विडंबना, न्याय और अंतहीन आत्मग्लानि
भारतीय आपराधिक इतिहास में वर्ष 2006 का ‘निठारी कांड’ एक ऐसा अध्याय है जिसने मानवीय संवेदनशीलता और पूरी सामाजिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। नोएडा के सेक्टर-31 की डी-5 कोठी के पीछे नाले से जब मासूम बच्चों और युवतियों के कंकाल व अवशेष बरामद हुए, तो समूचा देश सन्न रह गया था। इस वीभत्स मामले में मुख्य आरोपी के तौर पर कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके घरेलू सहायक सुरेंद्र कोली के नाम सामने आए थे।
लंबी कानूनी प्रक्रिया और बरी होने का सच
लगभग दो दशकों तक चले इस मुकदमे में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, साक्ष्यों के संकलन और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए। अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में जांच में खामियों, पर्याप्त ठोस साक्ष्यों के अभाव और प्रक्रियागत चूकों का संज्ञान लेते हुए कई मामलों में पंढेर और कोली को बरी किया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप सिद्ध करने में विफल रहा। तकनीकी और कानूनी दृष्टि से यह एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मिली रिहाई थी, जिसे अक्सर अदालती भाषा में ‘बाइज्जत बरी’ कहा जाता है।
लेकिन आज देश के लगभग सभी समाचार पत्रों में सुरेन्द्र कोली की आत्महत्या की खबर पढ़ने को मिल रही है, खबरों के मुताबिक उत्तराखंड में हरिद्वार में उसने चाय की एक दुकान खोली थी बताया जा रहा है कि पारिवारिक कलेश और समाजिक बहिष्कार से हारकर उसने आत्महत्या की उसका शव उसकी चाय की दुकान में फंदे से लटका हुआ पाया गया।
“अपनी ही करनी का फल हैं नेकियां रुसवाइयां…”
कानून भले ही साक्ष्यों, बयानों और तकनीकी बिंदुओं के आधार पर किसी व्यक्ति को दंड से मुक्त कर दे, लेकिन अंतरात्मा की अदालत और सामाजिक चेतना का फैसला इससे भिन्न होता है। जैसा कि एक पुरानी कहावत कहती है:
“अपनी ही करनी का फल हैं नेकियां रुसवाइयां,
आपके पीछे चलेंगी आपकी परछाइयां।”
मनुष्य अपने कर्मों के परिणामों से कभी पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकता। जब कोई व्यक्ति ऐसे जघन्य कृत्यों के साये में घिरा हो जिसने अनगिनत परिवारों की दुनिया उजाड़ दी हो, तो चारदीवारी के बाहर का संसार भी उसके लिए कारागार से कम नहीं होता।
सामाजिक बहिष्कार और मानसिक कारावास
यदि काल्पनिक या विश्लेषणात्मक दृष्टि से उस परिदृश्य को देखा जाए जहाँ ऐसा व्यक्ति जेल की सलाखों से बाहर आ भी जाए, तो समाज उसे कभी स्वीकार नहीं करता:
संपूर्ण अलगाव: समाज का सामूहिक विवेक ऐसे अपराधों को कभी विस्मृत नहीं करता। कानूनी मुक्ति के बावजूद व्यक्ति समाज से पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाता है।
परछाइयों का पीछा: अतीत के भयावह कृत्य और उन मासूमों की चीखें एक अमिट परछाईं बनकर लगातार पीछा करती हैं।
आत्मग्लानि की पराकाष्ठा: जब सामाजिक संपर्क पूरी तरह समाप्त हो जाए और व्यक्ति केवल अपने अतीत के स्याह पन्नों के साथ अकेला रह जाए, तो वह मानसिक दबाव कई बार आत्महत्या जैसे दुखद और अंतिम कदम की ओर ले जाता है।
निठारी कांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि यह हमारी जांच प्रणाली की सीमाओं, सामाजिक विषमताओं और मानवीय क्रूरता का एक ऐसा दस्तावेज है जो हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि कानूनी तकनीकी से भले कोई बच निकले, लेकिन ऊपर वाले का अपना कानून है जो हर हाल में लागू होकर दिखाता है अपने कर्मों की जवाबदेही से कोई बच नहीं पाता।
