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ghazizbad news विधानसभा चुनाव में सजने वाला राजनीतिक अखाड़ा

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यदि आप गाजियाबाद से परिचित नहीं है तो आपके लिए यह सवाल अजीब है कि क्या एक गरीब बच्चे के स्कूल में एडमिशन के लिए गाजियाबाद का तीन तीन बार का विधायक घऱ का काम छोड़कर पैदल ही स्कूल के लिए दौड़ सकता है…चलिए इस पर चर्चा बाद में। लेकिन पहले बात करते हैं ग़ाज़ियाबाद शहर की सीट पर इस बार के विधानसभा चुनाव में सजने वाले राजनीतिक अखाड़े की।
ग़ाज़ियाबाद में यूं तो बीजेपी पिछले विधानसभा चुनावों में सभी पर भारी पड़ते हुए यहां की पांचो सीटों पर क़ाबिज़ रही थी। ऐसे हालात में विरोधी दलों के लिए मज़बूते दावेदार की तलाश करना के साथ साथ बीजेपी के लिए भी अपनी साख को बचाए रखना एक चुनौती है।
चुनाव आयोग ने जैसे उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावी रण का बिगुल फूंका, वैसे ही ग़ाज़ियाबाद की सियासत भी गर्म हुई। जहां तक बीजेपी का सवाल था तो यहां की शहरी सीट पर उसके लिए टिकटार्थियों की भीड़ के बावजूद सही फैसला लेकर दोबारा कम बैक करना चुनौती था तो कई दलों के लिए मज़बूत उम्मीदवार तक के लाले पड़े हुए थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि भारतीय जनता पार्टी, इंडियन नेश्नल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी समेत ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तिहादुलमुस्लिमीन तक ने अपने अपने उम्मीदवारों जनता के दरबार की हाज़िरी के लिए भेज दिया है। लेकिन चूंकि प्रदेश की सत्ता और ग़ाज़ियाबाद की पांचों विधानसभाओं सीटों पर बीजेपी का क़ब्ज़ा है इसलिए पहले बात बीजेपी की ही।
इस बार ख़ुद पार्टी के बड़े हल्क़े में चर्चा थी कि भले ही योगी और मोदी से किसी को नाराज़गी न हो लेकिन पूरे प्रदेश की तरह ग़ाज़ियाबाद में भी मौजूदा कई विधायकों का नाम कट सकता था। लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य कांड और कई दूसरों के बग़ावती तेवरों के बाद बीजेपी के बैकफुट पर जाने से कई विधायकों की तो मानों लॉटरी ही खुल गई यानि हाइकमान ने उनका टिकट फिर से पक्का कर दिया। जिनमें से ग़ाजि़याबाद भी सुर्ख़ियों में रहा। और यहां की शहरी सीट पर मौजूदा विधायक और मंत्री अतुल गर्ग दोबारा मैदान में आ डटे। हांलाकि बीजेपी के कई स्थानीय लोग न सिर्फ दौड़ में थे बल्कि मज़बूत दावेदार भी। और तो और वैश्य समाज के ही कुछ नाम तो अपनी दावेदारी के साथ साथ मौजूदा विधायक का खुलकर विरोध भी करते देखे गये। लेकिन अब अतुल गर्ग न सिर्फ मैदान में हैं बल्कि उनकी टीम मज़बूती के साथ अपनी जीत के समीकरण बैठा रही है। दरअसल अतुल गर्ग और रणनीतिकार न सिर्फ अपने पिता स्व. दिनेश चंद गर्ग जी की साफ सुथरी छवि, और योगी रिजीम में अपने कार्यकाल को भुनाने की जुगत लगा रहे हैं। लेकिन उनके लिए राहें इतनी आसान भी नहीं हैं। क्योंकि अतुल गर्ग का मुक़ाबला वैश्य समाज के ही बेहद जुझारू, राजनीतिक और समाजिक पकड़ रखने और ग़ाजि़याबाद में अक्सर सियासी जादूगर के नाम से पहचाने जाने वाले पूर्व सासंद, विधायक, चेयरमेन स्व. सुरेंद्र प्रकाश गोयल के बेटे सुशांत गोयल से है। हांलाकि शुरु में बीएसपी की ओर से पूर्व विधायक सुरेश बंसल को मैदान में उतारा था, जिसके बाद अकेले वैश्य समाज से तीन उम्मीदवारों की मौजूदगी से अतुल गर्ग का ख़ेमा ख़ासा बेचैन बताया जा रहा था। लेकिन श्री सुरेश बंसल की तबीयत की ख़राबी और बाद में निधन के बाद बीएसपी ने ब्राह्मण समाज के के.के शुक्ला पर दांव खेला है। उधर समाजवादी पार्टी और रालोद गंठबंधन ने विशाल वर्मा के रूप में दलित कार्ड खेलने की कोशिश की है। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्या मौर्य फैक्टर के बाद टिकट कटने वालों की नाराज़गी से बचने वाली बीजेपी के लिए अधिकतर पुराने ख़ासतौर से गाजियाबाद, साहिबाबाद समेत कई सीटों पर वर्तमान विधायकों पर भरोसा कामयाब रह पाएगा। उधर क्या इस बार कांग्रेस को ग़ाज़ियाबाद की शहरी सीट पर पिता की राजनीतिक विरासत वालों यानि सुशांत गोयल पर ही भरोसा था या फिर पार्टी के अंदर आम जनता में से कोई इतना क़ाबिल ही नहीं था कि उसको उम्मीदवार बनाया जा सके। जबकि अनूसूचित जाति के नुमाइंदे के तौर पर विशाल वर्मा को गाजियाबाद से उम्मीदवार बनाकर समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के लिए राहें आसान की हैं या कोई जातिगत आंकड़ा खेला है।
election 2022 के चुनावों में पहले चरण के मतदान के तहत गाजियाबाद में महज़ कुछ घंटे ही बचे हैं। उत्तर प्रदेश को लेकर हर सियासी दल बेहद फूंक फूंक कर क़दम रखते हुए न सिर्फ विरोधियों से निबट रहे हैं बल्कि अपनी ही पार्टी के लोगों को संभालने में भी महनत कर रहे हैं।
जहां तक गाजियाबाद का सवाल है तो गाजियाबाद विधानसभा सीट में कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी, के अलावा बीएसपी और समाजवादी पार्टी, जनता दल. रालोद व भारतीय जनसंघ तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। हांलाकि वर्तमान में गाजियाबाद की पांचो विधानसभा सीटों पर बीजेपी का क़ब्जा है और साहिबाबाद में कांग्रेस को छोड़कर बाक़ी चार सीटों पर बीएसपी दूसरे नंबर पर रही थी। लेकिन इस बार बीजेपी के लिए राहें आसान नहीं दिख रही है।
बात अगर गाजियाबाद विधानसभा सीट के इतिहास की करें तो यहां सबसे पहली बार 1957 में कांग्रेस के उम्मीदवार तेजा सिंह ने लगभग आठ हज़ार मतो से भारतीय जनसंघ के पी.चंद्र को हराकर विधायक बनने की शुरुआत की थी। उस चुनाव में तेजा सिंह को 17505 वोट मिले थे जबकि भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार को 9614 वोट मिले थे। इसके बाद साल 1962 में एक बार फिर तेजा सिंह ने जनसंघ के ईश्वर दयाल को लगभग दो हज़ार मतो से शिकस्त दी थी। जबकि साल 1967 में ग़ाज़ियाबाद एक नये नाम स्व. पंडित प्यारे लाल शर्मा से रु ब रू हुआ जिन्होने अपने प्रतिद्वंदी को लगभग पांच हजार मतो से हरा कर गाजियाबाद के राजनीति में मज़बूत क़दम रखा था। इसके बाद साल 1969 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और संयुक्त सोशिलिस्ट मोर्चा के बीच मुकाबला हुआ जिसमें प्यारेलाल शर्मा ने आफताब अली को लगभग सात हजार मतों से हरा दिया था। फिर आया 1974 का विधानसभा चुनाव इसमें एक बार फिर पंडित प्यारे लाल शर्मा ने जीत दर्ज करते हुए हैट्रिक लगाई और अपने विरोधी बलदेव राज शर्मा को लगभग 12 हजार वोटों से शिकस्त दे डाली। इस बार मुक़ाबला कांग्रेस और भारतीय जनसंघ के बीच रहा था। पंडित प्यारे लाल शर्मा एक आम से परिवार के साधारण इंसान ,शहर गाजियाबाद के चहते नेता बन चुके थे। कहा जाता है कि प्यारे लाल शर्मा शहर की जनता की नब्ज़ समझते थे। शहर के हर घर हर समाज हर व्यक्ति के वो ख़ास थे, पंडित जी। रामलीला का आयोजन हो या ईद पर कैला भट्टा की ईदगाह के बाहर नमाज़ियों के बीच जाकर खड़ा होना, हमने बचपन में ख़ुद प्यारे लाल शर्मा को अपनेपन के भाव से देखा है। लेकिन साल 1977 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार प्यारलाल शर्मा जनता पार्टी के उम्मीदवार और वर्तमान में समाजवादी पार्टी के ख़ास मीडिया इंचार्ज रहे राजेंद्र चौधरी से महज़ कुछ सौ वोटों से हार गये। हालांकि उस समय उनकी हार को लेकर तरह तरह की अफवाहें भी गर्म रहीं। लेकिन बहरहाल मामला चाहे वर्तमान मे ईवीएम का हो या फिर उस वक़्त की वोटों की गिनती का, जीत वही मानी जाती है जिसकी घोषणा आधिकारिक तौर पर की जाए।
दरअसल पंडित प्यारे लाल शर्मा की लोकप्रियता की एक वजह थी उनकी सादगी और आसानी से उपलब्धता। जिस दौर में पूरे शहर में महानंद मिशन हरिजन कालेज, शंभू दयाल कालेज, सनातन धर्म इंटर कालेज और सेठ मुंकदलाल इंटर कालेज ही शहर के छात्रों की शिक्षा का बोझ उठाते थे, उसी दौर में अपने बेटे का शहर के एक स्कूल में एडमिशन कराने के लिए परेशान एक शख़्स पूछता पूछता पंडित प्यारे लाल शर्मा डासना रोड पर मालीवाड़ा से आगे उनके घर पहुंच गया। वहां पर शायद उनके घर पर मिट्टी के गारे से चिनाई यानि घर के निर्माण का कुछ कार्य चल रहा था। बताते हैं कि वहां पर कई लोग मजदूरों और मिस्त्रियों की भीड़ में मौजूद तो थे, लेकिन एक तो पंडित का सादगी वाला हुलिया दूसरे वो शायद पंडित जी को पहचानता नहीं था। जब उससे आने का कारण पूछ गया तो उसने कहा कि मुझे एमएलए साहब से मिलना है। क्यों… के जवाब में उसने अपने बच्चे की तरफ इशारा करके बताया कि इसका दाखिला कराना है। तब पंडित जी ने वहां मौजूद लोगों से कहा आप काम जारी रखो मैं अभी आता हूं। और पंडित प्यारे लाल शर्मा ख़ुद साथ जाकर बच्चे का दाखिला सनातन धर्म इंटर कालेज मे करवाने चले गये।
बहरहाल ये थी गाजियाबाद की राजनीतिक विरासत जिसमें ऐसे नेता भी हुए लेकिन आज शायद ये सपनो की ही बात लगती है। खैर हम बात कर रहे थे गाजियाबाद विधानसभा की चुनावी सफर की। और इस बीच एक दर्दनाक हादसे से शहर को रू ब रू होना पड़ा। हरदिल अजीज़ नेता को छीन लिया गया। राजनीतिक रूप से शायद गाजियाबाद की यह पहली बड़ी वारदात थी, कि जब पंडित प्यारे लाल शर्मा की हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद साल 1980 में उनके बेटे और पूर्व विधायक सुरेद्र कुमार मुन्नी को शहर की जनता राजनीति में लेकर आई। 1980 में कांग्रेस यू ने पंडित सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी को टिकट दिया और उन्होने कांग्रेस आई के कैंडिडेट और वर्तमान में पूर्व मंत्री सतीश चंद शर्मा को लगभग 600 वोटों से हरा दिया था। मुक़ाबला कांटे था। दोनो उम्मीदवार कांग्रेस के ही थे बस एक पूरानी के… एक बाग़ी यानि इंदिरा जी के.. बल्कि यूं कहें कि संजय गांधी के ख़ेमे के। शहर की राजनीति में उतार चढ़ाव आते रहे, और फिर आया साल 1985 का चुनाव इस बार मुक़ाबला रहा कांग्रेस के कृष्ण कुमार शर्मा यानि के.के शर्मा और बीजेपी की तरफ से वर्तमान विधायक अतुल गर्ग के पिता स्व. दिनेश चंद गर्ग जी के बीच, मुक़ाबला बेहद कांटे का रहा। दिनेश चंद गर्ग जी न सिर्फ बेहद लोकप्रिय नेता थे बल्कि उनकी पकड़ हर समाज में थी, उधर के.के शर्मा भी युवा नेता के तौर पर कांग्रेस की तरफ से मज़ूबती से लड़े। लेकिन नतीजे वाले दिन जो कुछ शहर की जनता ने देखा उसका भले ही कोई रिकार्ड या वीडियो न हो लेकिन पुराने लोगों को आज भी याद होगा कि कैसे प्रशासन की ओर से घोषणा की गई थी कि के.के शर्मा ने दिनेश चंद गर्ग को महज़ 200 के करीब वोटों से हरा दिया था। बहरहाल कांग्रेसी एमएलए के तौर पर के.के शर्मा की जीत भी शहर के लिए ऐतिहासिक रही थी। फिर साल 1989 के चुनाव आए, इस बार देशभर में राजनीतिक गर्मागर्मी का माहौल रहा। और इस बार कांग्रेस की तरफ से पंडित प्यारे लाल शर्मा के बेटे सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी बीजेपी के उम्मीदवार बालेश्वर त्यागी के सामने थे, और उन्होने बाज़ी मारते हुए बालेश्वर त्यागी को लगभग 17 हज़ार के भारी अंतर से शिकस्त दे डाली थी। और फिर ग़ाज़ियाबाद के इतिहास मे वो साल भी आया कि जब बीजेपी ने पहली बार यहां से जीत हासिल करते हुए बालेश्वर त्यागी को विधानसभा भेजा, जबकि उन्होने 1991 में जनता दल के चक्र के भरोसे मैदान मे उतरे स्व. चौधरी अनूप सिंह को लगभग 22 हज़ार के अंतर से धूल चटा दी थी। कभी कांग्रेस के ख़िलाफ एक साथ रहे जनता दल और बीजेपी में फूट और 1991 की कामयाबी के बाद शहर मानों भगवामय हो गया। और फिर साल 1993 में भी बालेश्वर त्यागी ने अपने विरोधी जनता दल के स्व.चौधरी अनूप सिंह को लगभग 45 हज़ार मतो से हराकर उनका राजनीतिक सफर ही ख़त्म कर दिया था। बालेश्वर त्यागी के कंधे पर शहर गाजियाबाद में बीजेपी की जीत का सफर अभी रुका नहीं था, कि साल 1996 में समाजवादी पार्टी के युवा उम्मीदवार और वर्तमान में सपा एमएलसी और लालू प्रसाद यादव के समधि जितेंद्र यादव उर्फ ब्रिजेश यादव को लगभग 95 हज़ार मतों से हरा दिया, बालेश्वर त्यागी की इस हैट्रिक के बाद गाजियाबाद की विधानसभा सीट बीजेपी के लिए मानों एक अभेद क़िला मानी जाने लगी थी। लेकिन साल 2002 में गाजियाबाद में आया एक राजनीतिक जादूगर, जो नगर पालिका के मेंबर और चेयरमेन का सफर तय करके कांग्रेस के लिए उम्मीदवार के तौर पर पहली पंसद बना। जी हां ये नाम था स्व. सुरेंद्र प्रकाश गोयल, जिसने बीजेपी के क़िले को ढहाते हुए 2002 के चुनाव में बालेश्वर त्यागी को लगभग चार हज़ार वोटों से मात दे डाली थी। हम आपको याद दिलाते चलें कि इस बार कांग्रेस ने उन्ही स्व. सुरेंद्र प्रकाश गोयल के बेटे पर भरोसा जताया है।
तो हम बात कर रहे थे, गाजियाबाद विधानसभा सीट पर विधायकों की जीत हार के सफर की। साल 2004 में सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी ने इस बार इस सीट पर कब्जा जमा लिया था। फिर साल 2007 में बीजेपी ने एक बार फिर एक्सपैरिमेंट किया और बीजेपी के युवा मोर्चे के युवा कैंडिडेट और साहिबाबाद से वर्तमान विधायक और उम्मदीवार सुनील शर्मा को मैदान में उतारा। सुनील शर्मा जो कि सघर्ष और आंदोलनों के लिए जाने जाते थे उन्होने बीएसपी के बेहद मजबूत और जातीय समीकरण वाले उम्मीदवार सुरेश बंसल को लगभग 6 हजार से ज्यादा मतो से शिकस्त दे डाली। लेकिन बीएसपी के उम्मीदवार ने अगली बार बेहद तैयारी और जातिगत गठजोड़ के साथ बीजेपी को टक्कर दी। दलित मुस्लिम और किसी हद अपने ही वैश्य समाज में पकड़ के दम पर साल 2012 विधानसभा चुनाव में बीएसपी के सुरेश बंसल ने वर्तमान विधायक और यूपी में मंत्री बीजेपी के उम्मीदवार अतुल गर्ग को लगभग 8 हज़ार मतों से शिकस्त दे डाली। और आया साल 2017 में मोदी के जादू में होने वाला यूपी का विधानसभा चुनाव इसमें एक बार फिर बीजेपी ने दांव खेला अतुल गर्ग पे। मुक़ाबला बेहद टक्कर का था, अतुल गर्ग बनाम सुरेश बंसल लेकिन सुरेश बंसल का दलित मुस्लिम और वैश्य समाज का गठजोड़ मोदी की आंधी और अतुल गर्ग के सामने न टिक सका। और लगभग 7 हज़ार वोटों का अंतर अतुल गर्ग के लिए लखनऊ की ताजपोशी की वजह बन गया।
लेकिन शायद इस बार खुद अतुल गर्ग के लिए राहें इतनी आसान नहीं है। जातिगच समीकरणों के अलावा कांग्रेस के उम्मीदवार और पालिका चेयरमेन से लेकर विधायक और सासंद रह चुके स्व. सुरेंद्र प्रकाश गोयल के बेटे सुशांत गोयल की मौजूदगी भी बड़ी चुनौती के तौर पर देखी जा रही है। हांलाकि सुशांत अभी नये हैं लेकिन राजनीति उनको भी मानों घुट्टी मे ही मिली है। ऐसे में बीएसपी के उम्मीदवार के.के शुक्ला सपा रालोद के विशाल वर्मा की आधी अधूरी मौजूदगी से मुका़बला आमने सामने का होता दिख रहा है। लेकिन शायद इस गाजियाबाद शहर की जनता भी किसी चौंकाने वाले फैसले का मन बनाए बैठी है।
(लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं) #ghaziabadnews #upelection #upnews #electionnews #oppositionnews #azadkhalid #upelection2022

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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