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कथित मुस्लिम रहबरों और राजनीतिक दलालों से निजात पाना ही मुस्लिम समाज की भलाई का एक मात्र रास्ता: आज़ाद ख़ालिद

muslim politicsग़ाज़ियाबाद (22 जुलाई 2017)- कभी अपने वोट की ताकत के दम पर सरकारों को बनाने और गिराने की ताकत रखने वाला मुस्लिम समाज आज इतना बेबस और नाकारा क्यों दिख रहा है कि केंद्र से लेकर राज्यों तक के चुनावों में उसकी कतई नहीं चली। इतना ही नहीं जिसको उसने समर्थन दिया उस राजनीतिक पार्टी की नय्या डूब गई और जिस ने मुस्लिम समाज को नज़र अंदाज़ किया वो कामयाबी के शिखर पर पहुंच गया।(http://www.oppositionnews.com exclusive) आखिर क्या वजह है आज मुस्लिम समाज एक कटी पंतग की तरह सिर्फ हिचकोले लेते हुए अपनी ज़मीन को तरस रहा है और उसको सिर्फ लूटने वाले तो दिख रहे हैं लेकिन हाशिये पर खड़ा मुस्लिम समाज भीड़ में अपने हमदर्द को नहीं तलाश कर पा रहा है।
सवाल ये है कि क्या अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज को अपने मौजूदा कथित रहबरों को नकारते हुए नये चेहरों की तलाश करनी चाहिए। क्या मुस्लिम समाज को अब जात बिरादरी और धार्मिक और जज़्बाती नारों से ऊपर उठ कर रोज़गार, शिक्षा, देश की मुख्यधारा से ज़ुड़ने और बराबरी के हक़ जैसे दूसरे ज़मीनी मुद्दों के आधार पर नई सियासी दिशा और दशा तय करने की पहल करनी चाहिए। (http://www.oppositionnews.com exclusive) क्या वाक़ई अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज को राजनीति के बजाए मिशनरी सोच के लोगों को अपनी सियासी कमान सौंप देनी चाहिए।
दरअस्ल हम बहुत दिन से कह रहे थे कि मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी समस्या है, उनका अपना ही कथित राजनीतिक नेतृत्व। बतौर एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता आम मुस्लिम हमारी बात को सुनता भी था और उसको स्वीकार भी करता था। लेकिन चूंकि कथित मुस्लिम नेता बेहद शार्प और शातिर थे उन्होने मुस्लिम समाज को अपने घेरे में लिये रखा और हर सियासी दल में सिर्फ दरियां उठावाने का काम समाज के नौजवानों से लिया जाता रहा। (http://www.oppositionnews.com exclusive)मुस्लिम नौजवानों को रोज़गार, शिक्षा और देश की मुख्यधारा से दूर रखने के लिए कथित मुस्लिम नेताओं ने जितनी महनत की अगर उसका कुछ अंश भी समाज की भलाई और शिक्षा के लिए लगाया जाता तो आज समाज की दशा और दिशा ही दूसरी होती। हालात ये हुए कि कभी जिन लोगों ने सड़कों पर कबाड़ बेचा और जो लोग पुलिस से बचने के लिए पुलिस के मुखबिर बन गये उन्ही लोगों ने कलफ वाला कुर्ता घारण किया और मुस्लिम समाज को धार्मिक और भावनात्मक नारों के सियासी जाल में घेर लिया।
आइए आज सबसे पहले देखते हैं कि आखिर क्यों जो लोग कभी सड़क पर कबाड़ इकठ्ठा करके और पुलिस की मुखबिरी करके अपने घर को चलाने और पुलिस से बचने की जुगत करते थे उनमे से कितने करोड़पति ही नहीं बल्कि चंद साल में अरबपति हो गये और आम मुस्लिम आज भी रोज़गार और दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्षरत है।
दरअस्ल आज़ादी के बाद पाकिस्तान पलायान और सांप्रदायिक दंगों में लुटे पिटे मुस्लिम समाज के सामने सबसे बडी समस्या थी कि आखिर कैसे दोबारा अपने आपको भारतीय कहते हुए समाज की मुख्यधारा से जुड़ा रहे। हांलाकि सच्चाई यही है कि भारत छोड़कर पाकिस्तान जाने वालों से कहीं ज्यादा उन लोगों की तादाद थी जो भारत की माटी को अपना ओढ़ना बिछौना मानता था।(http://www.oppositionnews.com exclusive) लेकिन पाकिस्तान जाने और जिन्ना की सोच के ज़हर का डसा मुस्लिम समाज बेहद उपेक्षित और सवालों के दायरे में खड़ा रह गया था। ऐसे में महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जवाहर लाल नेगरु,हसरत मोहानी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, समेत कई समझदार लीडरों मुस्लिम समाज को सहारा दिया और एक बार फिर भारतीय होने का मुस्लिम समाज को एहसास कराया।
आजादी के बाद ज़मींदारा उन्मूलन के नाम पर सम्पन्न मुस्लिम लोगों को आर्थिक झटके बाद सरकारी नौकरियों से लेकर निजी कारोबार तक में समाज के लोगों उपेक्षा का शिकार होना पड़ा और इसके बाद समाज के आर्थिक हालात बदतर होते चले गये। किसी भी समाज के आर्थिक हालात उसके शैक्षिक स्तर को तय करते हैं। और जो समाज शैक्षित रूप से पिछड़ जाता है वो राजनीतिक तौर पर भी हाशिये पर चला जाता है।
इसी राजनीतिक हाशिये पर पड़े मुस्लिम समाज को उसकी भलाई के सपने दिखाकर कांग्रेस ने एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया। ठीक उसी तरह जैसे कि दलित समाज के लिए काफी समय तक कांग्रेस मसीहा बनी रही। जिसके लिए कई दलित नेता कांग्रेस के लिए टूल की तरह काम करते रहे। (http://www.oppositionnews.com exclusive)कई दशक तक कांग्रेस के चंगुल में शोषण के शिकार दलित समाज को अपने रहनुमा बाबा साहेब के दर्शन को समझाने के लिए काशीराम, राम बिलास पासवान, मायावती जैसे की नेता उभरे और दलित समाज ने दलित वोट की ताक़त का एहसास करता हुए अपनी सियासी पहचान हासिल करनी शुरु कर दी।
लेकिन दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के साथ उसके ही कथित रहबर सिर्फ अपने आक़ाओं के तलुवे चाटने, समाज को धोखा और शोषण परोसते रहे। कई लोग तो कांग्रेस को जिताने या किसी दूसरी पार्टी को हराने के लिए चुनाव के ठीक पहले फरमान जारी करते और उसके एवज़ मोटी रकम और भौतिक सुख की चाबी हासिल करते रहे। नतीजा ये हुआ कि कई दशक के बाद मुस्लिम रहबरी के नाम पर कथित तौर पर संघ द्वारा मुलायम सिंह यादव जैसे कुछ लोग प्रमोट किये गये। ताकि लगातार कुठा का शिकार हो रहे मुस्लिमों की खुद की राजनीतिक जागरुकता को रोका जा सके और कांग्रेस के वोट बैंक को बिखेरा जा सके।(http://www.oppositionnews.com exclusive) इसका सीधा फायदा बीजेपी और कुछ क्षेत्रीय दलों को धीरे धीरे होता गया और बाबरी मस्जिद समेत कई दूसरे कारणों से मुस्लिम काफी हद तक कांग्रेस से दूर हो गया। 89-90 में वीपी सिंह का रातों रात नेता बनना और कांग्रेस का लगभग ख़ात्मा मुस्लिम एकता का भी एक नमूना था। लेकिन उसमें भी देखते ही देखते पलीता लगा और जनता दल अ, ब और स से होते हुए ण खाली तक पहुंचता चला गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप और वोट बैंक के तौर पर जाने गये बदनुमा तगमे के बीच पिसते मुस्लिम समाज की हर गली और मौहल्ले में छुटभय्या नेताओं की मानों बाढ़ आती चली गई।
हर वो आदमी जिसके घर में उसकी पत्नि और बच्चे तक उसकी नहीं सुनते थे वो भी क़ायद ए आज़म बनके मुस्लिम समाज के लिए घडियाली आंसू रोने का स्वांग भरने लगे।
इनके झूठ से पर्दा एक बार नहीं दर्जनों बार उठा, लेकिन संघ की सोच ने कथिततौर पर इनको फंडिग करके समाज के बीच खेत में चिड़ियों को भगाने वाले पुतले की तरह खडा रखा। चाहे बाबरी मस्जिद की शहादत के वक़्त दर्जनों बडे नेताओं की खामोशी हो या फिर उससे पहले मेरठ, मुरादाबाद, मलियाना समेत दर्जनों सांप्रदायिक दंगों में मुस्लिम समाज को रौंदने की कहानी। लेकिन कभी कोई भी कथिक मुस्लिम नेता अपनी राजनीतिक पार्टी तक में समाज के हित में अपनी आवाज़ तक नहीं उठाता नज़र आया। (http://www.oppositionnews.com exclusive)आहिस्ता आहिस्ता मुस्लिम समाज बेबस , लाचार और लावारिस के तौर पर स्थापित होता चला गया और सियासी कुकरमुत्तों की एंट्री हुई। कबाड़ी, चोर उचक्के और पुलिस के मुखबिर रातों रात कुर्तों पर कलफ लगाकर पुलिस से लोगों को पकड़वाने और मोटी रकम दिलाकर छुड़वाने के धंधे के साथ साथ नेता बनते चले गये। बेरोज़गार और अशिक्षित मुस्लिम नौजवानों की फौज को अपने इर्द गिर्द सुरक्षा गार्डों की तरह जमा करके कथित नेताओं ने समाज के भीतर अपनी गुंडई स्थापित की और मुस्लिम समाज के शरीफ तबके को दबाव लेते हुए हर राजनीतिक दल में पैठ बनानी शुरु कर दी। इस कथित मुस्लिम नेताओं की फौज की ताक़त इतनी बढ़ गई कि अगर कहीं कोई फर्जी एंकाउंटर या पुलिस उत्पीडन के मामले में समाज आवाज़ बुंलद करता तो यही नेता उसको मैनेज करने और खुद कमाओ और अपनो को भी कमवाओं के सिद्धांत पर मामले को दबाने लगे। (http://www.oppositionnews.com exclusive)नतीजा ये हुआ कि मुस्लिम समाज पूरी तरह बेबस और पिंजरे में बंद मुर्गे की तरह असहाय रहते हुए महज अपने कटने की बारी का इंतज़ार करता दिखने लगा।
दिल्ली का ओखला हो या फिर मेरठ, मुज़फ्फ़रनगर या सहारनपुर के दीवारे जहां मुस्लिम नेताओं, अध्यक्षों और राष्ट्रीय अध्यक्षों के होर्डिंग और बैनरों से अटी देखी जा सकती है। लेकिन सोच और राजनीतिक जागरुकता के नाम पर इनमे से एक भी नाम ऐसा नहीं दिखतो जो समाज के मुद्दों पर सरकारी मशीनरी से संवादहिनता को ख़त्म कर सके।
हम न तो ये कह रहे हैं कि मुलायम सिंह यादव ने आरएसएस के ऐजेंट के तौर पर मुस्लिम समाज को अपने सियासी पिंजरे में कैद करके सिर्फ अपने परिवार को सत्ता का सुख पहुंचाया। हम यह भी नहीं कह रहे कि ओवेसी और डॉक्टर अय्यूब जैसे कई दूसरे लोगों को लॉंच करने के लिए भगवा ब्रिगेड ने करोड़ों का दांव खेला। हम ये भी नहीं कह रहे कि संघ सैंकड़ों मौलानाओं को हर माह सिर्फ इस बात की तनख्वाह देता है कि उनकी पसंद का काम करते रहो। हमारा कहना यह भी नहीं कि मौलाना तौक़ीर रज़ा जैसे कई लोग भी वोटों को इधर उधर करने के लिए बाक़ायदा अपना फायदा साधते होंगे। (http://www.oppositionnews.com exclusive)हमारा सिर्फ इतना कहना है कि 20 रुपए का घड़ा में खरीदने के लिए जब बाज़ार में जाते हो तो उसको भी ठोक बजाकर देखने की तरह भले ही अपने नेता का इम्तिहान न लिया जाए। लेकिन इतना तो हर कोई समझता है कि आपके ही समाज से निकलने वाला कोई झोला छाप डॉक्टर, कोई कबाड़ी, पुलिस का मुखिबर या कोई फ्रॉड चेहरा भला खुद को रातों रात करोड़पति बनाने के बजाए समाज के हित की बात कैसे कर सकता है।(http://www.oppositionnews.com exclusive)
अगर आपको अपने बच्चों का भविष्य संवारना है और समाज की मुख्यधारा में रहते हुए आतंकवादी या भटके हुए नौजवान की बजाए सम्मानित और शिक्षित भारतीय की तरह एक इंजीनियर, डॉक्टर या कामयाब पेशेवर के तौर पर जीना है तो एक बार ज़रूर अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा कि आख़िर कमज़ोर कड़ी कहां है।
(लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं दूरदर्शन आंखों देखी, सहारा समय, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़ समेत कई दूसरे नेश्नल चैनल्स में मह्त्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं।)

About The Author

आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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