भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक और पर्यावरणीय चुनौती
हिमालयी क्षेत्र में उमड़ते खतरे के बादल
नेपाल त्रासदी के बाद आने 24 घण्टे भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं क्योकि यह भीषण बवाल हमारे कई राज्यों से होता हुआ बंगाल की खाड़ी तक जाएगा इस आसमानी विपदा का सामना करने के लिए हमारे प्रशासन और एनडीआरएफ के लिए कड़ा इम्तिहान है।
दक्षिण एशिया का भूगोल और भू-राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ पारंपरिक सुरक्षा की परिभाषाएँ अब बदल चुकी हैं। अब सीमा सुरक्षा का अर्थ केवल तोपों और टैंकों की गर्जना तक सीमित नहीं है, बल्कि जल प्रबंधन, पारिस्थितिकी (ecology) और पर्यावरणीय बदलाव भी उतने ही बड़े खतरे बनकर उभर रहे हैं। हाल के वर्षों में नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में जिस प्रकार की जल संबंधी आपदाएँ और प्रलयकारी बाढ़ की स्थितियाँ देखने को मिली हैं, उन्होंने भारत के मैदानी राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर असम और पश्चिम बंगाल तक की नींद उड़ा दी है।
जब नेपाल की घाटियों में नदियाँ उफान पर होती हैं, तो उनका सीधा और विनाशकारी असर भारत के विशाल जनजीवन पर पड़ता है। इन प्राकृतिक आपदाओं की विभीषिका ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह केवल जलवायु परिवर्तन का सामान्य परिणाम है या इसके पीछे कोई गहरी भू-राजनीतिक साजिश छिपी है? क्या तिब्बत के पठार पर चीन द्वारा की जा रही भारी प्राकृतिक छेड़छाड़ इस जल प्रलय का मुख्य कारण है? इन सभी पहलुओं का गहराई से विश्लेषण करना आज भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है।
नेपाल की जल प्रलय और भारत पर मंडराता आसन्न खतरा
नेपाल एक ऐसा देश है जो अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण जल संसाधनों से परिपूर्ण है। हिमालय से निकलने वाली कोसी, गंडक, महाकाली, करनाली और तीस्ता जैसी प्रमुख नदियाँ नेपाल से बहकर भारत के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं। इन नदियों को भारत के उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों की जीवन रेखा कहा जाता है, किंतु जब यही नदियाँ उग्र रूप धारण करती हैं, तो ये जीवन रेखाएँ मृत्यु का पैगाम बन जाती हैं।
भारत का उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से बिहार हर साल बाढ़ और जलप्रलय का दंश झेलने के लिए विवश हैं। बिहार को ‘बिहार का शोक’ कही जाने वाली कोसी नदी और अन्य नदियाँ हर मानसून मेंाहक तबाही मचाती हैं। जब नेपाल में अत्यधिक वर्षा होती है या वहाँ कोई प्राकृतिक बांध/झील टूटती है, तो बिना किसी पूर्व चेतावनी के भारत की तरफ पानी छोड़ दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र जैसे महाराजगंज, लखीमपुर खीरी, बहराइच और सिद्धार्थनगर तथा बिहार के सुपौल, सहरसा, मधुबनी और दरंभगा जैसे जिले पानी में डूब जाते हैं। किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं, लाखों लोग बेघर हो जाते हैं और महामारी का खतरा मंडराने लगता है।
असम और पश्चिम बंगाल तक बढ़ता संकट
यह समस्या केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार पूर्वोत्तर के असम और पश्चिम बंगाल तक है। ब्रह्मपुत्र और तीस्ता बेसिन का भूगोल कुछ ऐसा है कि ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों (upper catchments) में होने वाली जरा सी भी हलचल निचले इलाकों में भारी बाढ़ का कारण बनती है। पश्चिम बंगाल का उत्तर बंगाल क्षेत्र (दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार) और असम की ब्रह्मपुत्र घाटी हर साल भीषण जलप्रलय का सामना करती है। नेपाल और भूटान से आने वाला जल प्रवाह जब गंगा और ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों से मिलता है, तो बंगाल और असम के विशाल भूभाग जलमग्न हो जाते हैं।
क्या यह केवल प्राकृतिक आपदा है या कोई सोचा-समझा वार?
जब किसी आपदा की पुनरावृत्ति बार-बार होने लगे और उसका पैटर्न असामान्य हो जाए, तो वह केवल प्राकृतिक घटना नहीं रह जाती। विश्लेषकों और रणनीतिकारों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत के खिलाफ जल को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या यह भारत को आर्थिक रूप से कमजोर और राजनीतिक रूप से अस्थिर करने का कोई सोचा-समझा वार है?
जल युद्ध (Water Warfare) की बदलती परिभाषाएँ
आधुनिक भू-राजनीति में ‘हाइड्रो-पॉलिटिक्स’ (जल राजनीति) एक अत्यंत प्रभावशाली और खतरनाक हथियार बन चुकी है। यदि कोई देश या ताकतवर राष्ट्र ऊपरी riparian (ऊपरी प्रवाह वाले क्षेत्र) पर नियंत्रण रखता है, तो वह निचले इलाकों के देशों की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तहस-नहस कर सकता है। भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध रहे हैं, किंतु हाल के वर्षों में नेपाल की राजनीति में बाहरी ताकतों, विशेषकर चीन का बढ़ता प्रभाव इस बात की ओर इशारा करता है कि नेपाल की भूमि का उपयोग भारत के विरुद्ध अप्रत्यक्ष रणनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
सूचनाओं का अभाव और कूटनीतिक विफलता
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बाढ़ या जलप्रलय से जुड़े वास्तविक समय (real-time) के hydrological data समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। नेपाल में ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में जलस्तर बढ़ने की सटीक जानकारी यदि भारत को समय पर मिल जाए, तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है। लेकिन जब इन सूचनाओं को छिपाया जाता है या तकनीकी सहयोग में बाधा डाली जाती है, तो संदेह और गहरा जाता है कि कहीं यह भारत के खिलाफ कोई सुनियोजित रणनीतिक उपेक्षा या प्रयोग तो नहीं है।
तिब्बत से लिया जल प्रवाह ने विकराल रूप: चीन की बढ़ती भूमिका
नेपाल और भारत में आने वाली अधिकांश प्रमुख नदियाँ सीधे तौर पर तिब्बत के पठार और हिमालयी श्रृंखलाओं से निकलती हैं। तिब्बत को “एशिया का वाटर टावर” (Water Tower of Asia) कहा जाता है, क्योंकि यहीं से ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो), मेकॉन्ग, साल्वीन, सतलुज और सिंधु जैसी विशाल नदियाँ निकलती हैं। इसके अलावा, नेपाल की कई नदियों के स्रोत भी तिब्बती सीमा के नजदीक हिमालयी ग्लेशियरों में हैं।
हाल के वर्षों में तिब्बत के भीतर जल प्रवाह ने अत्यंत विकराल और अप्रत्याशित रूप लिया है। गर्मियों में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और मानसूनी बादलों का फटना आम बात हो गई है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी मानवनिर्मित वजह भी है चीन की अंधाधुंध इंजीनियरिंग परियोजनाएँ।
तिब्बत में चीन की लगातार बढ़ती प्राकृतिक छेड़छाड़ का नतीजा
तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) पर चीन का पूर्ण नियंत्रण है और बीजिंग सरकार वहाँ अपनी सामरिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर खिलवाड़ कर रही है। तिब्बत में हो रही इन गतिविधियों का सीधा असर नेपाल और भारत के जल तंत्र पर पड़ रहा है।
1. बड़े पैमाने पर मेगा-डैम (बंध) और जलाशय निर्माण
चीन ने तिब्बत की नदियों पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और बाँध बनाना शुरू कर दिया है। ब्रह्मपुत्र नदी पर मेडोग (Medog) क्षेत्र में बनने वाला सुपर-डैम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इन विशाल बाँधों में अरबों-खरबों लीटर पानी एकत्र किया जाता है। जब चीन इन बाँधों से अचानक पानी छोड़ता है, तो नीचे की तरफ यानी भारत और नेपाल की सीमाओं पर स्थित नदियों में अचानक बाढ़ आ जाती है। यह “कृत्रिम बाढ़” (artificial floods) निचले इलाकों के लिए किसी सुनामी से कम नहीं होती।
2. ग्लेशियरों और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव
तिब्बत के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र (fragile ecosystem) में चीन द्वारा भारी मशीनरी, सुरंगों के निर्माण, रेलवे लाइनों और खनन (mining) कार्यों के कारण ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। पहाड़ों की कटाई और डायनामाइट के लगातार इस्तेमाल से वहाँ के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और परफ्रॉस्ट (permafrost) पिघलने से पर्वतीय ढलानों पर भूस्खलन (landslides) की आवृत्ति बढ़ गई है। जब तिब्बत के पहाड़ों पर भारी भूस्खलन होता है, तो नदियों के प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं और प्राकृतिक झीलों (glacial lakes) का निर्माण होता है। जब पानी का दबाव इन मलबे के बाँधों को तोड़ता है, तो नेपाल और भारत की तरफ आने वाली नदियों में जल प्रलय आ जाती है।
3. मौसम संशोधन और क्लाउड सीडिंग के प्रयोग
चीन तिब्बत के ऊंचे इलाकों में मौसम नियंत्रण (weather modification) और क्लाउड सीडिंग के प्रयोगों में अग्रणी रहा है। तिब्बत के ऊपर कृत्रिम बारिश कराने या बादलों की दिशा बदलने के इन प्रयोगों ने हिमालयी क्षेत्र के प्राकृतिक चक्र को पूरी तरह असंतुलित कर दिया है। जहाँ पहले मानसूनी वर्षा एक निश्चित पैटर्न में होती थी, वहीं अब अचानक अत्यधिक वर्षा (cloud bursts) और मूसलाधार बारिश का दौर शुरू हो गया है, जिससे नेपाल की नदियाँ कुछ ही घंटों में विकराल रूप धारण कर लेती हैं।
भारत के लिए भू-राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ
यह पूरी स्थिति भारत के लिए केवल एक मानवीय संकट (humanitarian crisis) नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। भारत को इस बहुआयामी चुनौती से निपटने के लिए अपनी रणनीतियों में अमूल्य बदलाव करने होंगे।
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सीमा पार जल सहयोग (Transboundary Water Cooperation): भारत को नेपाल और अन्य पड़ोसी देशों के साथ जल डेटा साझा करने के लिए मजबूत और पारदर्शी समझौते करने होंगे। कूटनीतिक स्तर पर नेपाल सरकार को यह समझाना होगा कि तिब्बत से आ रहे पर्यावरणीय खतरों से दोनों देशों को मिलकर निपटना होगा।
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तिब्बत फैक्टर को कूटनीति का केंद्र बनाना: भारत को अपनी विदेश नीति में तिब्बत के पर्यावरणीय और जल संबंधी मुद्दों को प्रमुखता देनी होगी। चीन द्वारा तिब्बत के जल संसाधनों के एकतरफा दोहन और सामरिक हथियार के रूप में इसके इस्तेमाल को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना आवश्यक है।
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आपदा अवसंरचना का आधुनिकीकरण: उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल में बाढ़ नियंत्रण प्रणालियों, तटबंधों (embankments) और अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning Systems) को अत्याधुनिक उपग्रह और एआई-आधारित तकनीकों से लैस करना होगा ताकि पानी के बढ़ने की सूचना समय रहते मिल सके।
निष्कर्ष
नेपाल की जल प्रलय और उससे भारत के राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर असम और बंगाल तक) पर मंडराता खतरा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पर्यावरण और जल अब केवल भूगोल के पन्नों तक सीमित विषय नहीं रहे, बल्कि ये सीधे तौर पर राष्ट्रों की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ चुके हैं।
तिब्बत में चीन द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के साथ लगातार की जा रही छेड़छाड़ ने हिमालयी क्षेत्र को एक बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। यदि समय रहते भारत ने इस भू-पारिस्थितिकीय खतरे (geo-ecological threat) को नहीं पहचाना और ठोस कूटनीतिक तथा तकनीकी कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में यह जल प्रलय भारतीय उपमहाद्वीप के करोड़ों नागरिकों के जीवन, आजीविका और अर्थव्यवस्था के लिए एक लाइलाज नासूर बन जाएगी। प्रकृति के साथ खिलौने की यह कीमत बहुत भारी हो सकती है, और भारत को इसके लिए अभी से सतर्क, सजग और रणनीतिक रूप से तैयार रहना होगा।
