इतिहास गवाह है कि दुनिया ने ज्ञानियों के संघ देखे, पराक्रमियों के गठजोड़ देखे, वैज्ञानिक क्रांतियों के अग्रदूत देखे और आर्थिक मंदी से निपटने के लिए मेधावियों के थिंक टैंक भी देखे। मगर इक्कीसवीं सदी के रंगमंच पर विडंबनाओं का जो नवीनतम नाटक अभिनीत हुआ है, उसने व्यंग्य की तमाम सीमाओं को लांघकर यथार्थ को शर्मसार कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) की छत्रछाया में जब करीब तीन दर्जन कर्ज़दार देशों ने अपनी नैया पार लगाने के लिए पाकिस्तान को अपना सिरमौर चुना, तो कूटनीति की चौसर पर बैठी वैश्विक समझदारी ने चुपचाप माथा पीट लिया।
यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उस चरम हास्य का प्रतीक है जहाँ सबसे बड़े मर्ज़ को ही हकीम की उपाधि दे दी जाती है। जिस मुल्क की अपनी अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिन रही हो, जहाँ मुद्रास्फीति के आंकड़े सुरसा के मुंह की तरह प्रतिदिन चौड़े होते जा रहे हों, और जिसके हुक्मरान हर तीसरे महीने किसी नए ‘दोस्त’ मुल्क के दरवाजे पर हाथ बांधे खड़े नजर आते हों, उसे विकासशील देशों की कर्ज़ समस्याओं के समाधान का मंच सौंप देना वैसा ही है जैसे बिल्ली को दूध की रखवाली का ठेका देना या किसी पेशेवर दिवालिया को बैंक की सलाहकार समिति का अध्यक्ष बना देना।
मुफ़लिसी का ग्लोबल ताज: जब भिक्षापात्र बन गया राजदंड
दुनिया में योग्यता के कई पैमाने तय किए गए हैं। कोई देश अपनी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की विकास दर से चमकता है, कोई तकनीकी नवाचार से तो कोई अपने नागरिकों की जीवन प्रत्याशा से। मगर पाकिस्तान ने आधुनिक भू-राजनीति में एक नई विधा का आविष्कार किया है ‘कर्ज़ का कौशल’। जब लगभग तीन दर्जन लाचार, आर्थिक रूप से पस्त और कर्ज़ में डूबे राष्ट्रों ने अपने साझा दर्द की नुमाइंदगी के लिए इस्लामाबाद की ओर देखा, तो यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह एक अनुभवी ‘सिद्धहस्त’ के चरणों में शिष्यों का नतमस्तक होना था।
UNCTAD के गलियारों से निकले इस मंच का घोषित उद्देश्य था: विकासशील और अविकसित देशों के बढ़ते ऋण संकट की संरचनात्मक कमजोरियों का विश्लेषण करना, बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों से रियायतों की गुहार लगाना और दिवालिया होने से बचने के रास्ते खोजना।
मगर सवाल यह उठता है कि इन रास्तों का नक्शा खींचेगा कौन? नक्शानवीस वह मुल्क बना है जो खुद तीन सौ अरब डॉलर से अधिक के कुल सार्वजनिक व बाह्य ऋण के विशालकाय दलदल में गले तक धंसा हुआ है। एक ऐसा राष्ट्र जिसकी आधी से अधिक केंद्रीय आय केवल पुराने कर्ज़ों का ब्याज चुकाने में स्वाहा हो जाती है, जहाँ नए क़र्ज़ इसलिए लिए जाते हैं ताकि पुराने क़र्ज़ की किश्त डिफॉल्ट होने से बचाई जा सके, वह अब दुनिया के तीन दर्जन मुल्कों को ‘वित्तीय संयम’ और ‘ऋण प्रबंधन’ का ककहरा पढ़ाएगा।
यह परिदृश्य किसी नाटक के उस प्रहसन जैसा है जहाँ गांव का सबसे बड़ा बकाएदार चौपाल पर बैठकर किसानों को बचत के फायदे समझा रहा हो। विश्व बिरादरी के लिए यह एक त्रासदी हो सकती है, मगर इस्लामाबाद के कूटनीतिक गलियारों में इसे निश्चित ही एक ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’ मानकर जश्न मनाया जा रहा होगा।
“भिखारियों की कोई पसंद नहीं होती”: एक दार्शनिक उद्घोष का यथार्थ
कुछ वर्ष पूर्व अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पन्नों पर एक ऐसा वाक्य दर्ज हुआ जिसने मुफ़लिसी को एक नया दार्शनिक आधार दे दिया था। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक अंतरराष्ट्रीय दौरे के दौरान बड़ी बेबाकी और मासूमियत के साथ वैश्विक कैमरे के सामने फरमाया था “Beggars can’t be choosers” यानी “भिखारियों की अपनी कोई पसंद नहीं होती।”
आमतौर पर राष्ट्राध्यक्ष अपनी संप्रभुता, अपनी राष्ट्रीय गरिमा और स्वाभिमान का लबादा ओढ़कर दूसरे देशों से बात करते हैं। भले ही भीतर से खजाना खाली हो, बाहर एक कूटनीतिक मुस्कान और बराबरी का भाव प्रदर्शित किया जाता है। मगर पाकिस्तान के नेतृत्व ने कूटनीति के तमाम थोथे पाखंडों को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। उन्होंने दुनिया को बताया कि जब आप मांगने की पराकाष्ठा पर पहुंच जाएं, तो आत्मसम्मान बोझ बन जाता है।
यह कोई साधारण बयान नहीं था; यह एक नई भू-राजनीतिक कार्यप्रणाली का घोषणापत्र था। पाकिस्तान ने विश्व मंच पर खुद को केवल एक आर्थिक रूप से विपन्न देश के रूप में नहीं, बल्कि एक औपचारिक, संस्थागत और आत्म-स्वीकृत ‘याचक’ के रूप में स्थापित किया। जब एक प्रधानमंत्री स्वयं अपने देश की हैसियत को ‘भिखारी’ के पायदान पर रखकर समझौते की मेज पर बैठता है, तो वह वास्तव में यह संदेश दे रहा होता है कि “शर्तें आप तय कीजिए, बस झोली में कुछ डाल दीजिए।”
अब जब वही राष्ट्र कर्ज़दार देशों के मंच की अध्यक्षता करेगा, तो बाकी तीन दर्जन देशों को सबसे पहला व्यावहारिक सबक यही मिलेगा: स्वाभिमान को ताक पर कैसे रखा जाए। जब कर्ज़दाता शर्तें थोपे, तो बहस करने के बजाय सिर झुकाकर ‘आमीन’ कैसे कहा जाए।
कर्ज़ का बेजोड़ साम्राज्य: तीन सौ अरब डॉलर की तपस्या
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह मुकाम रातों-रात हासिल नहीं किया है। इसके पीछे दशकों की अथक ‘मेहनत’, लगातार की गई फिजूलखर्ची, सैन्य बजट की अंधी भूख और उत्पादन शून्य अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक योगदान रहा है। लगभग तीन सौ अरब डॉलर के विशालकाय ऋण का शिखर छूना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए एक खास तरह की बेपरवाही, आर्थिक विवेकहीनता और भविष्य की पीढ़ियों को गिरवी रखने का अदम्य साहस चाहिए।
पाकिस्तान के आर्थिक इतिहास का पन्ना-पन्ना इस बात की गवाही देता है:
- आईएमएफ का स्थायी ग्राहक: पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दरवाजे पर इतनी बार जा चुका है कि अब शायद वाशिंगटन स्थित मुख्यालय में उसके नाम की एक स्थायी नेमप्लेट लगा दी जानी चाहिए। दो दर्जन से अधिक बेलआउट पैकेज लेने के बाद भी उसकी प्यास नहीं बुझी। हर बार नए सुधारों का वादा, हर बार टैक्स सुधारों की कसमें, और हर बार पैकेज की अंतिम किश्त मिलते ही पुराने ढर्रे पर वापसी।
- मित्र देशों की थकावट: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और चीन जैसे तथाकथित ‘सदाबहार’ दोस्त भी अब पाकिस्तान के वित्त मंत्रियों का फोन उठाने से पहले दस बार सोचते हैं। रोल-ओवर की संस्कृति यानी कर्ज़ चुकाने की तारीख आने पर हाथ जोड़कर कहना कि “तारीख आगे बढ़ा दीजिए” को पाकिस्तान ने एक कला के स्तर तक पहुंचाया है।
- आंतरिक और बाह्य का घालमेल: देश का विदेशी मुद्रा भंडार कई बार गिरकर बमुश्किल दो-तीन हफ्तों के आयात के बराबर रह जाता है, मगर सत्ता प्रतिष्ठान के ठाठ-बाट में कभी कोई कमी नहीं आती। जनता बिजली-गैस के बिलों और आटे की थैलियों के लिए सड़कों पर कतारों में खड़ी रहती है, जबकि सत्ता के गलियारों में नए ऋण की प्राप्ति को ‘ऐतिहासिक विजय’ बताकर मिठाइयां बांटी जाती हैं।
इस असाधारण ‘उपलब्धि’ के बाद, यदि दुनिया के कर्जदार देश पाकिस्तान को अपना नेता न चुनते, तो भला किसे चुनते? अनुभव की ऐसी समृद्ध विरासत किसी और के पास कहाँ थी?
‘कर्ज़ लो और लौटाओ मत‘: अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का संभावित पाठ्यक्रम
अब जब पाकिस्तान को इस मंच की कमान मिल ही गई है, तो यह कल्पना करना कतई अप्रासंगिक नहीं होगा कि इस नए मंच के तहत आयोजित होने वाले सेमिनारों और कार्यशालाओं में क्या पढ़ाया जाएगा। पाकिस्तान के पास दुनिया को देने के लिए तकनीकी ज्ञान, वैज्ञानिक शोध या उत्पादन मॉडल तो हैं नहीं, अतः वह अपने सबसे मजबूत पक्ष यानी ‘ऋण-प्रबंधन की तिकड़मों’ का ही ज्ञान बांटेगा।
इस काल्पनिक मगर बेहद यथार्थवादी पाठ्यक्रम की रूपरेखा कुछ इस प्रकार हो सकती है:
- भावनात्मक ब्लैकमेलिंग और भू-राजनीतिक भय का विपणन
पाकिस्तान अपने साथी कर्ज़दार देशों को सिखा सकता है कि कैसे अपनी रणनीतिक स्थिति का इस्तेमाल करके कर्ज़दाताओं को डराया जाए। पाकिस्तान का दशकों पुराना अचूक फॉर्मूला रहा है “हमें कर्ज़ दो, वरना हम तबाह हो जाएंगे; और अगर हम तबाह हुए तो हमारी तबाही का धुआं तुम्हारे ड्राइंग रूम तक पहुंचेगा।”
परमाणु शक्ति संपन्न होने की आड़ में आर्थिक रियायतें वसूलना, दुनिया को यह जताना कि यदि हमारी अर्थव्यवस्था गिरी तो अराजकता फैल जाएगी यह वह पैंतरा है जिसमें पाकिस्तान सिद्धहस्त है। अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी छोटे कर्ज़दार देशों को यह गुर सिखाया जाएगा कि अपनी कमजोरी को ही सबसे बड़ा हथियार कैसे बनाया जाए।
- ‘रोल-ओवर‘ की कूटनीति: कर्ज़ वापसी की कला का विलोपन
सामान्य आर्थिक नियम कहते हैं कि कर्ज़ लिया है तो मूलधन और ब्याज के साथ लौटाना होगा। मगर पाकिस्तानी मॉडल सिखाता है कि कर्ज़ लौटाने के लिए नहीं, केवल घुमाने (Roll-over) के लिए होता है। जब वापसी की तारीख करीब आए, तो प्रधानमंत्री या सेना प्रमुख को एक विशेष विमान में बैठाकर ऋणदाता के दरबार में भेज दीजिए। वहां जाकर धार्मिक भाईचारे, ऐतिहासिक दोस्ती या वैश्विक स्थिरता की दुहाई दीजिए और किश्त को अगले दो साल के लिए टलवा लीजिए। यह कला दुनिया के किसी बिजनेस स्कूल में नहीं सिखाई जाती।
- नए कर्ज़ से पुराना कर्ज़ चुकाना: ‘पोंजी कूटनीति‘
अध्यक्ष महोदय अपने साथी देशों को समझाएंगे कि जब चीन का कर्ज़ चुकाना हो, तो आईएमएफ की चौखट पर नाक रगड़ो। जब आईएमएफ की किश्त देनी हो, तो खाड़ी देशों से ‘डिपॉजिट’ के रूप में डॉलर अपने केंद्रीय बैंक में रखवा लो ताकि कागजों पर विदेशी मुद्रा भंडार दुरुस्त दिखे। इस प्रकार एक हाथ से लेकर दूसरे हाथ को देना और बीच में अपनी सत्ता की गाड़ी को बिना किसी ठोस उत्पादन के खींचते रहना ही असली ‘वित्तीय प्रतिभा’ है।
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का पाखंड और बेबसी
इस पूरे तमाशे में केवल पाकिस्तान ही हास्य का पात्र नहीं है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भी कटघरे में खड़ी है जो ऐसे विरोधाभासों को जन्म देती है। संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियां वर्षों से सम्मेलनों, कार्यशालाओं और भारी-भरकम रिपोर्टों के निर्माण में व्यस्त हैं, जिनका धरातल से कोई लेना-देना नहीं होता।
एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं विकासशील देशों पर ऐसी कठोर शर्तें थोपती हैं जिससे आम जनता की कमर टूट जाती है सब्सिडी खत्म करना, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजट में कटौती करना, और बुनियादी वस्तुओं के दाम बढ़ाना। दूसरी तरफ, जब इन नीतियों के चलते दर्जनों देश ऋण के जाल में फंस जाते हैं, तो समाधान खोजने के लिए एक ऐसे देश को मंच सौंप दिया जाता है जो स्वयं वित्तीय कुप्रबंधन का जीता-जागता स्मारक है।
यह उस वैश्विक पाखंड का प्रमाण है जहाँ समस्याओं के वास्तविक समाधान खोजने के बजाय केवल प्रतीकात्मक औपचारिकताएं निभाई जाती हैं। जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व का आधार दक्षता, वित्तीय अनुशासन और ईमानदारी के बजाय केवल लाचारी का साझा विलाप बन जाए, तो परिणाम वही होते हैं जो आज हम देख रहे हैं। कर्ज़दार देशों का यह संघ समाधान की तलाश में नहीं निकला है, बल्कि यह उन मुल्कों का एक ऐसा समूह बन गया है जो सामूहिक रूप से अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए एक अनुभवी विलापकर्ता की तलाश में था।
उपसंहार: अंधे के हाथ बटेर और भविष्य की धुंध
इतिहास में कई त्रासदियां हुई हैं, मगर जब त्रासदी अपने ऊपर व्यंग्य का चोला ओढ़ ले, तो वह एक अंतहीन प्रहसन बन जाती है। करीब तीन दर्जन देशों द्वारा पाकिस्तान को कर्ज़दार देशों के मंच का अध्यक्ष चुनना वर्तमान वैश्विक परिवेश की उस कड़वी सच्चाई का आईना है, जहाँ योग्यता बेमानी हो चुकी है और विपन्नता को ही विशेषज्ञता का दर्जा दिया जाने लगा है।
पाकिस्तान को शायद इस बात का गुमान हो कि उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नया झंडा गाड़ दिया है। मगर सच्चाई यह है कि यह झंडा किसी विजय का नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण का है। जिस मुल्क ने अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखकर, अपनी संप्रभुता को विदेशी ताकतों और वित्तीय संस्थानों के पास गिरवी रखकर तीन सौ अरब डॉलर का कर्ज़ बटोरा हो, वह यदि आज कर्ज़दारों का सरदार बना बैठा है, तो यह गौरव का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय लज्जा का चरम बिंदु है।
भिखारी की कोई पसंद नहीं होती यह वाक्य केवल एक राजनेता की जुबान से फिसला हुआ सच नहीं था, बल्कि यह उस मुल्क की समूची व्यवस्था का एक्सरे था। आज जब वह ‘अध्यक्ष’ बनकर दुनिया के मंच पर बैठेगा, तो उसके हाथ में कोई आर्थिक रोडमैप नहीं होगा, बल्कि वही पुराना, परखा हुआ और धूल-धूसरित भिक्षापात्र होगा।
अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इस तमाशे को देखकर मुस्कुरा सकती है, साथी कर्ज़दार देश कुछ समय के लिए सहानुभूति की छांव पा सकते हैं, मगर इतिहास के पन्नों पर यह दर्ज रहेगा कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में एक ऐसा दौर भी आया था जब कर्ज़ के दलदल से निकलने का रास्ता उस मुसाफिर से पूछा गया था, जो खुद अपनी मर्जी से उस दलदल की सबसे निचली तह में घर बनाकर बैठा था।
