सड़क के किनारे किसी पुरानी इमारत के गेट पर जब ‘वृद्धाश्रम’ की तख्ती लटकती दिखती है, तो वह केवल एक इमारत का नाम नहीं होता; वह उस समाज के नैतिक पतन का जीवित दस्तावेज होता है जो खुद को आधुनिक, पढ़ा-लिखा और सभ्य कहने का ढोंग करता है। वृद्धाश्रम इंसानियत पर एक ऐसा अभिशाप है, जो हर पल यह सवाल पूछता है कि क्या हम सच में इंसान कहलाने के लायक बचे हैं?
मनुष्य को प्रकृति ने एक सामाजिक प्राणी बनाया है। समाज की नींव ही इस बात पर टिकी है कि कमजोर को सहारा दिया जाए, प्रेम का लेन-देन हो और रिश्तों में एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का भाव हो। पशु भी अपने बच्चों को बड़ा करते हैं और उड़ना सिखाते हैं, लेकिन इंसान को ईश्वर ने विवेक, संवेदना और याददाश्त दी है ताकि वह अपने अतीत के उपकारों को कभी न भूले। जब कोई इंसान अपने ही बूढ़े माता-पिता को घर से बेदखल कर देता है, तो वह न केवल अपने सामाजिक प्राणी होने के दर्जे को खो देता है, बल्कि पशुता से भी नीचे गिर जाता है।
माता-पिता, जीवन की नींव और ईश्वर का साकार रूप
माता-पिता अपनी संतान के लिए धरती पर साक्षात वरदान होते हैं। उनके त्याग, तपस्या और प्रेम की तुलना दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं की जा सकती। एक बच्चे के जन्म से लेकर उसके पैरों पर खड़े होने तक, माता-पिता अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय, अपनी खुशियां, अपनी नींद और अपने सारे सपने उसी पर न्योछावर कर देते हैं।
-
मां की मूक साधना: वह मां ही होती है जो नौ महीने असहनीय पीड़ा सहकर एक नई जान को दुनिया में लाती है। खुद गीले में सोती है और बच्चे को सूखे में सुलाती है। बच्चे की एक हल्की सी छींक भी मां की रातों की नींद उड़ा देती है।
-
पिता का अनदेखा संघर्ष: पिता वह वटवृक्ष होता है जो धूप, बारिश और जीवन के हर झंझावात को खुद पर झेलकर अपनी संतान को ठंडी छांव देता है। फटे जूते पहनकर, अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर वह बच्चों की महंगी फीस भरता है, ताकि कल उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके।
माता-पिता कभी अपनी संतान से किसी मुनाफे की उम्मीद नहीं करते। वे बैंक नहीं हैं जो ब्याज मांगें; वे तो प्रेम का वह दरिया हैं जो बस बहना जानता है। अपनी पूरी जवानी, अपनी सारी जमा-पूंजी और अपनी ऊर्जा को निचोड़कर जब वे अपनी संतान को एक सफल इंसान बना देते हैं, तब बदले में वे केवल एक चीज चाहते हैं थोड़ा सा सम्मान, दो बोल प्यार के और बुढ़ापे में एक कोना।
आधुनिकता का मुखौटा और घटिया मानसिकता का नंगा नाच
आज के दौर में एक बेहद घिनौना चलन चल पड़ा है माता-पिता को घर से बेदखल करने को ‘आधुनिकता’, ‘प्राइवेसी’ और ‘न्यूक्लियर फैमिली’ का फैंसी नाम दे दिया जाता है। यह आधुनिकता नहीं, बल्कि घटिया, स्वार्थी और असंवेदनशील प्रवृत्ति की पराकाष्ठा है।
जिस बेटे को पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वही बेटा जब बड़ा होकर सूट-बूट पहनता है और अंग्रेजी के चार शब्द सीख जाता है, तो उसे अपने ही माता-पिता अनपढ़, पिछड़े और अपनी ‘हाई-क्लास लाइफस्टाइल’ में रुकावट लगने लगते हैं।
-
घर में कुत्ते-बिल्लियों के लिए अलग कमरा और बजट हो सकता है, लेकिन जिस पिता ने वह मकान अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया, उसके लिए उसी घर में चार गज जमीन भारी पड़ने लगती है।
-
बहु और बेटे को अपनी ‘आजादी’ में बुजुर्गों की खांसने की आवाज भी खलल लगने लगती है।
-
आधुनिकता के नाम पर चलने वाली पार्टियों में बूढ़े माता-पिता को पीछे के कमरों में छिपा दिया जाता है ताकि समाज में उनकी ‘शान’ कम न हो।
यह कैसी तरक्की है जो इंसान को अपनी ही जड़ों को काटना सिखाती है? यह कैसी पढ़ाई है जो इंसान को यह नहीं सिखा पाती कि जिसने तुम्हें बोलना सिखाया, उनके सामने अपनी जुबान की कड़वाहट को कैसे काबू में रखा जाए?
वृद्धाश्रम: इंसानियत को शर्मसार करने वाली दीवारें
माता-पिता को वृद्धाश्रम में धकेलना पूरी इंसानियत को शर्मसार करना है। वृद्धाश्रम किसी भी सभ्यता के लिए एक काला कलंक हैं। ये इमारतें चीख-चीख कर कहती हैं कि इस देश और समाज में खून के रिश्ते कितने सस्ते हो चुके हैं।
वृद्धाश्रम के कमरों में पसरा सन्नाटा किसी सामान्य घर का सन्नाटा नहीं होता; वह टूटे हुए दिलों और छले गए विश्वास का भारीपन होता है। वहां बैठे किसी बुजुर्ग की आंखों में झांककर देखिए, आपको आंसुओं के समंदर में तैरती हुई बेबसी नजर आएगी। वे दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए इस उम्मीद में बैठे रहते हैं कि शायद आज उनका बेटा आएगा, शायद इस दीवाली पर उनकी बेटी उनसे मिलने आएगी।
वे बूढ़े हाथ, जिन्होंने कभी अपने लाडले के गालों को चूमा था, आज एक गिलास पानी के लिए किसी अनजान तीमारदार के मोहताज हैं। सबसे बड़ा दर्द यह नहीं होता कि हड्डियां कमजोर हो गई हैं या नजर धुंधली पड़ गई है; सबसे असहनीय दर्द यह होता है कि जिस संतान को उन्होंने दुनिया की हर बुरी नजर से बचाया, उसी ने उन्हें दूध की मक्खी की तरह अपनी जिंदगी से निकालकर फेंक दिया।
खोखले तर्कों का पर्दाफाश
माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने वाली संतानें अक्सर समाज में अपनी छवि बचाने के लिए कई तरह के खोखले बहाने बनाती हैं:
|
संतानों के आम बहाने |
छुपी हुई असली और कड़वी सच्चाई |
|
“हमारे पास समय की बहुत कमी है, दोनों नौकरी करते हैं।” |
माता-पिता ने तब भी समय निकाला था जब वे 12 घंटे मजदूरी या नौकरी करके आते थे। |
|
“वृद्धाश्रम में उनकी उम्र के साथी मिलते हैं, वे वहां ज्यादा खुश रहेंगे।” |
यह अपनी जिम्मेदारी से भागने और गिल्ट को मिटाने का सबसे क्रूर बहाना है। |
|
“घर में सास-बहू या पिता-पुत्र के विचार नहीं मिलते, रोज क्लेश होता है।” |
समायोजन केवल माता-पिता ही क्यों करें? क्या बच्चे रिश्तों को निभाना नहीं सीख सकते? |
|
“वहां मेडिकल सुविधाएं 24 घंटे उपलब्ध रहती हैं।” |
बुजुर्गों को महंगी दवाइयों से ज्यादा अपनों के स्पर्श और अपनत्व की जरूरत होती है। |
सामाजिक बहिष्कार की आवश्यकता
जो संतान अपने जन्मदाताओं को, अपने अन्नदाताओं को बुढ़ापे की लाचारी में बेसहारा छोड़ दे, क्या उसे इस सभ्य मानव समाज में रहने का कोई नैतिक अधिकार है?
बिल्कुल नहीं। ऐसी औलाद जो अपने माता-पिता का सहारा नहीं बन सकती, उसे इंसानी समाज में रहने का कोई हक नहीं होना चाहिए। इंसान जब समाज में रहता है, तो वह उसके नियमों और संवेदनाओं से बंधा होता है। अगर कोई व्यक्ति सबसे बुनियादी कर्तव्य कृतज्ञता को ही भूल जाए, तो वह समाज के लिए केवल एक बोझ और विषैला तत्व है।
-
ऐसे लोगों को समाज में मान-सम्मान देना बंद करना होगा।
-
जो व्यक्ति अपने घर के बुजुर्गों का आदर नहीं कर सकता, वह दफ्तर में, राजनीति में या समाज में कभी ईमानदार और वफादार नहीं हो सकता।
-
सामाजिक स्तर पर ऐसी संतानों का नैतिक बहिष्कार होना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश जाए कि मां-बाप का तिरस्कार करके कोई भी व्यक्ति समाज में सिर उठाकर नहीं जी सकता।
प्रकृति और समय का अटल नियम: ‘जैसी करनी, वैसी भरनी’
जो संतानें आज अपने माता-पिता के साथ यह क्रूर खेल खेल रही हैं, उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि समय का पहिया हमेशा घूमता है। आज वे जो बीज बो रहे हैं, कल वही फसल उनके अपने बच्चे काटेंगे।
घर में पल रहे मासूम बच्चे अपने माता-पिता के भाषणों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार से सीखते हैं। जब एक छोटा बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता दादा-दादी के साथ कैसा दुर्व्यवहार कर रहे हैं, उन्हें कैसे अपमानित करके अलग कर रहे हैं, तो उसके अवचेतन मन में यह बात बैठ जाती है कि बूढ़े होने पर लोगों को इसी तरह बाहर निकाल दिया जाता है।
वृद्धाश्रम भेजने वाले बेटे यह याद रखें कल तुम्हारा भी बुढ़ापा आएगा। तुम्हारी हड्डियां भी कांपेंगी, तुम्हारी आवाज भी लड़खड़ाएगी। और तब तुम्हारे बच्चे तुम्हें वृद्धाश्रम छोड़ने के लिए किसी दूसरे शहर का रास्ता नहीं देखेंगे; वे उसी रास्ते पर चलेंगे जो तुमने उन्हें दिखाया था। प्रकृति का न्याय बहुत सटीक होता है, वहां किसी की पैरवी नहीं चलती।
चेतना की पुकार और आत्मचिंतन
यह समय केवल गुस्सा जाहिर करने का नहीं, बल्कि हर परिवार के स्तर पर गहराई से आत्मचिंतन करने का है। हमें अपनी आने वाली नस्लों को केवल डॉक्टर, इंजीनियर, अफसर या बड़ा व्यापारी नहीं बनाना है; सबसे पहले उन्हें एक संवेदनशील इंसान बनाना है।
शिक्षा के पाठ्यक्रमों में नैतिक मूल्यों, बुजुर्गों के प्रति आदर और पारिवारिक जिम्मेदारियों को प्रमुखता से शामिल करना अनिवार्य होना चाहिए। बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि घर का सबसे बड़ा गहना वहां रहने वाले बुजुर्ग होते हैं। उनके पास जिंदगी का वह तजुर्बा होता है जो किसी यूनिवर्सिटी की किताब में नहीं मिलता।
घर के मंदिर में अगर भगवान की सोने की मूरत भी रखी हो, लेकिन उसी घर के किसी कोने में या वृद्धाश्रम में माता-पिता रो रहे हों, तो वह पूजा, वह तीर्थ और वह सारा धर्म-कर्म केवल पाखंड है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि माता-पिता के चरणों में ही चारों धाम हैं। जिसने अपने माता-पिता की सेवा कर ली, उसे दुनिया के किसी मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में माथा टेकने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
माता-पिता कोई गैर-जरूरी सामान नहीं हैं जिन्हें जरूरत खत्म होने पर कबाड़ की तरह घर से बाहर कर दिया जाए। वे तो उस विशाल पेड़ की जड़ें हैं, जिनके दम पर पूरा परिवार फलता-फूलता है। अगर जड़ों को ही काट दोगे, तो तुम्हारी अपनी टहनियां और पत्ते भी ज्यादा दिन तक हरे-भरे नहीं रह पाएंगे; वे भी सूखकर बिखर जाएंगे।
आज वक्त है कि हम सब अपने गिरेबान में झांकें। यदि हमारे आसपास कोई भी बुजुर्ग उपेक्षित है, तो आगे बढ़कर उनकी लाठी बनें। अपने घरों से स्वार्थ की इस घटिया दीवार को गिराएं, अपने माता-पिता के पास बैठें, उनके कंधों पर हाथ रखें और उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि जब तक हमारी सांसें चल रही हैं, आपको कभी किसी वृद्धाश्रम की चौखट नहीं देखनी पड़ेगी। इसी संकल्प से समाज से यह कलंक मिटेगा और इंसानियत सच में जीवित रह पाएगी।