सज़ा-ए-मौत ज़रूरी है या नहीं- इसी सवाल पर गोलमेज़ कांफ्रेस का आयोजन!

सजा ए मौत पर होगा विचार विमर्श
सजा ए मौत पर होगा विचार विमर्श

नई दिल्ली (9 जुलाई 2015)- किसी भी हालत में किसी इंसान से उसके जीने के हक़ को छीना जाना जायज़ है या नहीं। इसी सवाल पर एक बार फिर मंथन का शायद समय आ चुका है। इसी के मद्देनज़र भारतीय विधि आयोग 11 जुलाई, 2015 को इंडिया हैबिटेट सेन्ट र, नई दिल्लीी में मृत्युं दंड पर एकदिवसीय विचार सभा का आयोजन कर रहा है। इस विचार सभा का उद्घाटन गोपाल कृष्णय गांधी करेंगे। इस सभा में न्या यपालिका, बार, शिक्षा, मीडिया, राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन की महान हस्तियों का एक चुनिंदा समूह मृत्यु्दंड के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा एवं विचार विमर्श करने के लिए एकत्र होगा। व्यामपक विचार विमर्श में सहायता प्रदान करने के लिए इस विचार सभा को गोलमेज के रूप में आयोजित किया जा रहा है। लगभग पूरे दिन चलने वाली इस विचार विमर्श के बाद सभी भागीदार अपने विचार व्यूक्त कर सकेंगे। भारतीय समाज की प्रमुख हस्तियों के अलावा इस विचार सभा में प्रोफेसर रोजर हूड, प्रोफेसर एमेरिटस ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड रिसर्च एसोसिएट, सेन्टफर फॉर क्रिमिनोलॉजी, ऑक्संफोर्ड यूनिवर्सिटी भी भाग लेंगे।
विचार सभा में चार प्रमुख विषयों पर विचार विमर्श किया जाएगा, जिनमें मनमानी और भेदभाव यानि क्याा मृत्युवदंड मनमर्जी से लागू किया जाता है? इसे कैसे रोका जा सकता है या दूर किया जा सकता है। क्या मृत्युोदंड में गरीब और कमजोर लोगों के खिलाफ भेदभाव बरता जाता है। दूसरे आपराधिक न्याय प्रणाली की स्थति क्या है, जैसे कि पुलिस जांच-पड़ताल प्रक्रियाओं, न्याआयपालिका और जेल प्रणालियों सहित आपराधिक न्या य प्रणाली के सामने क्या चुनौतियां हैं। निष्प क्ष, पक्षपात रहित और त्रुटिहीन मृत्यु दंड देने लिए इस प्रणाली को कैसे सुधारा जा सकता है। तीसरे सज़ाए मौत के दंडात्मक उद्देश्य क्या है, यानि मृत्युादंड से किस उद्देश्या की पूर्ति होती है। मृत्युकदंड देने के इसी उद्देश्या को बदलने के लिए क्या‍ विकल्पउ अपनाये जा सकते हैं। और इनके अलावा आगे बढ़ने की राह कायम रखना, सुधार करना या उसे खत्म करना जिसके तहत भारत की संवैधानिक और अंतर्राष्ट्रीाय विधि प्रतिबद्धताओं को देखते हुए क्या मृत्युादंड को इसके वर्तमान या संशोधित स्वयरूप में कायम रखा जाना चाहिए पर विचार किया जाएगा।
इस विचार सभा के भागीदार समाज के सभी क्षेत्रों के हितधारकों का प्रतिनिधित्वक करेंगे। इनमें प्रतिष्ठित न्याेयाधीश, न्या यमूर्ति (सेवानिवृत्तर) प्रभा श्रीदेवन, न्यारयमूर्ति (सेवानिवृत्ता) एस.बी. सिन्हाश, न्याययमूर्ति (सेवानिवृत्तन) होसबिट सुरेश, न्या‍यमूर्ति (सेवानिवृत्त ) के.चंद्रू और न्यांयमूर्ति (सेवानिवृत्तक) राजेन्द्रर सच्चसर, राजनीतिक नेता जैसे वृंदा करात, मनीष तिवारी, शशि थरूर, माजिद मेमन, कनिमोझी, वरूण गांधी और आशीष खेतान शामिल हैं। पूर्व मुख्यन सूचना आयुक्तप वजाहत हबीबुल्लाेह भी इस सभा में भाग लेंगे। सामाजिक कार्यकर्ता ऊषा रामनाथन वर्तमान और पूर्व पुलिस अधिकारी जैसे जुलियो रिबेरो, डी.पी. कार्तिकेयन, शंकर सेन, पी.एम. नायर, चमनलाल, मीरन सी.बोरवंकर भी इसमें शामिल होंगे। के.टी.एस. तुलसी, टी.आर. अंध्यानरूजिना, युग चौधरी, संजय हेगड़े, कोलिन गोंजाल्विस और दुष्यं्त दवे जैसे नामी वकील भी इसमें शामिल होंगे। इस क्षेत्र में काम कर रही एनजीओ जैसे एसीएचआर, एसएएचआरडीसी और सीएचआरआई के प्रतिनिधि भी इसमें भाग लेंगे। संजय मित्तैल, सिद्धार्थ वर्दराजन, वी.वेंकटेशन, प्रवीण स्वाइमी और राजदीप सर देसाई जैसी मीडिया हस्तियां भी इसमें भाग लेंगी।
विचार सभा से एक दिन पूर्व विधि आयोग इंडिया इं‍टरनेशनल सेन्टमर, नई दिल्लीम में प्रोफेसर रोजर हूड का एक व्याधख्या न आयोजित करायेगा। प्रोफेसर हूड वर्तमान में एमेरिटस ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड रिसर्च एसोसिएट, सेन्टयर फॉर क्रिमिनोलॉजी, ऑल साउल्स कॉलेज ऑक्स्फोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफसर हैं। वे ”मृत्युोदंड का वैश्विक उन्मूकलन, एक मानव अधिकार अनिवार्यता” विषय पर अपने विचार रखेंगे और विचार सभा में भी भाग लेंगे।
यह उल्लेतखनीय है कि उच्चपतम न्याखयालय ने संतोष कुमार सतीश भूषण बरियार बनाम महाराष्ट्रर और शंकर किशन राव खाड़े बनाम महाराष्ट्र मामले में यह सुझाव दिया था कि विधि आयोग को भारत में मृत्यु दंड का अध्यखयन करना चाहिए और इस विषय पर नवीनतम और सुविज्ञ वार्ता और बहस आयोजित करनी चाहिए। मई, 2014 में आयोग ने परामर्श पत्र जारी करके इस विषय पर जनता की टिप्पाणियां आमंत्रित की थी। इस पत्र के जवाब में प्राप्तक टिप्पइणियों पर आगे विचार विमर्श करने के लिए यह विचार सभा आयोजित की जा रही है। इस विचार विमर्श के दौरान निर्धारित विचारों से इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट तैयार करने में आयोग को मदद मिलेगी।
मृत्युोदंड का वर्तमान कानून बचन सिंह बनाम भारत सरकार (1980) के मामले में निर्धारित किया गया था, जब उच्चबतम न्यातयालय ने मृत्यु)दंड की वैधानिकता को सही ठहराया था। हालांकि न्याययालय ने इस दंड में मनमर्जी को कम करने के लिए इसे दुर्लभों में दुर्लभतम् मामले में ही लागू करने के लिए कहा था। इस मामले में अपने निर्णय पर पहुंचने के लिए न्याेयालय ने विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट, भारत और विदेशों में दिये गये पूर्व फैसलों और समकालीन स्कॉयलरशिप पर भरोसा किया था। विधि आयोग की जिस 35वीं रिपोर्ट पर न्यालयालय में बचन सिंह मामले में भरोसा जताया था, उस पर भी पुन: विचार विमर्श किये जाने की जरूरत है, क्योंाकि यह रिपोर्ट 1963 में प्रस्तुनत की गई थी। इस प्रकार दंड प्रक्रिया 1973 की संहिता के ढांचे के साथ-साथ भारत के सामाजिक–राजनैतिक और कानूनी परिदृश्यर में अन्यक परिवर्तनों के साथ मृत्युंदंड के ढांचे की ओवरहालिंग करने की जरूरत है।
बचन सिंह मामले के 35 वर्षों के बाद कानूनी परिदृश्यं में भी काफी बदलाव आया है। वर्ष 1980 में जब बचन सिंह के मामले का निर्णय हुआ था, केवल 10 देशों ने सभी अपराधों के लिए मृत्यु8दंड की सजा समाप्तम की थी। उसके बाद से दुनिया के लगभग दो तिहाई देशों ने कानून या व्य‍वहार में मृत्युादंड को समाप्ता कर दिया है। 98 देशों ने तो सभी अपराधों के लिए मृत्युयदंड समाप्तर कर दिया है। 7 देशों ने सामान्या अपराधों के लिए इसे समाप्त कर दिया है तथा 35 देशों में मौत की सजा के खिलाफ प्रभावी स्थेगन लागू किया है। अंतर्राष्ट्रीएय अपराधिक कानून में नरसंहार और मानवता के विरूद्ध अपराध और युद्ध अपराधों जैसे गंभीर और जघन्य अपराधों के लिए मृत्युमदंड समाप्तप कर दिया है। हाल ही के मामलों में उच्चंतम न्याटयालय ने यह पाया है कि दुर्लभतम् सिद्धांत के बावजूद मृत्युहदंड की सजा मनमाने ढंग से जारी है। संतोष बरियार बनाम महाराष्ट्र् राज्या (2009) के मामले में उच्चेतम न्याषयालय ने यह पाया कि कम से कम 15 व्य्क्तियों को गलत तरीके से दंड दिया गया था। संगीत बनाम महाराष्ट्र राज्या (2013) मामले में न्याजयालय ने यह माना है कि 5 मामलों में गलत सजा लागू की गई थी और यह निर्णय लेने में असमर्थता थी कि क्याा यह मामला भारत के मृत्युथदंड विधिशास्त्रत की अनिश्चितताओं के कारण मृत्युथदंड लागू करने के लिए उचित था। जिन देशों में मृत्युडदंड समाप्तत कर दिया गया है, वहां भी अनुभवजन्यन अनुसंधान ने मृत्युेदंड के संभावित निवारक प्रभावों को विवादित कर दिया है। भारत और विदेशों में आये इन परिवर्तनों ने मृत्युेदंड की संवैधानिकता और वां‍छनीयता के प्रश्नोंं पर पुन: विचार करने के लिए इस सभा को उचित अवसर बना दिया है।

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आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं, सहारा समय, इंडिया टीवी, वॉयस ऑफ इंडिया, इंडिया न्यूज़ सहित कई नेश्नल न्यूज़ चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। Read more

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