चंद्रमा को मिले श्राप और शिव जी के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होने की कथा शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता के चौदहवां अध्याय में विस्तार से बताया गया है।

प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से किया

इस कथा के अनुसार, सूत जी कहते हैं कि हे ऋषियो! अब मैं आपको सोमनाथ नामक ज्योतिर्लिंग की महिमा के बारे में बताता हूं। प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्वनी रोहिणी नामक सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया। जिन्हें पाकर चंद्रमा की शोभा बढ़ गई। अपनी सभी पत्नियों में चंद्रमा रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे। लेकिन ये बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। इससे वह काफी दुखी रहती थी।

दक्ष पुत्रियों ने पिता से की चंद्रमा के व्यवहार की शिकायत

ऐसे में दक्ष पुत्रियों ने दुखी होकर एक दिन उन्होंने अपने पिता को इस विषय में बताया। ऐसे में प्रजापति दक्ष होने उन्हें सांत्वना दी कि वह चंद्रमा को समझाएंगे। तब प्रजापति दक्ष चंद्रमा को समझाने लगे।

ऐसे में दक्ष ने चंद्रमा से कबा कि हे जामाता… मैंने अपनी सत्ताईस कन्याओं का विवाह तुमसे किया है परंतु आप उनसे असमानता का व्यवहार क्यों करते हैं। एक पत्नी से प्रेम और अन्यों से प्रेम न करना, सही नहीं है। इसलिए आपको सभी पत्नियों को समान रूप से प्यार करना चाहिए। ऐसा समझाकर दक्ष अपने घर लौट गए परंतु चंद्रदेव ने उनकी बातों को सरलता से लिया और उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

दक्ष ने चंद्रमा को दिया क्षीण और मलिन होने का श्राप

तब एक दिन दक्ष पुत्रियों ने पुनः अपने पिता से चंद्रमा के व्यवहार के बारे में बात की। यह जानकर प्रजापति दक्ष को क्रोध आ गया और उन्होंने चंद्रमा को क्षीण व मलिन होने का शाप दे दिया। उनके शाप के फलीभूत होने से चंद्रमा की कांति क्षीण हो गई और वह मलिन हो गया। चंद्रमा की ऐसी स्थिति देखकर देवराज इंद्र व अन्य सभी देवता मिलकर ब्रह्माजी के पास गए और उन्हें जाकर सब बातें बताईं तथा चंद्रमा का उद्धार करने के लिए कहा।

ब्रह्माजी ने बताया प्रभास तीर्थ में शिव आराधना का उपाय

तब ब्रह्माजी बोले ने देवताओं से कहा कि यह चंद्रमा बड़ा ही दुष्ट प्रवृत्ति का है। पूर्व में भी यह देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा को ले भागा था। अब यह दक्ष पुत्रियों के साथ असमानता का व्यवहार कर सभी को दुखी कर रहा है परंतु फिर भी तुम्हारी प्रार्थना पर मैं एक उपाय बताता हूं। यदि चंद्रमा प्रभास नामक पवित्र तीर्थ में जाकर भगवान शिव की आराधना करके महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर उन्हें प्रसन्न करे, तभी उसके दुखों का निवारण हो सकता है। ब्रह्माजी को प्रणाम करके सब देवता इंद्र सहित चंद्रमा के पास आए और उन्हें सारी बातें बताईं।

चंद्रमा ने प्रभास क्षेत्र में शुरू की भगवान शिव की कठोर तपस्या

तब उन्हें लेकर वे प्रभास क्षेत्र पहुंचे। वहां जाकर चंद्रमा ने विधि-विधान से त्रिलोकीनाथ भगवान शिव का पूजन किया और आसन पर बैठकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने लगे। इस प्रकार वे दृढ़तापूर्वक मंत्र का जाप करते रहे। दस करोड़ जाप पूरे होते ही भगवान शिव प्रसन्न होकर चंद्रमा के सम्मुख प्रकट हो गए। उन्होंने चंद्रमा से मनोवांछित वस्तु मांगने के लिए कहा।

भगवान शिव ने चंद्रमा को दिए दर्शन और मांगा वरदान

चंद्रमा ने हाथ जोड़कर आराध्य शिवजी को प्रणाम किया और बोले कि हे भगवन्… यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मेरे क्षय रोग को दूर कर दीजिए। इस बात पर भगवान शिव जी ने कहा कि हे चंद्रमा ! मैं प्रजापति दक्ष के शाप को समाप्त नहीं कर सकता, पर उसका प्रभाव कम कर सकता हूं।

शिवजी ने दक्ष के श्राप का प्रभाव किया कम

भोलेनाथ ने आगे कहा कि लेकिन माह के कृष्ण पक्ष में पंद्रह दिनों में तुम्हारी कलाएं क्षीण होंगी तथा शुक्ल पक्ष के पंद्रह दिनों में ये कलाएं बढ़ेंगी। इसके साथ ही चंद्रमा की कलाएं वापस आ गई।

सोमेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए भगवान शिव

चंद्रमा ने शिवजी से प्रार्थना करते हुए निवेदन किया कि आप देवी पार्वती सहित यहीं पर निवास करें। तब उनकी प्रार्थना को स्वीकारते हुए चंद्रमा के नाम से ही शिवजी सोमेश्वर कहलाए व संसार में सोमनाथ नाम से विख्यात हुए।

देवताओं ने बनाया पवित्र चंद्र कुण्ड

वहीं पर चंद्र कुण्ड नाम से एक कुण्ड देवताओं ने बनाया। इस कुण्ड में ब्रह्माजी व शिवजी का निवास माना जाता है। इस कुण्ड में स्नान करने से सभी पाप छूट जाते हैं। छः मास तक इस पवित्र कुण्ड के जल में स्नान करने से असाध्य रोगों से भी मुक्ति मिल जाती है तथा मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा सुनने से मिलता है पुण्य फल

भगवान शिव के आशीर्वाद से चंद्रमा नीरोग हो गए और पहले की भांति अपना कार्य करने लगे। इस प्रकार मैंने सोमनाथ की उत्पत्ति के बारे में तथा ‘सोमेश्वर’ ज्योतिर्लिंग के बारे में बताया। इस कथा को सुनने, पढ़ने अथवा दूसरों को सुनाने से अभीष्ट फल की प्राप्त होती है और पाप से मुक्ति मिल जाती है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह कथा धार्मिक मान्यताओं, पुराणों और आध्यात्मिक परंपराओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत की जानकारी साझा करना है। इसमें वर्णित घटनाएं श्रद्धा और मान्यताओं से जुड़ी हैं, जिनकी अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं।

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