चप्पल बनाम सुपरपावर
इतिहास की यह सबसे विचित्र और कड़वी सच्चाई है कि जिस आधुनिक दुनिया ने खरबों डॉलर खर्च करके उपग्रह, स्टील्थ लड़ाकू विमान, रडार-रोधी युद्धपोत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मिसाइल डिफेंस सिस्टम विकसित किए, उसे धूल चटाने के लिए किसी दूसरी महाशक्ति की नहीं, बल्कि फटे-पुराने कपड़े और रबर की सस्ती चप्पल पहनने वाले एक विद्रोही समूह की जरूरत पड़ी। आधुनिक सैन्य विज्ञान और पश्चिमी रणनीतिकारों के माथे पर अगर कोई सबसे बड़ा कलंक लिखा गया है, तो वह यह कि पेंटागन की अरबों डॉलर की तकनीक यमन के पथरीले पहाड़ों से उठने वाले देसी ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों के आगे बेबस खड़ी नजर आ रही है। हूतियों ने दुनिया के स्वयंभू ‘थानेदार’ अमेरिका को जो चप्पल दिखाई है, उसकी गूंज किसी भी आत्मसम्मान रखने वाले राष्ट्र के लिए एक अमर ग्लानि की तरह वैश्विक व्यवस्था के पन्नों में दर्ज हो चुकी है।
लाल सागर की बिसात से पश्चिमी नौसेना का ‘दिवाला’
वैश्विक महाशक्ति कहलाने का दंभ भरने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना का इतिहास गौरव गाथाओं से भरा पड़ा माना जाता था। द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर खाड़ी युद्धों तक, विमानवाहक पोतों (एयरक्राफ्ट कैरियर्स) का किसी जलक्षेत्र में प्रवेश कर जाना ही विरोधी राष्ट्रों के हाथ-पैर फुलाने के लिए पर्याप्त हुआ करता था। लेकिन लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य में इस बार कहानी पूरी तरह उल्टी लिखी गई।
ईरान-अमेरिका के व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव की पृष्ठभूमि में, जहां एक तरफ अमेरिकी सेना को चौतरफा दबाव और सामरिक नुकसान झेलना पड़ा है, वहीं उससे कहीं अधिक घातक और असहनीय चोट समुद्र के उस संकरे गलियारे में मारी गई है, जहां से दुनिया की अर्थव्यवस्था की नसें गुजरती हैं। हूतियों ने लाल सागर पर एक प्रकार से व्यावहारिक नियंत्रण स्थापित कर अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार का पूरी तरह ‘तेल’ निकाल दिया है।
सुपरकैरियर्स, विध्वंसक (डेस्ट्रॉयर्स) और मल्टी-लेयर्ड मिसाइल डिफेंस शील्ड्स से लैस अमेरिकी और नाटो की नौसेनाएं वहां खड़े होकर केवल तमाशा देख रही हैं। एक आधुनिक मिसाइल को हवा में मार गिराने के लिए अमेरिका को बीस लाख से चालीस लाख डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइल दागनी पड़ती है, जबकि सामने से हूती लड़ाके कुछ हजार डॉलर का देसी ड्रोन या पुरानी संशोधित मिसाइल हवा में उछाल देते हैं। यह युद्ध केवल बारूद का नहीं, बल्कि आर्थिक तबाही का एक ऐसा चक्रव्यूह बन चुका है, जिसमें हर बचाव भी महाशक्ति को दिवालियापन की ओर धकेल रहा है।
इस रणनीति ने पूरे यूरोप के तेल और ऊर्जा व्यापार की कमर तोड़ कर रख दी है। जिन मालवाहक जहाजों और टैंकरों को स्वेज नहर के रास्ते यूरोप तक पहुंचना था, वे अब हूतियों के खौफ से अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ का लंबा और खर्चीला चक्कर लगाने को मजबूर हैं। यूरोप का वह व्यापार, जो पहले ही मंदी, मुद्रास्फीति और ऊर्जा संकट की मार झेल रहा था, अब यमन के तटीय ठिकानों से चलने वाले रिमोट कंट्रोल के आगे घुटनों पर है। पेंटागन के प्रेस सचिव व्हाइट हाउस के पोडियम पर आकर चाहे जो दावे करें, हकीकत यही है कि लाल सागर का पानी आधुनिक तकनीक के सबसे बड़े पाखंड का गवाह बन चुका है।
रणनीतिक पिछड़ापन एक शक्ति: ‘जिसके पास खोने को कुछ नहीं’
वर्तमान आधुनिक कूटनीति और पश्चिम के सैन्य सिद्धांतों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे एक सभ्य, साधन-संपन्न और पूंजीवादी मानसिकता वाले दुश्मन से लड़ने के लिए बनाए गए हैं। पश्चिमी थिंक-टैंक जब युद्ध की रणनीति बनाते हैं, तो वे आर्थिक प्रतिबंधों, बुनियादी ढांचे के विनाश, शेयर बाजार की गिरावट, और नागरिक सुविधाओं को ठप करने की धमकी को सबसे बड़ा हथियार मानते हैं। लेकिन हूतियों के सामने ये सभी किताबें रद्दी साबित हो गईं।
हूतियों की सबसे बड़ी सामरिक ताकत कोई अदृश्य स्टील्थ तकनीक नहीं, बल्कि उनका चरम पिछड़ापन और भौतिक अभाव है। वे वह स्थिति जिसमें उन्हें किसी लालच से नहीं खरीदा जा सकता, किसी आर्थिक प्रतिबंध से नहीं डराया जा सकता, और किसी आधुनिक मिसाइल के विनाश की धमकी देकर पीछे नहीं हटाया जा सकता। आखिर आप उस इंसान या समाज को क्या छीनने की धमकी देंगे, जिसके पास पहले से ही खोने के लिए कुछ नहीं है?
- न उनके पास नष्ट होने लायक चमचमाते गगनचुंबी शहर हैं।
- न उनका कोई शेयर बाजार या बैंकिंग नेटवर्क है जो वॉल स्ट्रीट के प्रतिबंधों से गिर जाए।
- न उनके पास आधुनिक हाईवे, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे या डेटा सेंटर हैं जिन्हें बमबारी से उड़ाकर उन्हें समझौते की मेज पर लाया जा सके।
यमन के वीरान, बंजर और खुरदुरे पहाड़ों में रहने वाला वह लड़ाका, जो कंधे पर कलाश्निकोव लटकाए और पैरों में धूल सनी चप्पल पहने चलता है, पेंटागन के सैटेलाइट कैमरों को चिढ़ाता हुआ प्रतीत होता है। अमेरिकी आधुनिक हथियार, टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें, और स्मार्ट म्यूनिशन उनके लिए किसी मजाक से ज्यादा कुछ नहीं हैं। एक लड़ाका जिसके पास खाने के लिए सूखी रोटी और रहने के लिए पहाड़ की एक गुफा हो, उसे वाशिंगटन की कोई भी मिसाइल या धमकी आत्मसमर्पण के लिए विवश नहीं कर सकती। यह ‘शून्यता की शक्ति’ (Power of Having Nothing to Lose) है, जिसने महाशक्तियों के अहंकार को इतिहास के सबसे निचले पायदान पर लाकर पटक दिया है।
सऊदी अरब, तेल की संपदा और तेल शोधक कारखानों का खौफ
इस पूरे भू-सामरिक खेल में हूतियों का निशाना केवल दूर बैठा अमेरिका या भूमध्य सागर का पश्चिमी किनारा नहीं रहा है। उनके सबसे नजदीकी और स्पष्ट निशाने पर हमेशा से सऊदी अरब और उसकी अकूत तेल संपदा रही है।
सऊदी अरब जो दुनिया के सबसे अत्याधुनिक हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, जिसके पास अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल प्रणालियों का पूरा जाल बिछा हुआ है हूतियों के ड्रोन और मिसाइलों के सामने बार-बार असहज साबित हुआ है लेकिन वह शायद नहीं जानता कि इन हथियारों का करना क्या है आज सऊदी अरब के शासक बंकरों में छिप कर अपनी जान बचा रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको के प्रतिष्ठानों पर पहले भी हुए हमलों और लगातार मंडराते खतरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांच के महलों में रहने वाले दूसरों के पत्थरों से सुरक्षित नहीं रह सकते। सऊदी अरब ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए खरबों डॉलर का आधुनिक रक्षा ढांचा खड़ा किया, लेकिन एक सस्ती क्रूज मिसाइल या कम ऊंचाई पर उड़ने वाला ड्रोन जब इन रडारों की पकड़ में आए बिना तेल संयंत्रों को दहला देता है, तो उस आधुनिक रक्षा तंत्र का पूरा सच उजागर हो जाता है।
हूतियों ने ईरान के व्यापक रणनीतिक नेटवर्क के एक बेहद आक्रामक और बेबाक घटक के रूप में अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब की संयुक्त रणनीतिक धुरी को लगातार चुनौती दी है। तेहरान के लिए हूती एक ऐसा दांव साबित हुए हैं, जो सीधे तौर पर ईरान के हाथ गंदे किए बिना भी वाशिंगटन और रियाद की नींद हराम करने की क्षमता रखता है।
तुर्की-पाकिस्तान का सऊदी को सहारा: मुस्लिम त्रिकोण और अमेरिकी अवसर
सऊदी अरब की बढ़ती असुरक्षा और क्षेत्रीय असंतुलन के बीच एक नया नाटक आकार लेता दिखाई देता है। जब पश्चिमी सुरक्षा छतरी पर से भरोसा डगमगाने लगता है, तब रियाद अपनी हिफाजत के लिए अन्य दिशाओं में देखता है। इसी संदर्भ में तुर्की और पाकिस्तान का सऊदी अरब की मदद के लिए हाथ बढ़ाना या सैन्य सहयोग का ढांचा तैयार करना एक दिलचस्प मोड़ है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस मदद से खाड़ी का कोई वास्तविक भला होगा, या यह केवल एक और भ्रामक समीकरण बनकर रह जाएगा?
इस पूरे परिदृश्य का सबसे पेचीदा और व्यंग्यात्मक पहलू यह है कि यह पूरा टकराव अंततः मुस्लिम दुनिया के भीतर की आंतरिक फांकों (fractures) पर टिका है। एक तरफ तुर्की का अपना नव-उस्मानी (Neo-Ottoman) प्रभाव बढ़ाने का एजेंडा है, दूसरी तरफ पाकिस्तान अपनी आर्थिक तंगहाली के बीच सऊदी रियालों के बदले सैन्य कौशल और श्रम किराए पर देने की पारंपरिक भूमिका में खड़ा नजर आता है। और इन दोनों के सामने सऊदी अरब का राजशाही तंत्र है।
जब तक यह त्रिकोण सुन्नी राजशाही, शिया बहुल ईरान समर्थित हूती, और बीच में खड़े तुर्की व पाकिस्तान आपस में ही उलझा रहेगा, तब तक वाशिंगटन को मध्य पूर्व में अपनी मनमानी करने, अपने हथियार बेचने और कूटनीतिक रूप से पैर जमाने का थोड़ा अवसर मिलता रहेगा। इतिहास गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय ताकतें अपने अंतर्विरोधों में फंसी हैं, तब-तब बाहरी ताकतों ने अपनी चौधराहट की रोटियां सेकी हैं। लेकिन इस बार पेंच यह है कि अमेरिका खुद उस दलदल में फंसा है जहां उसका अपना रुतबा और प्रभाव रोज लाल सागर की लहरों में डूब रहा है।
आत्मसम्मान पर अमर ग्लानि: आधुनिकता का खोखला घमंड
युद्ध केवल जमीन या तेल के कुओं को जीतने का नाम नहीं होता; युद्ध मनोवैज्ञानिक वर्चस्व का नाम होता है। एक साम्राज्य तब तक ही साम्राज्य होता है जब तक दुनिया उसकी ताकत के खौफ को स्वीकार करती है। जिस क्षण यह खौफ टूट जाता है, साम्राज्य का पतन शुरू हो जाता है।
अमेरिका और पश्चिमी सैन्य गठबंधन के साथ ठीक यही हुआ है। जिस देश का रक्षा बजट लगभग एक ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच रहा हो, जिसके सैन्य ठिकाने दुनिया के हर कोने में फैले हों, और जिसके एक इशारे पर देशों की सरकारें बदल जाया करती थीं, वह आज यमन के एक विद्रोही गुट के आगे बेबस खड़ा है जो अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी को उसकी शर्तों पर चलाने की चुनौती दे रहा है।
फटे-पुराने कपड़े पहनने वाले, नंगे पैर या रबर की चप्पलों में घूमने वाले इन यमनी लड़ाकों ने पेंटागन की जिस तकनीक, जिस सेटेलाइट सर्विलांस और जिस नौसैनिक शक्ति की धज्जियां उड़ाई हैं, वह किसी भी आत्मसम्मान रखने वाले राष्ट्र के लिए एक असहनीय और अमर ग्लानि का विषय बन चुकी है। यह आधुनिक सैन्य इतिहास का वह अध्याय है जिसे पश्चिमी विश्लेषक कभी गर्व से नहीं पढ़ पाएंगे जहां खरबों डॉलर की तकनीकी श्रेष्ठता, रेत में सनी एक साधारण चप्पल के सामने लाचार नजर आई।
