Karakoram Expressway संप्रभुता का समर्पण और क्षेत्रीय सुरक्षा पर मंडराता खतरा
प्रस्तावना:
आर्थिक गलियारे की आड़ में नव-उपनिवेशवाद
जब कोई राष्ट्र गलत हाथों में चला जाता है, जनता से अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए उलटे सीधे निर्णय लेने लगता है और आर्थिक अक्षमता और रणनीतिक हताशा में किसी विस्तारवादी महाशक्ति के सामने घुटने टेक देता है, तो वह सीधे तौर पर अपनी संप्रभुता का सौदा कर बैठता है। आज हमारे सामने इसका एक उदाहरण हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है क्योकि पाकिस्तान और चीन के संबंध कुछ इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ‘सदाबहार दोस्ती’ और ‘शहद से मीठी, हिमालय से ऊंची’ जैसे कूटनीतिक जुमलों की ओट में पाकिस्तान धीरे-धीरे चीन के कर्ज के जाल (Debt-Trap Diplomacy) और भू-राजनीतिक शिकंजे में पूरी तरह जकड़ चुका है।
खुद कुछ ना करने की आदत पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के ‘फेज-2’ (Phase-2) को दी गई स्वीकृति ने इस बात को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है क्योकि पाकिस्तान का व्यापार इतना व्यापक नही कि वह यूरोप के देशों तक सड़क मार्ग से पहुंच सके जबकि चीन के लिए पाकिस्तान ने एक ऐसा सुनहरा अवसर पैदा कर दिया है कि चीन की सड़क मार्ग से यूरोप तक पहुंच का रास्ता पाकिस्तान ने साफ कर दिया है। यह भारत के लिए सीधी चुनोती है क्योकि भारत के तीव्र विरोध की अनदेखी करते हुए इस्लामाबाद ने बीजिंग के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। यह केवल एक आर्थिक समझौता नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक स्थिरता को दांव पर लगाने और पूरे क्षेत्र को एक सैन्यीकृत सुरक्षा संकट में धकेलने की आत्मघाती कवायद है।
1. सी-पैक (CPEC) का फेज़-2, संप्रभुता को गिरवी रखने का दूसरा नाम
चीन के ड्रीम प्रोजैक्ट CPEC के पहले चरण की नाकामी, भारी विदेशी कर्ज और पाकिस्तान में चीनी नागरिकों पर बढ़ते आत्मघाती हमलों के बावजूद, पाकिस्तान के सेना की कठपुतली सरकार ने ‘फेज-2’ को हरी झंडी दे दी है। दूरगामी दृष्टि से अगर देखा जाए तो यह निर्णय पाकिस्तान की संप्रभुता की ताबूत में आखिरी कील साबित होने जा रहा हैक्योंकि पाकिस्तान पर शासन करने वाले लगभग सभी शासक देश की जनता के पैसा अपने निजी कारोबार में विदेशों में लगाते हैं जिसका खुलासा पनामा लीग जैसी फाइलों में जाहिर हो चुका है। पाकिस्तान इस समय डिफॉल्ट होने की कगार पर है। CPEC फेज-2 के तहत नए समझौतों का सीधा मतलब है- चीन से और अधिक वाणिज्यिक ऋण (Commercial Loans) लेना, जिनकी ब्याज दरें अंतरराष्ट्रीय बाजार से कहीं अधिक हैं,फेज-2 के तहत पाकिस्तान के कृषि, औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्रों में चीन की पैठ और गहरी होगी। वास्तव में, यह पाकिस्तान के नीति-निर्माण तंत्र पर चीन के पूर्ण नियंत्रण का रास्ता साफ करता है।
2. काराकोरम एक्सप्रेसवे, कनेक्टिविटी या सैन्य घुसपैठ?
चीन के इस ड्रीम प्रोजैक्ट का मुख्य केंद्र बिंदु 1300 किलोमीटर लंबा काराकोरम एक्सप्रेसवे है। इसे दुनिया की सबसे खतरनाक और ऊंचाई पर मौजूद सड़कों में गिना जाता है। अब इसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के मुख्य तंत्र के तौर अपग्रेड किया जा रहा है।
चीन इस 1300 किलोमीटर लंबी सड़क का विकास केवल व्यापार सुगमता के लिए नहीं कर रहा है। उसकी मंशा सैन्य निहितार्थों को नजरअंदाज नहीं कर सक्ते क्योकि चीन के मुताबिक, इसके माध्यम से चीन हर मौसम में सीधे अरब सागर तक पहुंच बनाना चाहता है युद्ध के मौके पर यह एक्सप्रेसवे चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और पाकिस्तानी सेना के लिए रसद और भारी सैन्य साजो-सामान की सुगम आवाजाही का मुख्य जरिया बनेगा , क्योंकि यह एक्सप्रेसवे भारत की उत्तरी सीमाओं (लद्दाख और जम्मू-कश्मीर) के ठीक समानांतर और ऊपर से गुजरता है, जो भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए एक सीधी और निरंतर बनी रहने वाली चुनौती है।
3. चीन का ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ या अरब सागर में घेराबंदी
काराकोरम एक्सप्रेसवे का दूसरा छोर बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जाकर मिलता है। चीन ने ग्वादर बंदरगाह का विकास ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) का सबसे महत्वपूर्ण और विवादित हिस्सा है।
| पहलू | विवरण और आलोचनात्मक विश्लेषण |
| मृग मरीचिका | पाकिस्तान को सपना दिखाया गया था कि ग्वादर दुबई या सिंगापुर बनेगा। हकीकत यह है कि स्थानीय बलूच जनता पीने के पानी और बिजली के लिए तरस रही है, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में भारी जन-आक्रोश है। |
| व्यापारिक केन्द्र या नौसैनिक अड्डा (Naval Base) | हालांकि इसे एक व्यापारिक बंदरगाह कहा जाता है, लेकिन इसकी गहराई और बनावट चीनी युद्धपोतों और पनडुब्बियों (Submarines) के अनुकूल बनाई गई है। यह चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर में भारत को घेरना है। |
| मलक्का जलडमरु का समाधान | चीन अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए ‘मलक्का जलडमरूमध्य’ पर निर्भर है। ग्वादर के चालू होने से चीन सीधे खाड़ी देशों से तेल लाकर जमीन के रास्ते अपने देश पहुंचा सकता है, जिससे हिंद महासागर में भारत का भू-राजनीतिक लाभ कम हो जाता है। |
4. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में निर्माण
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर और गैर-कानूनी पहलू यह है कि CPEC की अधिकांश परियोजनाओं का संबन्ध पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र से हैं। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित है और संवैधानिक एवं ऐतिहासिक रूप से भारत का अभिन्न अंग है, जिस पर पाकिस्तान ने अवैध कब्जा कर रखा है।
एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत का यह स्पष्ट रुख रहा है कि उसकी क्षेत्रीय अखंडता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है। चीन और पाकिस्तान मिलकर एक विवादित और कब्जे वाले क्षेत्र में स्थायी बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लंघन है।
इस क्षेत्र में चीनी निवेश और चीनी सैनिकों की मौजूदगी से कश्मीर मुद्दे के त्रिपक्षीयकरण (Trilateralization) का प्रयास बढ़ रहा है, जो भारत स्वीकार नहीं है जबकि चीन यहाँ बांध, सड़कें और संचार नेटवर्क बनाकर पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैधता देने की कोशिश कर रहा है।
5. भारत का चीन और पाकिस्तान को स्पष्ट और कड़ा जवाब
भारत ने इस दुर्भावनापूर्ण गठजोड़ के सामने घुटने टेकने के बजाय अत्यंत आक्रामक और कूटनीतिक रूप से दृढ़ रुख अपनाया है। भारत का जवाब बहुआयामी और स्पष्ट रहा है:
कूटनीतिक प्रतिरोध
भारत ने वैश्विक मंचों (G20, SCO, और UN) पर बार-बार यह दोहराया है कि कोई भी कनेक्टिविटी परियोजना किसी देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करके नहीं बनाई जा सकती। भारत ने इसी कारण से चीन के BRF (बेल्ट एंड रोड फोरम) की बैठकों का सदैव बहिष्कार किया है।
सैन्य तत्परता और बुनियादी ढांचे का विकास
चीन और पाकिस्तान के इस ‘टू-फ्रंट’ (Two-Front) खतरे का मुकाबला करने के लिए भारत ने अपनी रणनीति को बदला जिसमें भारत ने लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सड़कों, पुलों, सुरंगों (जैसे सेला और अटल टनल) और रणनीतिक हवाई पट्टियों (Advance Landing Grounds) का जाल बिछा दिया है, साथ ही भारत ने मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने वाले ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे’ (IMEC) और ईरान के ‘चाबहार बंदरगाह’ के विकास के माध्यम से चीन के CPEC का एक मजबूत भू-राजनीतिक विकल्प तैयार किया है।
6. पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा
CPEC फेज-2 और काराकोरम एक्सप्रेसवे का यह विस्तार ना सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। इसके कुछ दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं PoK और बलूचिस्तान की मूल आबादी की मर्जी के बिना चीनी कब्जे के कारण उग्रवाद भड़क उठा है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसी संस्थाएं चीनी इंजीनियरों और काफिलों पर लगातार हमले कर रही हैं। पाकिस्तान इन हमलों को रोकने के लिए अपनी ही जनता पर क्रूर दमन चक्र चला रहा है, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है, साथ ही काराकोरम से लेकर ग्वादर तक चीनी सुरक्षा बलों और निगरानी तंत्र (Surveillance Systems) की तैनाती ने इस पूरे बेल्ट को एक संभावित युद्ध क्षेत्र का रुप दे दिया है, इस गलियारे की आड़ में चीन और पाकिस्तान के बीच परमाणु और मिसाइल प्रौद्योगिकी का गुप्त आदान-प्रदान और आसान हो गया है, जो वैश्विक अप्रसार (Non-proliferation) के प्रयासों को तमाचा है।
इतिहास की भूल और पाकिस्तान का भविष्य
संक्षेप में कहा जाए तो, पाकिस्तान जिसे अपनी आर्थिक समृद्धि का ‘गेम चेंजर’ (Game Changer) मान रहा है, वह वास्तव में उसके लिए ‘नॉन-सोवरेन डेथ वारंट‘ (Sovereign Death Warrant) साबित हो रहा है। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का जो हश्र हुआ (जहां कर्ज न चुका पाने के कारण उसे 99 साल के लिए चीन को सौंपना पड़ा), पाकिस्तान उसी राह पर तेजी से बढ़ रहा है।
भारत के वैध विरोध की अनदेखी करके और अपनी धरती व PoK को चीनी औपनिवेशिक हितों के लिए सौंपकर पाकिस्तान ने न केवल भारत के साथ शांति की संभावनाओं को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है, बल्कि खुद को बीजिंग का एक ‘सैटेलाइट स्टेट’ (सहमति वाला गुलाम राष्ट्र) बना लिया है। काराकोरम एक्सप्रेसवे और ग्वादर का यह घालमेल भविष्य में किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध की नींव रख रहा है। यदि समय रहते अंतरराष्ट्रीय समुदाय और स्वयं पाकिस्तान के समझदार तबके ने इस चीनी विस्तारवाद को नहीं रोका, तो दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी चीन की साम्राज्यवादी भूख और पाकिस्तान की रणनीतिक अंधता पर होगी।