किस्मत के ख़िलाफ़ नंगे पाँव
Inspiration
सिनेमा के पर्दे पर जब कोई औरत अपने कंधों पर हल उठाकर बंजर जमीन को चीरती हुई आगे बढ़ती है, तो दर्शक सिनेमाघरों में खड़े होकर तालियां बजाते हैं। महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ का वह दृश्य भारतीय मानस के भीतर एक मां के संघर्ष, उसके त्याग और अदम्य साहस का अमर प्रतीक बन चुका है। नरगिस के अभिनय ने राधा के उस किरदार को कालजयी बना दिया, जिसने भूख, लाचारी, प्रकृति के प्रकोप और सामाजिक बेरुखी के बावजूद अपनी संतानों के स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया।
मगर एक फिल्म केवल ढाई घंटे में पूरी हो जाती है। इसमें पर्दे पर बहने वाले आंसुओं के पीछे ग्लिसरीन होती है और टूटे हुए पैरों के नीचे कालीन बिछा होता है। असली जिंदगी का पर्दा कभी नहीं गिरता। वहां न कोई कट कहने वाला निर्देशक होता है, न ही थके हुए बदन को सहारा देने वाली कोई वैनिटी वैन। जब एक साधारण, गरीब और बेसहारा महिला अपनी संतानों के भविष्य को संवारने के लिए हकीकत के मैदान में उतरती है, तो वह सिनेमाई कल्पना से कहीं आगे निकल जाती है। महाराष्ट्र के बीड जिले की मिट्टी से उपजी रमाबाई रंगीली की कहानी इसी हकीकत का जीता-जागता दस्तावेज है। रमाबाई ने पर्दे की ‘मदर इंडिया’ को सिर्फ याद नहीं किया, बल्कि उसे अपने फटे पल्लू और छिले हुए पंजों से जीकर दिखाया है।
रमाबाई रंगीली की दुनिया किसी बड़े शहर की चकाचौंध से कोसों दूर अंबाजोगाई की तंग गलियों और कच्चे मकानों के बीच सिमटी हुई है। जिंदगी ने उन्हें कभी फूलों की सेज नहीं दी। एक सामान्य ग्रामीण परिवार में ब्याही गई रमाबाई के जीवन में मुश्किलें तब पहाड़ बनकर टूटीं, जब उनके पति का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया। पीछे छूट गईं दो मासूम बच्चियां और एक अंधकारमय भविष्य। एक विधवा महिला के लिए हमारे समाज में अकेले जीना आज भी किसी युद्ध से कम नहीं है। उस पर यदि जेब खाली हो, घर में अन्न का एक दाना न हो और दो मासूम आंखें भूख और उम्मीद से मां की ओर देख रही हों, तो कमजोर दिल अक्सर दम तोड़ देते हैं।
मगर रमाबाई ने टूटने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाने का फैसला किया। पति के जाने के बाद रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया और दुनिया ने नसीहतों का टोकरा थमा दिया। हर किसी ने कहा कि बेटियों को किसी तरह बड़ा करो और शादी करके विदा कर दो। मगर रमाबाई की आंखों में अपनी दोनों बेटियों के लिए एक अलग सपना पल रहा था। वह जानती थीं कि अगर इन बच्चियों को गरीबी, लाचारी और बेबसी के इस दुष्चक्र से बाहर निकालना है, तो उसका एकमात्र रास्ता शिक्षा है। वह अपनी बेटियों को किसी की दया का मोहताज नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहती थीं।
ख्वाब देखना जितना आसान होता है, उसे हकीकत में बदलना उतना ही कठिन। पेट पालने और बेटियों की स्कूल फीस भरने के लिए रमाबाई ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजना, झाड़ू-पोछा करना और मजदूरी करना शुरू कर दिया। सुबह जब सूरज की पहली किरण भी ठीक से जमीन पर नहीं उतरती थी, रमाबाई का दिन शुरू हो जाता था। हाथों में काई, साबुन की झाग और बर्तन की कालिख लिए वह एक घर से दूसरे घर दौड़तीं। सर्दियों की ठिठुरती सुबहों में ठंडे पानी में बर्तन धोते-धोते उनकी उंगलियां अकड़ जाती थीं। दोपहर की तपती धूप में सड़कों पर धूल फांकते हुए वह केवल इसी उम्मीद में पसीना बहातीं कि शाम को मिलने वाले चंद रुपयों से बेटियों की कॉपियां और किताबें खरीदी जा सकेंगी।
दिन-रात की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी आमदनी इतनी नहीं होती थी कि घर का खर्च और बेटियों की पढ़ाई दोनों बिना किसी रुकावट के चल सकें। स्कूल की फीस की अंतिम तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती, रमाबाई की रातों की नींद उड़ जाती। कई बार ऐसा हुआ जब घर में चूल्हा नहीं जला और रमाबाई ने खुद भूखे पेट रहकर बच्चियों को सूखी रोटी खिलाई। जब स्कूल से फीस का नोटिस आता, तो रमाबाई का कलेजा कांप उठता था। वह नहीं चाहती थीं कि उनकी गरीबी की वजह से उनकी बेटियों को क्लास के बाहर खड़ा किया जाए या उनके आत्मसम्मान को कोई ठेस पहुंचे।
इसी कशमकश और जद्दोजहद के बीच अंबाजोगाई में खोलेश्वर एजुकेश्नल कॉम्प्लेक्स की अमृत जयंती का अवसर आया। इस ऐतिहासिक अवसर पर संस्थान द्वारा कई कार्यक्रमों और खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था। इन्हीं आयोजनों में एक मैराथन दौड़ भी शामिल थी। जब शहर में इस दौड़ की चर्चा फैली, तो यह बात रमाबाई के कानों तक भी पहुंची। उन्हें किसी खेल में रुचि नहीं थी, न ही उन्हें खेल के नियम-कायदे मालूम थे। मगर उनके कान जिस बात पर ठिठक गए, वह थी इस दौड़ के विजेताओं को मिलने वाली नकद पुरस्कार राशि।
रमाबाई ने सुना कि दौड़ जीतने वाले को एक सम्मानजनक धनराशि मिलेगी। उस क्षण रमाबाई को मैराथन एक खेल नहीं, बल्कि अपनी बच्चियों के भविष्य का खुला दरवाजा नजर आई। उनके दिमाग में सिर्फ एक ही हिसाब चल रहा था अगर वह यह दौड़ जीत गईं, तो उस पैसे से बच्चियों की कई महीनों की स्कूल फीस एक साथ जमा हो जाएगी। उन्हें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा, न ही किसी साहूकार की चौखट पर गिड़गिड़ाना होगा।
मां का फैसला
मैराथन का दिन आया। मैदान का नजारा देखने लायक था। ट्रैक पर पेशेवर धावक खड़े थे। आधुनिक स्पोर्ट्स शूज, ब्रांडेड ट्रैकसूट, स्टॉपवॉच और महीनों की वैज्ञानिक ट्रेनिंग से लैस युवा प्रतियोगी। वे वार्म-अप कर रहे थे, अपनी मांसपेशियों को खींच रहे थे और जीतने की रणनीतियां बना रहे थे।
रमाबाई के पास न तो दौड़ने वाले जूते थे और न ही ट्रैकसूट। वह अपनी उसी पुरानी, सूती नौवारी साड़ी को कसकर लपेटे हुए थीं, जिसमें वह दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थीं। उनके पैरों में चप्पल तक नहीं थी; पैर पूरी तरह नंगे थे। चेहरे पर झुर्रियों के बीच उभरी गरीबी की रेखाएं थीं, लेकिन आंखों में एक दहकता हुआ अंगार था। वहां मौजूद बहुत से लोग उन्हें देखकर हैरान थे। कुछ ने दबी जुबान से मजाक उड़ाया, तो कुछ ने तरस खाकर देखा कि यह साधारण औरत इस कड़े मुकाबले में भला कैसे टिक पाएगी। लोगों को लगा कि शायद यह महिला भीड़ का हिस्सा बनने आई है और कुछ ही मीटर बाद थककर बैठ जाएगी।
मगर दुनिया यह भूल गई थी कि पेशेवर धावक पदकों के लिए दौड़ते हैं, शोहरत के लिए दौड़ते हैं, लेकिन एक मां अपनी संतानों के अस्तित्व के लिए दौड़ती है। पेशेवर धावकों को उनके कोच की सीटी दौड़ाती है, मगर रमाबाई को अपनी बच्चियों की स्कूल फीस की रसीद दौड़ा रही थी।
सीटी बजी दौड़ शुरू
शुरुआती पलों में आधुनिक जूतों की खड़खड़ाहट आगे निकल गई। रमाबाई ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर कमर में खोंसा और नंगे पांव सड़क पर कदम बढ़ा दिए। डामर की सख्त सड़क, कंकड़-पत्थर और चुभती हुई धूल। चंद पलों में ही उनके पैरों के तलवे सुलगने लगे। नंगे पंजों में कंकड़ चुभे, त्वचा छिली और खून की हल्की लकीरें उभरीं। सांसें उखड़ने लगीं, फेफड़े जलने लगे और धूप बदन को झुलसाने लगी। शरीर ने चीख-चीख कर कहा कि रुक जाओ, बैठ जाओ, यह तुम्हारे बस का नहीं है।
लेकिन उस भयंकर शारीरिक पीड़ा में भी रमाबाई का ध्यान अपने पैरों के दर्द पर नहीं था। हर बार जब पैर में कोई नुकीला पत्थर चुभता, तो उन्हें अपनी बेटियों का रोता हुआ चेहरा याद आता। जब सांस फूलने लगती, तो उन्हें याद आता कि अगर आज वह रुक गईं, तो कल उनकी बच्चियों की पढ़ाई रुक जाएगी। उनकी आंखों के सामने घर का वह खाली कोना घूम जाता जहां किताबों का बस्ता रखा था। उनके कानों में स्कूल की घंटी गूंजने लगती।
मां का संकल्प बहुत विराट
रमाबाई की गति धीमी होने के बजाय बढ़ने लगी। उन्होंने एक-एक करके आगे चल रहे धावकों को पीछे छोड़ना शुरू किया। सड़क किनारे खड़े दर्शक जो कुछ देर पहले तक उन्हें कौतूहल से देख रहे थे, अब अवाक रह गए। एक नंगे पांव, साड़ी लपेटे महिला हवा से बातें कर रही थी। उसके दौड़ने में कोई खेल तकनीक नहीं थी, केवल एक आंधी थी। वह आंधी जो अपने बच्चों की हिफाजत के लिए किसी भी सीमा को लांघ सकती है।
जैसे-जैसे अंतिम रेखा करीब आ रही थी, रमाबाई का पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। पैरों से रिसता खून सड़क की धूल में सन चुका था। अंतिम कुछ सौ मीटर की दूरी बची थी। प्रतिद्वंद्वी पीछे छूट चुके थे। रमाबाई ने अपनी बची-खुची पूरी ताकत, अपनी ममता की सारी ऊर्जा झोंक दी और फिनिश लाइन को पार कर लिया।
रमाबाई रंगीली ने जीत ली मैराथन
मैदान में सन्नाटा खिंच गया और फिर तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट गूंजी जिसने अंबाजोगाई के आसमान को हिलाकर रख दिया। जिन लोगों ने शुरुआत में संदेह जताया था, वे अब श्रद्धा से सिर झुकाए खड़े थे। यह केवल एक रेस की जीत नहीं थी; यह गरीबी पर खुद्दारी की जीत थी, लाचारी पर ममता की विजय थी।
जब रमाबाई के हाथों में जीत का प्रमाण पत्र और पुरस्कार की राशि थमाई गई, तो उनकी आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह खुशी के आंसू थे, राहत के आंसू थे। उस मंच पर खड़ी रमाबाई ने जब वह राशि अपनी छाती से लगाई, तो उन्हें कोई ट्रॉफी नहीं, बल्कि अपनी बेटियों की सुरक्षित स्कूल फीस और उनकी मुस्कुराती हुई आंखें नजर आ रही थीं। उन्होंने साबित कर दिया था कि एक मां के लिए दुनिया की कोई भी बाधा, कोई भी अभाव और कोई भी सड़क इतनी कठिन नहीं हो सकती जो उसके बच्चों के सपनों के आड़े आ सके।
‘मदर इंडिया’ फिल्म में जब नरगिस का किरदार संकटों से जूझता है, तो दर्शक भावुक हो उठते हैं। लेकिन रमाबाई की यह जीत हमें केवल भावुक नहीं करती, बल्कि हमारे भीतर एक गहरा आत्ममंथन जगाती है। यह कहानी हमें बताती है कि हमारे आस-पास ऐसे कितने ही मूक नायक और नायिकाएं मौजूद हैं, जो रोज जिंदगी के बीहड़ में नंगे पैर दौड़ रहे हैं। वे किसी अखबार की पहली सुर्खी नहीं बनते, न ही उन्हें किसी सम्मान समारोह में बुलाया जाता है। वे खामोशी से अपना खून-पसीना बहाकर अपनी अगली पीढ़ी को एक बेहतर कल देने में जुटे हैं।
रमाबाई रंगीली ने अंबाजोगाई की धरती पर जो पदचिह्न छोड़े हैं, वे केवल सड़क पर पड़े खून और पसीने के निशान नहीं हैं। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद की मशाल हैं। वे हर उस इंसान के लिए प्रेरणा हैं जो हालातों के आगे घुटने टेकने की सोचता है। रमाबाई की कहानी सिखाती है कि साधन भले ही सीमित हों, राहें चाहे कांटों से भरी हों, अगर इरादों में सच्चाई और ममता का बल हो, तो नंगे पांव भी मैराथन जीती जा सकती है।
अंबाजोगाई की यह वीरांगना मां आज पूरे समाज के लिए गर्व का प्रतीक है। उन्होंने अपने त्याग और साहस से यह सिद्ध कर दिया कि जब तक इस देश में रमाबाई जैसी माताएं मौजूद हैं, तब तक मातृत्व की शक्ति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। वे सचमुच आधुनिक भारत की जीती-जागती ‘मदर इंडिया’ हैं, जिन्होंने अपनी संतानों के भविष्य को संवारने के लिए तकदीर के लिखे को अपने पैरों तले रौंद दिया।