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Donald Trump न नोबेल, न जनादेश

अहंकार के तिलिस्म की बेदखली

जिसको सारी दुनिया भगवान अल्लाह ईश्वर सर्व शक्तिमान कहती है वह इंसान को उसके की  कुछ ना कुछ सजा दुनिया को दिखाकर देता है, क्योकि उसके मानने वालों का विश्वास है कि वह जब देता है देता तो छप्पर फाड़कर देता है। और जब छीनता है तो पाताल से भी निकाल लेता है। यही हमारे सामने आजके हमारे राजनेताओं का हाल है, जिसतरह ये लोग एक के बाद एक सारी दुनिया के सामने अपने घटिया कर्मों के चलते आरहे हैं उसे देखकर ये पक्का हो गया कि सर्वशक्तिमान ने इन्हें राजशाही के तख्त पर बिठाकर भी इनको जूतों का स्वाद भरपेट दिया जा रहा है ये लोग कहने को सत्ता में हैं लेकिन इनका मानसम्मान पूरी तरह कूड़े के ढेर में दब चुका है।

कोई निर्वाचित शासक एक संप्रभु गणराज्य को अपनी निजी जागीर और जनता को असहाय किराएदार समझने लगता है, तो लोकतंत्र सौदेबाज़ी नहीं करता। वह सीधे बेदखली का फरमान थमाता है।

हालिया चुनावी नतीजों ने ट्रंपवाद के सुनहरे मुखौटे पर किसी भारी हथौड़े की तरह वार किया है। वर्षों तक यह तमाशा बेरोकटोक चला संवैधानिक मर्यादाओं की खिल्ली उड़ाई गई, नफ़रत को सियासी ईंधन बनाया गया, और आधी रात के सोशल मीडिया प्रलाप से हकीकत को झुठलाने की कोशिशें की गईं। आज, मतपेटियों से निकली तीखी फटकार के बाद, बेलगाम मनमानियों का यह पूरा दौर अपने ही बुने जाल में उलझकर अंतिम सांसें गिन रहा है।

सच्चाई यह है कि अब इस तमाशे के लिए टिकट खरीदने वाला कोई नहीं बचा।

मुगालते की ढहती मीनारें

एक ऐसे राजनेता के लिए, जिसकी नज़रों में दुनिया केवल दो ही खेमों में बंटी थी या तो जी-हुजूरी करने वाले दरबारी या फिर ‘फ़ेक न्यूज़’ यह जनादेश किसी गहरे सदमे से कम नहीं है। शेखी बघारने और खुद को पीड़ित बताने का जो नुस्खा कभी सियासी जादूगरी माना जाता था, वह अब घिसे-पिटे मज़ाक में तब्दील हो चुका है। भीड़ छंट रही है और तालियों की गूंज शांत हो चुकी है।

घरेलू मोर्चे पर मिली यह पराजय दरअसल उस आहत अहंकार की अंतिम कड़ी है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहले ही मौन तिरस्कार मिल चुका था।

ट्रंप युग का सबसे त्रासद-हास्यास्पद पहलू नोबेल शांति पुरस्कार हथियाने की वह बेचैन, बाज़ारू चाहत थी। इतिहास ने कई विडंबनाएं देखी हैं, लेकिन किसी आग लगाने वाले को ही फायर ब्रिगेड से पदक मांगते देखना व्यंग्य की सारी सीमाओं को लांघ जाता है। फ्लोरिडा के मार-ए-लागो वाले दरबार में कूटनीति महज़ एक सौदा थी, और नोबेल पदक को सोने का पानी चढ़े अहंकार पर सजने वाला एक तमगा भर समझा गया।

त्रासदी यह कभी नहीं थी कि ओस्लो की जूरी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया; असली त्रासदी यह थी कि कोई इस मुगालते के साथ उस पदक की मांग करने की धृष्टता भी कर सकता था।

पिंजरे, प्रतिबंध और फरेब की कूटनीति

शांतिदूतों की कतार में ट्रंप के दावे को गंभीरता से लेने के लिए इतिहास और विवेक, दोनों को भुला देना पड़ेगा:

 

  • फ़ोटो-ऑप वाली कूटनीति: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को महज़ एक रियल्टी शो बना दिया गया। तानाशाहों से हाथ मिलाना और हड़बड़ी में किए गए समझौतों को ‘ऐतिहासिक’ बताकर खूब तालियां बटोरी गईं, लेकिन कैमरों की लाइट बंद होते ही वे शून्य साबित हुए। शांति धैर्य और भरोसे से बनती है उन हथकंडों से नहीं जो केवल दूसरों को झुकाने के लिए रचे गए हों।

  • क्रूरता का क्रूर हिसाब: असली शांति सत्ता की हनक में नहीं, मानवीय गरिमा में झलकती है। ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ के नाम पर रोते-बिलखते मासूम बच्चों को उनकी माताओं की गोद से छीना गया। कंटीले तारों के बाड़ों में, कंक्रीट के फर्श पर फॉयल शीट ओढ़े सिसकते उन बच्चों की आहें अभी भी गूंज रही हैं। जब सरहद पर मासूम पिंजरों में कांप रहे थे, तब उनके सिपहसालार ओस्लो में शांति पदक के लिए लॉबिंग कर रहे थे।

  • वैश्विक व्यवस्था पर वार: दशकों की मेहनत से बनी संधियों को महज़ इसलिए फाड़ दिया गया क्योंकि उन पर किसी विरोधी के हस्ताक्षर थे। चुनिंदा मुल्कों पर मनमाने प्रतिबंध लगाकर परिवारों को तोड़ा गया और पर्यावरण समझौतों को लात मारकर विस्थापितों की चीख को अनसुना कर दिया गया।

इसे ‘शांति का प्रयास’ कहना शब्दों और संवेदनाओं दोनों की हत्या करने जैसा है।

आर्थिक बर्बादी और संगति का सच

खुद को ‘टैरिफ मैन’ कहने का गुरूर भी बुनियादी अर्थशास्त्र के सामने भरभरा गया। ‘ट्रेड वॉर आसान है’ के नारों तले सहयोगियों और विरोधियों, दोनों पर बिना सोचे-समझे शुल्क थोपे गए। नतीजा क्या निकला? चरमराती आपूर्ति शृंखलाएं, पलटवार करते वैश्विक बाज़ार और दिवालिया होने से बचने के लिए सरकारी मदद पर निर्भर होते अमेरिकी किसान। यह कोई रणनीति नहीं, बल्कि आर्थिक ज़ोर-ज़बरदस्ती थी, जिसका भारी हर्जाना अंततः आम कामगारों को ही चुकाना पड़ा।

विफल नीतियों से इतर, बुनियादी चरित्र का खोखलापन भी किसी से छिपा नहीं रहा। वैश्विक मंचों पर राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए न्यूनतम नैतिक मर्यादा आवश्यक होती है, लेकिन जेफरी एपस्टीन जैसे विवादित हलकों से जुड़े साए कभी पीछा नहीं छोड़ते। सालों की रिकॉर्ड की गई डींगें, महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया और संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले रसूखदारों की सार्वजनिक सराहना को कोई पीआर एजेंसी धो नहीं सकती। पैसा और महंगे वकील कानूनी नतीजों को टाल सकते हैं, लेकिन इतिहास का पन्ना कभी मैला नहीं होता।

और पर्दा गिरता है

नोबेल शांति पुरस्कार भले ही विवादों से परे न रहा हो, लेकिन उसकी गरिमा मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और मलाला यूसुफजई जैसे उन व्यक्तित्वों से बंधी है जिन्होंने इंसानियत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। उस गौरवमयी विरासत के साथ उस शख्स का नाम जोड़ना भी त्याग का अपमान है, जिसने नस्लवादियों को सहूलियत दी, लोकतांत्रिक जनादेश को कुचलने का प्रयास किया और खुद अपनी ही संसद पर उन्मादी भीड़ को चढ़ने के लिए उकसाया।

नोबेल न मिलने के मलाल ने उनके भारी-भरकम अहंकार को पहले ही चोट पहुंचाई थी; और अब, खुद को अजेय समझने वाले इस स्वयंभू विजेता को मतदाताओं ने मतपत्रों के जरिए सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है।

अपराजेय ‘बाहुबली’ का तिलिस्म अब टूट चुका है। शोर थमने के बाद लोकतंत्र का यह सीधा संदेश आज भी उतना ही अटल है: देश किसी एक व्यक्ति की बपौती नहीं होता, सोने से मढ़े नामपट्ट हमेशा टिके नहीं रहते, और जब जनता पन्ना पलटने का फैसला कर लेती है, तो दुनिया के सबसे बड़े तमाशबीन को भी चुपचाप मंच से उतरना ही पड़ता है।

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