#Nepal Floods, कहीं बढ़े मदद के लिए अनजान हाथ, कहीं इंसानियत का पड़ता अकाल
प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो वह राजा और रंक, अमीर और गरीब, पापी और पुण्यत्मा के बीच कोई भेद नहीं करती। नेपाल की धरती पर जब जल प्रलय ने दस्तक दी, तो उसने कुछ ही पन्नों में सदियों का इतिहास और भविष्य दोनों मिटा दिए। उफनती नदियां, जिनका पानी कभी कलकल बहकर खेतों को सींचता था, अचानक प्रलय बनकर बस्तियों को लीलने निकल पड़ीं। मकान ताश के पत्तों की तरह ढह गए और बह गए , पलक झपकते ही हंसते-खेलते परिवार पानी के भंवर में समा गए और चारों ओर चीख-पुकार, हाहाकार तथा अंतहीन खामोशी छा गई।
इस भीषण त्रासदी को देख पूरी दुनिया का कलेजा कांप उठा। मानवाधिकार, संवेदना और इंसानियत की परिभाषाएं एक बार फिर से इस बात पर टिकी थीं कि संकट की इस घड़ी में मानवता कैसे एकजुट होकर पीड़ितों के आंसू पोंछती है। दूर-दराज के देशों से राहत सामग्री, दवाइयां, कंबल और जीवन रक्षक दल नेपाल की ओर दौड़ पड़े। दुनिया के हर कोने से इंसानियत का वह चेहरा सामने आया, जो कहता है कि हम सब एक ही डोर से बंधे हैं।
लेकिन वहीं, इस महाप्रलय के बीच, नेपाल की कीचड़ और मलबे से एक वह वीभत्स और डरावना चेहरा भी लोगों ने देखा, जिसने इंसानियत की रूह को झकझोर कर रख दिया। वह चेहरा किसी आपदा का नहीं, बल्कि उन जीवित इंसानों का था, जिनके भीतर का मनुष्य मर चुका था और केवल एक ‘नर-पिशाच’ शेष रह गया था। जहां एक तरफ लोग अपनों की तलाश में बहते पानी के किनारे हाथ जोड़े खड़े थे, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी प्रजाति के लोग भी सक्रिय थे, जो इस प्रलय में अपने लिए ‘अवसर’ तलाश रहे थे।
पानी के तेज बहाव में एक महिला के बहते हुए शव से जिसकी जिंदगी अभी कुछ पल पहले ही छीनी गई थी, तो इन नर-पिशाचों की नजर उसके शरीर पर चमकते गहनों पर पड़ी। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि वह शव किसी की मां, बहन या बेटी का होगा। उन्होंने उस बहती लाश को खींचकर उसके शरीर से मंगलसूत्र, कान की बालियां और अंगूठियां नोंच लीं। इसी तरह, पानी में उतराती हुई अन्य लाशों की जेबों को टटोला गया, मानों वे कोई तिजोरी हों। मौत के उस तांडव के बीच भी लालच की यह हवस इतनी भयानक थी कि इंसानियत शर्म से पानी-पानी हो गई।
क्रूरता का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। बाढ़ की भीषणता के बीच जब एक बैंक की कैश वैन पानी के तेज बहाव में फंसकर पलट गई तो सहायता करने के बजाय वे लोग उस पर टूट पड़े जैसे भूखे भेड़िए किसी शिकार पर झपटते हैं। ताले तोड़े गए, उसका लॉकर तोड़कर नोटों के बंडल लूटे गए। एक तरफ लोग भूखे-प्यासे, एक बूंद पानी और एक टुकड़े रोटी के लिए तरस रहे थे, वहीं दूसरी तरफ यह अमानवीय प्रजाति मलबे और लाशों के बीच सोना चांदी बटोरने में लगी थी।
इस भयानक ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि संकट वास्तव में इंसान की परीक्षा लेता है। इस आपदा के बहाव ने उस चरित्र को छिपाया नहीं, बल्कि उसे बेनकाब कर दिया हैं। एक तरफ जहां करुणा के दीप जलते हैं, वहीं दूसरी तरफ अंधेरे में छिपे हुए वे गिद्ध भी बाहर आ जाते हैं जो केवल मांस और अवशेषों की तलाश में रहते हैं। नेपाल की यह जल प्रलय केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि यह इंसानी जमीर की सबसे बड़ी परीक्षा थी, जिसमें संवेदनाएं जीत गईं, लेकिन लालच हार गया। https://www.youtube.com/watch?v=Cg6BzHMk5ks
वर्तमान समय केवल नेपाल के पुनर्निर्माण का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को भी ध्यान में रखने का है जो आपदा को अवसर और मौत को व्यापार मानती है। जब तक समाज ऐसे नर-पिशाचों को बेनकाब नहीं करता और इंसानी मूल्यों की रक्षा के लिए मजबूत दीवार नहीं खड़ी करता, तब तक प्रकृति का हर कोप हमें यह याद दिलाता रहेगा कि सबसे बड़ा खतरा सिर्फ पानी का सैलाब नहीं, बल्कि इंसान के भीतर पलने वाली वह दरिंदगी है जो लाश देखकर मुस्कुरा सकती है।