नई दिल्ली, 21 जुलाई। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से गुजरने वाली यमुना नदी को लेकर सामने आई एक नई वैज्ञानिक रिपोर्ट ने पर्यावरण विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और आम नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। दिल्ली विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) भोपाल के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले लगभग दो सौ वर्षों में दिल्ली में यमुना नदी की चौड़ाई करीब 68 प्रतिशत तक कम हो गई है, जबकि नदी का प्राकृतिक जल प्रवाह लगभग 90 प्रतिशत तक घट चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
शोध के अनुसार वर्ष 1799 के ऐतिहासिक मानचित्रों और आधुनिक उपग्रह चित्रों की तुलना करने पर पता चला कि दिल्ली में यमुना का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से बदल गया है। जहां कभी नदी का विस्तृत जल क्षेत्र हुआ करता था, वहां अब कई स्थानों पर निर्माण, सड़कें, बैराज, अतिक्रमण और अन्य शहरी गतिविधियां दिखाई देती हैं। अध्ययन में विशेष रूप से ओखला और आईटीओ बैराज के प्रभाव का उल्लेख किया गया है, जिनके कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नदी का केवल पानी ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसका बाढ़ क्षेत्र, प्राकृतिक किनारे और जैव विविधता भी उतनी ही आवश्यक होती है। यमुना के सिकुड़ने से नदी की जल धारण क्षमता प्रभावित हुई है। इससे एक ओर गर्मियों में पानी की उपलब्धता कम होती है तो दूसरी ओर भारी बारिश के दौरान बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। नदी के प्राकृतिक प्रवाह में कमी आने से जलीय जीवों और वनस्पतियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
राजधानी की बढ़ती आबादी और तेजी से हो रहे शहरी विस्तार ने भी यमुना पर अतिरिक्त दबाव डाला है। वर्षों से नदी में घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और अन्य प्रदूषक पहुंचते रहे हैं। कई नालों का गंदा पानी सीधे यमुना में गिरता है, जिससे जल गुणवत्ता लगातार खराब होती गई है। हालांकि समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर नदी की सफाई के लिए योजनाएं बनाई गईं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अपेक्षित परिणाम अभी तक पूरी तरह प्राप्त नहीं हो सके हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यमुना केवल दिल्ली की नदी नहीं है, बल्कि यह राजधानी की जल आपूर्ति, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन का प्रमुख आधार है। यदि नदी का प्राकृतिक स्वरूप लगातार सिकुड़ता रहा तो भविष्य में पेयजल संकट, प्रदूषण और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। इसलिए केवल सफाई अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नदी के बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, अवैध अतिक्रमण पर नियंत्रण और प्रदूषण के स्रोतों को रोकना भी आवश्यक है।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि यमुना के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार पर दीर्घकालिक योजना तैयार की जानी चाहिए। नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने, बैराजों के संचालन की समीक्षा करने, सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने और बाढ़ क्षेत्र में अवैध निर्माण रोकने जैसे कदम भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। इसके साथ ही नागरिकों की भागीदारी और जागरूकता भी नदी संरक्षण अभियान की सफलता में अहम भूमिका निभा सकती है।
दिल्ली में हर वर्ष मानसून के दौरान यमुना का जलस्तर चर्चा का विषय बनता है। हाल के दिनों में ऊपरी राज्यों में हुई बारिश के कारण नदी के जलस्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, हालांकि बाद में जलस्तर फिर घटने लगा। विशेषज्ञों का कहना है कि जलस्तर में अस्थायी बढ़ोतरी और नदी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को अलग-अलग दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। केवल बारिश के मौसम में पानी बढ़ने से नदी की मूल समस्याएं समाप्त नहीं होतीं।
दिल्ली सरकार, विभिन्न केंद्रीय एजेंसियां और पर्यावरण संस्थान समय-समय पर यमुना के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए कई परियोजनाएं चला रहे हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों का विस्तार, नालों की सफाई, प्रदूषण नियंत्रण और हरित क्षेत्रों के विकास जैसे प्रयास जारी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और सभी संबंधित एजेंसियों के बेहतर समन्वय से ही यमुना की स्थिति में स्थायी सुधार संभव होगा।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यमुना का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह राजधानी के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी भी है। नदी में कचरा न फेंकना, जल संरक्षण को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना भी उतना ही आवश्यक है। यदि वैज्ञानिक सुझावों के अनुरूप ठोस कदम उठाए जाएं, तो भविष्य में यमुना को फिर से एक स्वस्थ और जीवंत नदी के रूप में विकसित किया जा सकता है।