पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और बर्बाद होते सितारों की दास्तान
एक प्रतिभाशाली टीम का लगातार गर्त में जाना बहुत बुरा लगाता है वह भी ऐसी टीम का जिसको कहा जाता था कि ये कभी भी खेल को पलटने क्षमता रखती है ?
खेल का मैदान मानवीय जज्बे, नैसर्गिक प्रतिभा और कलात्मक पराकाष्ठा का प्रतीक होता है। विश्व क्रिकेट में जब भी असाधारण हुनर, तेज रफ्तार और जादुई स्विंग की बात चलती है, तो पाकिस्तान के क्रिकेटरों की छवि स्वतः उभरती है। गली-मोहल्लों की धूल से निकलकर दुनिया भर के बल्लेबाजों के होश उड़ाने वाले गेंदबाज और कलात्मक बल्लेबाज इस देश की पहचान रहे हैं। परंतु इस चमकीले इतिहास के पीछे एक स्याह सच्चाई छिपी है एक ऐसी व्यवस्था, जो खेल को संवारने के बजाय खिलाड़ियों के भविष्य को नेस्तनाबूद करने के लिए कुख्यात रही है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) की अंदरूनी राजनीति, भाई-भतीजावाद और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने इस मैदान को प्रतिभाओं के कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया है।
व्यवस्था की भेंट चढ़ता नैसर्गिक हुनर
पाकिस्तान की सरजमीं ने क्रिकेट को अद्वितीय सितारे दिए हैं, लेकिन इन खिलाड़ियों का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी कभी विपक्षी टीम नहीं, बल्कि उनका अपना ही सिस्टम रहा। चयन प्रक्रिया में योग्यता और वर्तमान फॉर्म के स्थान पर राजनीतिक पहुंच, व्यक्तिगत वफादारी और चाटुकारिता को प्राथमिकता दी जाती रही है। जिस किसी खिलाड़ी ने अपनी स्वाभिमान और खेल की निष्ठा से समझौता करने से इनकार किया, उसे हाशिए पर धकेल दिया गया। नतीजतन, दर्जनों असाधारण प्रतिभाएं अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी पूरी चमक बिखेरने से पहले ही गुमनामी के अंधेरे में दफन हो गईं।
नायकों की दुर्दशा और व्यवस्था का दोहरा चरित्र
इस प्रशासनिक और राजनीतिक त्रासदी के दो सबसे बड़े उदाहरण हैं:
- इमरान खान: 1992 विश्व कप विजेता कप्तान, जिन्होंने देश के क्रिकेट को पहचान और जुझारूपन दिया, आज राजनीतिक उथल-पुथल और प्रशासनिक विद्वेष के चलते सलाखों के पीछे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि यह व्यवस्था अपने सबसे बड़े राष्ट्रीय नायकों के योगदान को भी सत्ता स्वार्थ के आगे भुला देती है।
- मोहम्मद आमिर: असाधारण स्विंग के धनी आमिर ने अपनी शुरुआती गलतियों की सजा भुगतने के बाद जब धमाकेदार वापसी की, तब भी बोर्ड की गुटबाजी और मानसिक प्रताड़ना ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। व्यवस्था के इस घुटन भरे माहौल से तंग आकर उन्होंने अंततः देश छोड़कर इंग्लैंड की नागरिकता अपना ली, जो पीसीबी की विषाक्त कार्यशैली का खुला प्रमाण है।
संस्थागत दीमक और अनिश्चित भविष्य
पाकिस्तान क्रिकेट का ढांचा सत्ता के गलियारों से सीधे नियंत्रित होता है। देश में सत्ता बदलते ही बोर्ड का नेतृत्व बदल जाता है, नीतियों में अस्थिरता आती है और खिलाड़ियों की प्राथमिकताएं निजी पसंद-नापसंद पर तय होने लगती हैं। इस राजनीतिक दखल का सबसे घातक असर उभरती हुई युवा पीढ़ी पर पड़ता है, जिनका मनोबल बिना खेले ही टूट जाता है।
यह विडंबना स्पष्ट संदेश देती है कि जब तक किसी खेल संस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और योग्यता की जगह अहंकार और गुटबाजी का बोलबाला रहेगा, तब तक विश्वस्तरीय प्रतिभाएं इसी तरह दम तोड़ती रहेंगी। किसी भी राष्ट्र की खेल संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रशासनिक शुचिता और प्रतिभा का सम्मान अनिवार्य शर्त है।